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सारी मेहनत पानी में:सुनसान एयरपोर्ट से वीरान राजधानी तक; दुनिया के 5 मेगा प्रोजेक्ट्स की कहानी, जिसमें हुई सिर्फ पैसों की बर्बादी

16 दिन पहले

एक राजधानी है जो लाखों लोगों के लिए बनाई गई थी, लेकिन फिलहाल वीरान पड़ी है। एक मेगा प्रोजेक्ट है जिसपर अमेरिका ने 1.25 लाख करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए, लेकिन उसका कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। एक अनोखी फॉरेस्ट सिटी है, जिसमें कोई रहने वाला नहीं है। हम यहां दुनिया के पांच मेगा प्रोजेक्ट्स की कहानी पेश कर रहे हैं, जिन्हें बनाने में अरबों डॉलर खर्च हुए, लेकिन आज वो किसी काम के नहीं हैं।

1. मलेशिया की फॉरेस्ट सिटी

मलेशिया में 5 आर्टिफिशियल आइलैंड में फॉरेस्ट सिटी डेवलप करने का मेगा प्रोजेक्ट शुरू हुआ। इसकी लोकेशन सिंगापुर से महज 20 मिनट की दूरी पर थी, इसलिए इन्वेस्टर्स आकर्षित हुए। इसकी डिजाइनिंग में कई ग्रीन इनोवेशन किए गए। इस पूरे शहर को सभी सुख-सुविधाओं के साथ जंगल वाला फील दिया गया। इसमें 2035 तक 100 बिलियन डॉलर यानी करीब 7.45 लाख करोड़ रुपए निवेश किए जाने थे। 50 अपार्टमेंट का एक आइलैंड बनकर तैयार भी हो चुका है।

फेल होने की वजहः इस मेगा प्रोजेक्ट की ज्यादातर फंडिंग चीन से हुई। चीनी नागरिकों को यहां मुफ्त में आने का पास दिया गया। इसका असर ये हुआ कि जो निवेशक अपने देश में महंगे अपार्टमेंट नहीं खरीद सकते थे, उन्होंने फॉरेस्ट सिटी का रुख किया। 2019 तक 80% प्रॉपर्टी के मालिक चीनी हो गए। यहां सड़कों पर लगे साइन से लेकर स्कूल तक में मंदारिन भाषा का इस्तेमाल होने लगा। इससे लोकल मलेशियाई लोगों में आक्रोश बढ़ गया। मलेशिया की सरकार ने यहां विदेशियों के प्रॉपर्टी खरीदने पर बैन लगा दिया।

आज की स्थितिः 7 लाख लोगों के लिए तैयार फॉरेस्ट सिटी में इस वक्त महज 500 लोग रह रहे हैं। नई प्रॉपर्टी बिक नहीं रही। जिन्होंने पहले से खरीद लिया था, वो भी बेचकर जाना चाहते हैं।

2. म्यांमार की नई राजधानी नेपिडो

म्यांमार की मिलिट्री ने 2002 में एक गुप्त राजधानी बनानी शुरू की। 2005 में नेताओं ने नई राजधानी की घोषणा तो की, लेकिन जगह नहीं बताई। आखिरकार 2006 में नई राजधानी नेपिडो की घोषणा की गई और शिफ्टिंग शुरू हुई। 4 अरब डॉलर यानी करीब 30 हजार करोड़ रुपए की लागत से यहां वो सबकुछ बनाया गया, जो लोगों को आकर्षित करता है। 20 लेन का हाइवे, 100 से ज्यादा लग्जरी होटल, गोल्फ कोर्ट और बहुत कुछ। एक चीज जिसकी सबसे ज्यादा कमी है, वो है आबादी।

फेल होने की वजहः हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर, अच्छे कॉलेज और कारोबार के मौकों की कमी की वजह से लोग नेपिडो को अपना ठिकाना नहीं बनाना चाहते।

आज की स्थितिः 20 लेन हाइवे खाली पड़े हैं। होटलों में बुकिंग नहीं है। एयरपोर्ट पर इक्का-दुक्का फ्लाइट आती है। अरबों खर्च करने के बाद भी देश की अधिकांश आबादी के लिए ये राजधानी बेकार है और लोग इसे घोस्ट कैपिटल भी कहते हैं।

3. अमेरिका का यूका माउंटेन न्यूक्लियर वेस्ट रिपोजिटरी

1980 में अमेरिकी सरकार ने न्यूक्लियर वेस्ट का कोई स्थायी समाधान निकालने के लिए कोशिश शुरू की। 1987 में नवादा के यूका माउंटेन को चिन्हित किया गया। योजना बनाई गई कि पूरे देश के न्यूक्लियर वेस्ट को एक टनल के जरिए यूका माउंटेन में 300 मीटर अंदर दबाया जाएगा। 2002 में प्रोजेक्ट को अनुमति मिली और काम शुरू हो गया।

फेल होने की वजहः नवादा के लोगों ने इस रिपोजिटरी का कड़ा विरोध जताया। ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद 2010 में इस प्रोजेक्ट की फंडिंग बंद कर दी गई। 3 साल बाद एक कोर्ट ने काम शुरू करवाया, लेकिन कोई ज्यादा प्रगति नहीं हुई।

आज की स्थितिः अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साफ कर दिया है कि नवादा में न्यूक्लियर वेस्ट रिपोजिटरी नहीं बनाई जाएगी। 17 बिलियन डॉलर यानी करीब 1.25 लाख करोड़ खर्च करने के बाद भी आज तक इस मेगा प्रोजेक्ट का कोई इस्तेमाल नहीं हो सका है।

4. स्पेन का सिउदाद रियाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट

स्पेन के ओवर क्राउडेड मैड्रिड एयरपोर्ट के विकल्प के तौर पर सिउदाद रियाल एयरपोर्ट बनाने का काम शुरू किया गया था। ये सालाना 2 लाख यात्रियों की क्षमता रखता है, जिसे 10 लाख तक बढ़ाने की योजना थी। ये एयरपोर्ट 2009 में शुरू हो गया, लेकिन 2012 में इसे बनाने वाली कंपनी दिवालिया हो गई।

फेल होने की वजहः इस एयरपोर्ट की लोकेशन मैड्रिड से करीब 200 किलोमीटर दूर है। शुरू होने के पहले ही साल ज्यादातर एयरलाइन ने यहां आने से मना कर दिया। 2019 में इसे महज 10 हजार यूरो में नए मालिकों को बेच दिया गया।

आज की स्थितिः 2020 में कोरोना आने के बाद सिउदाद रियाल एयरपोर्ट को विमानों का पार्किंग यार्ड बना दिया गया है, जिससे कुछ आमदनी हुई। हालांकि दोबारा फ्लाइट्स शुरू होने के बाद यहां फिर से सन्नाटा पसरना तय है।

5. हवाई का इंटरस्टेट एच-3

26 किलोमीटर लंबा इंटरस्टेट एच-3 हाईवे बेहद खूबसूरत नजारों के बीच से गुजरता है। इसका प्रस्ताव सबसे पहले 1960 में रखा गया था। तमाम रुकावटों के बाद 1989 में प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ। 1997 में ये बनकर तैयार हो गया। इसमें कुल 1.3 बिलियन डॉलर यानी करीब 10 हजार करोड़ रुपए का खर्च आया। प्रति किलोमीटर के हिसाब से ये दुनिया का सबसे महंगा हाईवे है।

फेल होने की वजहः 1960 के दशक में जिस उद्देश्य से इस हाईवे को बनाने की बात हुई थी, वो 40 साल बाद अप्रासंगिक हो गई। हाईवे का होनोलुलु शहर से कोई डायरेक्ट लिंक भी नहीं है, इसलिए क्षेत्रीय लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते। हवाई का एक समूह इसे शापित भी मानता है क्योंकि इसके बनने में कई धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया।

आज की स्थितिः हवाई का इंटरस्टेट एच-3 आज सुनसान हालत में है। बेहद सुंदर नजारे होने के बावजूद यहां बहुत कम गाड़ियां देखने को मिलती हैं।

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