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भास्कर इंडेप्थ:130 साल पहले लूटी हुई 26 अफ्रीकी कलाकृतियों की कहानी, जिन्हें फ्रांस अब लौटा रहा है; जानिए ब्रिटेन से भारत क्या-क्या वापस चाहता है?

एक वर्ष पहले
  • फ्रांस ने 130 साल पहले अफ्रीका के दहोमेय साम्राज्य से 26 कलाकृतियां लूट ली थीं
  • भारत भी चाहता है कि ब्रिटेन कोहिनूर समेत ये पांच लूटी हुई कलाकृतियां लौटा दे

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अपना चार साल पुराना वादा पूरा कर रहे हैं। 2017 में मैक्रों ने अफ्रीकी देशों की यात्रा के दौरान 130 साल पुरानी कलाकृतियों को लौटाने का वादा किया था। फ्रांस सरकार ने कानून में जरूरी संशोधन करके कलाकृतियां लौटाने का रास्ता साफ कर दिया है। पश्चिमी अफ्रीकी देश बेनिन को लौटाने से पहले इन कलाकृतियों की पेरिस में प्रदर्शनी लगाई गई है।

फ्रांस इन कलाकृतियों को कब लूट कर ले गया था? क्या इन 26 कलाकृतियों की खासियत? क्या ब्रिटेन भी इस दिशा में कदम उठाएगा? कोहिनूर हीरे के साथ-साथ ब्रिटेन से भारत क्या-क्या चाहता है? भास्कर इंडेप्थ में बारी-बारी से इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं...

दहोमेय साम्राज्य पर फ्रांस की जीत

17वीं शताब्दी में अफ्रीका में दहोमेय साम्राज्य की स्थापना हुई थी। 18वीं और 19वीं शताब्दी तक ये एक प्रभावशाली साम्राज्य रहा। बात 1890 की है। दहोमेय साम्राज्य की बागडोर बेहंजिन के हाथ में थी। फ्रांस ने इस साम्राज्य पर हमला कर दिया। बेहंजिन ने इसका प्रतिरोध किया। चार साल चली जंग के बाद फ्रांस जीत गया और बेहंजिन अपने परिवार के साथ देश छोड़कर चले गए।

दहोमेय साम्राज्य के बेहंजिन अपने लोगों के साथ। उन्होंने फ्रांस के साथ 4 साल तक जंग लड़ी और देश छोड़कर चले गए।
दहोमेय साम्राज्य के बेहंजिन अपने लोगों के साथ। उन्होंने फ्रांस के साथ 4 साल तक जंग लड़ी और देश छोड़कर चले गए।

जंग के दौरान बेनिन से लूट ली थीं कलाकृतियां

1892 में फ्रांस की सेना बेनिन पर कब्जा जमा रही थी। उस दौरान उसने अबोमेय शहर के राजमहल से कई कलाकृतियां लूट लीं और इन्हें फ्रांस पहुंचा दिया गया। 2006 में पहली बार इन कलाकृतियों को फ्रांस ने एक प्रदर्शनी में सार्वजनिक किया। बेनिन ने 2016 में फ्रांस को एक चिट्ठी लिखकर इन कलाकृतियों को वापस मांगा था।

उस वक्त तक फ्रांस में रखी गई सांस्कृतिक चीजें सरकारी संपत्ति थी, जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता था। 2017 में फ्रांस के राष्ट्रपति ने बेनिन की जनता से वादा किया और 2020 में इस लौटाने की अनुमति देने वाला कानून पारित किया गया।

बेनिन इन कलाकृतियों का क्या करेगा?

फ्रांस से कलाकृतियां मिलने के बाद बेनिन में उन्हें गवर्नर हाउस में दिखाया जाएगा। इसके बाद इन मूर्तियों को अबोमेय शहर पहुंचा दिया जाएगा, जहां एक नया म्यूजियम बनेगा।

इन 26 कलाकृतियों में क्या खास है?

इन 26 कलाकृतियों में शाही मूर्तियां हैं। इसके अलावा राजदंड़, वेदिका और एक शानदार शाही कुर्सी भी शामिल है। बेनिन के अलावा सेनेगल, माली, चाड, कोट दिवोआर, इथियोपिया और मेडागास्कर ने भी फ्रांस को अपने देश का लूटा हुआ सामान लौटाने के लिए लिखा है।

यूरोप के अन्य देशों ने भी उपनिवेश काल में कई देशों से लूटी हुई कलाकृतियां लौटाने का वादा किया है। जैसे नाइजीरिया को जर्मनी 2022 से बेनिन ब्रोन्जेस नाम की कलाकृतियां लौटाएगा। भारत भी ब्रिटेन से अपनी पुरानी कलाकृतियां और कई बेशकीमती चीजें लौटाने की मांग कर चुका है।

ब्रिटेन से क्या-क्या चाहता है भारत?

भारत पर राज करने के दौरान अंग्रेजों ने देश के अलग-अलग हिस्सों से कई बेशकीमती कलाकृतियां चुराई थीं। इनमें से कई ब्रिटिश संग्रहालय और आर्ट गैलरीज में रखी हुई हैं। भारत इन कलाकृतियों को लौटाने के लिए लगातार जोर दे रहा है। कुछ देशों ने पहल भी की है। भारत ब्रिटेन से भी कोहिनूर और 4 अन्य बेशकीमती चीजें लौटाने के लिए कहा है, लेकिन उसने मना कर दिया।

1. कोहिनूर हीराः दुनिया का ये सबसे मशहूर हीरा टावर ऑफ लंदन के जेवेल हाउस में रखा हुआ है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित गोलकुंडा की खान में से यह बेशकीमती हीरा खोजा गया था। समय के साथ अलग-अलग शासकों की शोभा बढ़ाने के बाद ये हीरा 1813 में महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा। 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद 1843 में दलीप सिंह को पंजाब का राजा बनाया गया। अंग्रेजों ने युद्ध में हराकर कोहिनूर पर कब्जा कर लिया और उसे ब्रिटेन भेज दिया।

कोहिनूर हीरे को किंग जॉर्ज षष्टम की पत्नी क्वीन एलिजाबेथ के क्राउन में जड़वा दिया गया और तब से लेकर अब तक यह हीरा ब्रिटिश राजघराने की महिलाओं के ही सिर की शोभा बढ़ा रहा है।
कोहिनूर हीरे को किंग जॉर्ज षष्टम की पत्नी क्वीन एलिजाबेथ के क्राउन में जड़वा दिया गया और तब से लेकर अब तक यह हीरा ब्रिटिश राजघराने की महिलाओं के ही सिर की शोभा बढ़ा रहा है।

2. सुल्तानगंज बुद्धः 150 से ज्यादा सालों से ये 7.5 फीट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा बर्मिंघम म्यूजियम और आर्ट गैलरी की शोभा बढ़ा रही है। अब इसे भले ही बर्मिंघम बुद्ध कहा जाने लगा है, लेकिन 1861 में इंग्लैंड ले जाने से पहले ये बिहार के सुल्तानगंज का गर्व हुआ करता था। इस प्रतिमा का वजन 500 किलो से ज्यादा है।

7.5 फीट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा बर्मिंघम म्यूजियम और आर्ट गैलरी की शोभा बढ़ा रही है।
7.5 फीट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा बर्मिंघम म्यूजियम और आर्ट गैलरी की शोभा बढ़ा रही है।

3. महाराज रणजीत सिंह का सिंहासनः1820 में जब महाराज रणजीत सिंह सत्ता के शबाब पर थे, तो हफीज मुल्तानी ने उनके लिए लकड़ी और सोने का एक सिंहासन बनाया था। 1849 में ब्रिटिशों ने इसे अपने कब्जे में ले लिया और 1951 में ये लंदन के इंटरनेशनल आर्ट वर्क में प्रदर्शित किया।

1849 में ब्रिटिशों ने महाराज रणजीत सिंह के सिंहासन को कब्जे में ले लिया और 1951 में ये लंदन के इंटरनेशनल आर्ट वर्क में प्रदर्शित किया।
1849 में ब्रिटिशों ने महाराज रणजीत सिंह के सिंहासन को कब्जे में ले लिया और 1951 में ये लंदन के इंटरनेशनल आर्ट वर्क में प्रदर्शित किया।

4. अमरावती रेलिंग्सः आंध्र प्रदेश के अमरावती में 300 ईसापूर्व का एक बौद्ध स्तूप था। उसके आसपास 100 ईसापूर्व से 800 ईसवी तक चूना पत्थर की रेलिंग्स बनाई गईं। 1790 ईसवी में एक खुदाई में ब्रिटिश अफसर को ये अवशेष मिले। 1850 में इन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया, जहां म्यूजियम में रखे हुए हैं। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने ब्रिटेन से इन्हें लौटाने की मांग की थी, जिसे 2010 में खारिज कर दिया गया।

1790 ईसवी में एक खुदाई में ब्रिटिश अफसर को अमरावती रेलिंग्स के ये अवशेष मिले।
1790 ईसवी में एक खुदाई में ब्रिटिश अफसर को अमरावती रेलिंग्स के ये अवशेष मिले।

5. भोजशाला की सरस्वती/अंबिका प्रतिमाः 1880 में ब्रिटिश म्यूजियम ने 4 फीट ऊंची सफेद मार्बल की एक देवी प्रतिमा का अधिग्रहण किया। 11वीं शताब्दी की ये प्रतिमा मध्य प्रदेश के धार से मिली थी। इसे जैन देवी अंबिका की प्रतिमा माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से कई हिंदू संगठन इसे सरस्वती की प्रतिमा मानते हैं। ब्रिटिश म्यूजियम से इस प्रतिमा को भी वापस लौटाने की मांग उठती रही है।

इसे जैन देवी अंबिका की प्रतिमा माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से कई हिंदू संगठन इसे सरस्वती की प्रतिमा मानते हैं।
इसे जैन देवी अंबिका की प्रतिमा माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से कई हिंदू संगठन इसे सरस्वती की प्रतिमा मानते हैं।
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