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भारत में पेमेंट का भविष्य:ना कैश की जरूरत ना कार्ड की, चेहरे और आवाज से हो जाएंगे सभी लेन-देन!

3 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी
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  • नए अविष्कार और ट्रेंड्स पूरी तरह बदल रहे हैं भारत में पेमेंट का तरीका
  • कैशलेस इकोनॉमी के साथ कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की तरफ बढ़ रहा है देश

पांच साल पहले मैं एक कपड़े की दुकान पर गया। अपनी पसंद के कपड़े चुने, पर्स से कैश निकालकर कर पेमेंट किया और सामान लेकर घर आ गया।

दो साल पहले मैं एक सुपरमार्केट गया। अपनी जरूरत का सामान खरीदा। मोबाइल से क्यू-आर कोड स्कैन यानी यूपीआई के जरिए पेमेंट किया और सामान लेकर घर आ गया।

आज सुबह मैं अपनी कार से एक टोल टैक्स से गुजरा। सिस्टम ने खुद ही फैस्टैग स्कैन करके पेमेंट कर लिया और मैं बिना किसी परेशानी के अपनी कार लेकर घर आ गया।

ये सिर्फ मेरा नहीं, पिछले पांच सालों में आपका तजुर्बा भी कुछ ऐसा ही रहा होगा। ऊपर बताई गई तीन बातों में एक चीज जो हर बार बदल रही है वो है पेमेंट का तरीका। दुनिया में जिस तरह से पेमेंट के नए तरीके ईजाद हो रहे हैं वो किसी भी क्षेत्र में हो रहे बदलावों से कहीं तेज और ज्यादा हैं।

भारत की इकोनॉमी में लंबे समय से कैश ही किंग रहा है। उसके बाद बैंक चेक और कार्ड्स का चलन आया। 2016 में नोटबंदी के बाद कैशलेस इकोनॉमी की चर्चा ने जोर पकड़ा। इसी के साथ भारत में मोबाइल पेमेंट्स ने भी रफ्तार पकड़ी।

आज आलम यह है कि भारत में गूगल पे, पेटीएम, फोन-पे और भीम जैसे यूपीआई प्लेटफॉर्म पर हर महीने 1.22 बिलियन यानी करीब 122 करोड़ लेन-देन होते हैं। रोजमर्रा में यह देखा भी जा सकता है। सब्जी वाले से लेकर अखबार वाले तक, चाय की दुकान से लेकर फाइव स्टार होटल तक हर जगह डिजिटल पेमेंट अपनाया जा रहा है।

कैश से लेकर डिजिटल पेमेंट तक, लेन-देन के तरीकों ने भारत में एक लंबा रास्ता तय कर लिया है। लेकिन सवाल उठता है कि अब आगे क्या? भारत में पेमेंट का भविष्य क्या होगा? अंगूठा, चेहरा या आवाज के जरिए पैसों के लेन-देन की बात कितनी सच है और कितना अफसाना। हमने यहां इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश की है।

पांच इनोवेशन पर टिका है, भारत में पेमेंट का भविष्य

जनवरी 2018 में अमेरिका के सिएटल शहर में अमेजन ने एक अनोखा स्टोर खोला। ‘अमेजन गो’ नाम के इस ग्रॉसरी स्टोर में आपको बिलिंग के लिए लाइन में लगने की जरूरत नहीं है। आपको स्टोर में दाखिल होना है। मोबाइल ऐप स्कैन करना है। स्टोर से अपनी जरूरत का सामान उठाना है और लेकर घर चले जाना है।

बाकी सारा काम सिस्टम कर देगा और आपके सामान का बिल आपके मोबाइल ऐप पर आ जाएगा। फिलहाल ‘अमेजन गो’ जैसा स्मार्ट स्टोर भारत में खुलने में भले ही थोड़ा वक्त लगे, लेकिन पेमेंट इंडस्ट्री में कुछ बड़े इनोवेशन हैं जो बहुत जल्द देखने को मिल सकते हैं या दिखना शुरू हो चुके हैं…

1. अंगूठे में छिपी है बैंक की चाबी ‌‌(Biometric Authentication)

स्मार्टफोन की दुनिया में बॉयोमेट्रिक टेक्नोलॉजी कोई नई बात नहीं है। आप अपना स्मार्टफोन या लैपटॉप फिंगर प्रिंट के जरिए अनलॉक करते होंगे। अब इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पेमेंट की दुनिया में करने की कोशिश हो रही है। बॉयोमेट्रिक के इस्तेमाल से दो बातें होंगी। पहला, आपको पिन याद रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरा, कोई दूसरा फ्रॉड करके आपकी जगह पेमेंट नहीं कर सकेगा। इससे पेमेंट करते वक्त आपको आसानी होगी, सुरक्षा महसूस होगी और ये अन्य माध्यमों की अपेक्षा तेज भी होगा।

भारत में स्थितिः फिलहाल भारत में पेमेंट के लिए बॉयोमेट्रिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। UK में कुछ बैंक ट्रॉयल मोड पर बॉयोमेट्रिक कार्ड जारी कर रहे हैं। पेमेंट गेटवे कंपनी रेजर पे के हर्षिल माथुर का कहना है कि इस दिशा में बड़ी कंपनियां इनोवेशन कर रही हैं। जल्द ही पेमेंट की दुनिया से पिन की जगह बॉयोमेट्रिक जैसी टेक्नोलॉजी ले सकती है।

2. आवाज ही पहचान है (Voice Payments)

आपको याद होगा वॉयस असिस्टेंस का इस्तेमाल कैसे जोक बनाने के लिए किया जाता था। अलेक्सा से कोई उल्टा-सीधा सवाल पूछो और मजेदार जवाब मिलता था। लेकिन उस वक्त कहां अंदाजा था कि फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आपकी आवाज को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। सभी की आवाज में एक खूबी होती है। इसी खूबी और अनोखेपन का इस्तेमाल पेमेंट की दुनिया में करने की तैयारी है। अमेजन पे और गूगल पे जैसी बड़ी कंपनियां इस दिशा में ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अगर यह प्रयोग सफल हो जाता है तो वॉयस पेमेंट का यह तरीका बेहद सहूलियत भरा और तेज साबित होगा।

भारत में स्थितिः भारत में वॉयस पेमेंट अभी दूर की कौड़ी है। US में इस पर काम किया जा रहा है। हालांकि इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर है।

3. चेहरे में वो जादू है (Face Recognition)

अब तक तमाम फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन के इर्द गिर्द ही इनोवेशन कर रही हैं। लेकिन फेस रिकग्निशन टेक्नोलॉजी को ऐसे डिजाइन किया जा रहा है, जिसमें मोबाइल फोन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आपका चेहरा ही आपका बैंक अकाउंट और पासवर्ड बन जाएगा। पेमेंट के इस तरीके से कैश, कार्ड, मोबाइल की सारी झंझट ही खत्म हो जाएगी।

चीन ने पेमेंट के इस तरीके को अपना भी लिया है। इसमें ग्राहक को POS (प्वाइंट ऑफ सेल) मशीन के सामने खड़ा किया जाता है। मशीन में एक कैमरा लगा होता है जिसमें ग्राहक की तस्वीर ली जाती है और पहचान के बाद पेमेंट ट्रांसफर हो जाता है। पेमेंट का यह तरीका बेहद तेज और आसान है।

भारत में स्थितिः भारत में फेस रिकग्निशन टेक्नोलॉजी अभी नहीं आई है। लेकिन कुछ बातें हैं जो उम्मीदें जगाती हैं। मसलन भारत में आधार कार्ड में फिंगर प्रिंट, चेहरे और आंख की जानकारी मौजूद होती है। फिनटेक कंपनियां इस डेटा का इस्तेमाल करके जल्द ही कोई तरीका निकाल सकती हैं, जिससे पेमेंट बेहद आसान और सुरक्षित हो जाएगा।

4. कार्ड भी हो रहे एडवांस (Tap-and-go Payment)

कार्ड से पेमेंट करने का तरीका क्या है? पहले कार्ड को POS मशीन में स्वैप करो। पिन एंटर करके ऑथेंटिकेट करो। तीसरे स्टेप में आपका पेमेंट हो जाता है। लेकिन जल्द ही ये गुजरे जमाने की बात हो सकती है। अब टैप एंड गो पेमेंट का जमाना आने वाला है। यानी अब आपको अपना कार्ड मशीन में स्वैप कराने या पिन डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

सिर्फ कार्ड को मशीन में टैप करो और सामान लेकर घर जाओ। बाकी काम कार्ड में लगे ईएमवी चिप और आरएफआईडी एंटिना के जरिए सिस्टम खुद ब खुद कर लेगा। फिलहाल सिंगापुर और दक्षिण कोरिया में टैप एंड गो पेमेंट का चलन तेजी से बढ़ रहा है।

भारत में स्थितिः भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वीजा, मास्टरकार्ड और एनपीसीआई को टैप एंड गो पेमेंट के लिए हरी झंडी दे दी है। कई शॉपिंग स्टोर पर इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। कई जगह पेमेंट सिस्टम में जरूरी अपग्रेड की प्रक्रिया चल रही है।

5. जादू से हो जाएगी पेमेंट (Invisible Payments)

डिजिटल पेमेंट से एक कदम आगे की टेक्नोलॉजी है इनविजिबल पेमेंट। इसमें आपको सामान या सेवा के बदले तत्काल कोई पेमेंट नहीं करना है। आपके खाते से एक तय समय सीमा के अंदर पैसे काट लिए जाएंगे। इसके लिए आपको पहले से सहमति देनी होगी। इसको एक उदाहरण से समझते हैं।

जैसे आपने नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन लिया। उसके बाद आपको हर महीने पेमेंट करने की जरूरत नहीं। आपके अकाउंट से इनविजिबल तरीके से पैसे काट लिए जाएंगे और आपकी सर्विस रिन्यू हो जाएगी। इनविजिबल पेमेंट को कैब सर्विस ऊबर कई देशों में इस्तेमाल कर रहा है।

भारत में स्थितिः भारत में भी इनविजिबल पेमेंट आंशिक रूप से इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि भारत में इसे लेकर कई तरह की चुनौतियां भी हैं। इस सेक्टर के जानकार नवीन सूर्या का कहना है कि पेमेंट पूरी तरह से इनविजिबल कभी नहीं होगी। ये जरूर हो सकता है कि पेमेंट का तरीका बिल्कुल आसान हो जाए और पिन या कार्ड की जरूरत भी ना पड़े।

आइए, अब आपको बताते हैं कि भारत में पेमेंट इंडस्ट्री के मौजूदा हालात क्या हैं और ये किस गति से किस दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके लिए हम तीन ग्राफिक्स और हाल ही में लिए गए दो बड़े फैसलों का इस्तेमाल करेंगे और आपको पूरा ट्रेंड समझाने की कोशिश करेंगे।

पांच साल में 55% की दर से बढ़ा मोबाइल पेमेंट

भारत में सस्ते स्मार्टफोन और आसानी से उपलब्ध सस्ते इंटरनेट ने ऐप्स का चलन बढ़ा दिया है। एनालिटिक्स फर्म AppAnnie की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ऐप डाउनलोड के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है। ऐप के क्षेत्र में आई इस क्रांति ने पेमेंट इंडस्ट्री में भी बहार ला दी है। पिछले 5 साल के दौरान देश में डिजिटल पेमेंट कई गुना बढ़ा है। RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 से 2019-20 के बीच डिजिटल पेमेंट 55.1 प्रतिशत वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ा है। इन आकंड़ों को ग्राफिक्स के जरिए आसानी से समझ सकते हैं।

हर दुकान तक पहुंची मोबाइल पेमेंट की सुविधा

मोबाइल हर हाथ में आने के साथ ही मोबाइल पेमेंट भी हर दुकान तक पहुंच गया है। पेटीएम अकेले 1 करोड़ 60 लाख व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पेमेंट सहयोगी है। इसकी तुलना में कार्ड वाले प्वाइंट ऑफ सेल की संख्या पूरे देश में महज 50 लाख है। छोटे व्यापारिक प्रतिष्ठान क्यूआर-कोड वाले पेमेंट विकल्प को अपना रहे हैं। यह इस्तेमाल में आसान है और इसकी लागत भी कम है। साथ ही ग्राहकों के लिए भी यह सुविधाजनक है।

इसमें सोने पर सुहागा साबित हो रहा है नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का एक केंद्रीयकृत पेमेंट सिस्टम जो सभी तरह के बिलर्स और पेमेंट एग्रीगेटर्स को एक छतरी के नीचे ले आया है। मसलन, गूगल पे इंडिया या अमेजन पे जैसे ऐप से ग्राहक अब अपने टेलीकॉम, गैस, बिजली और इंश्योरेंस बिल भी घर बैठे जमा कर सकते हैं।

डिजिटल वॉलेट गिन रहा अंतिम सांसें, UPI की धूम

भारत में शुरुआती दिनों में पेटीएम ने वॉलेट सेवा शुरू की थी। इसमें आप एक निश्चित रकम रख सकते थे और उसे छोटी-मोटी खरीद के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। ये वॉलेट एक तरीके से कैश का विकल्प बन रहे थे। लेकिन इन डिजिटल वॉलेट्स की अपनी सीमाएं थीं। मसलन एक पेटीएम वॉलेट यूजर सिर्फ दूसरे पेटीएम वॉलेट यूजर को ही पैसे भेज सकता था।

2016 में UPI की लॉन्चिंग के साथ ही डिजिटल पेमेंट की दुनिया में एक क्रांति आ गई। UPI ने सीधे बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा दी। वॉलेट में आपके पैसे पर कोई ब्याज नहीं मिलता लेकिन बैंक में जमा पैसे पर ब्याज मिलता है। वॉलेट में KYC जैसी झंझट है, जबकि UPI में ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता। इसलिए धीरे-धीरे भारत में भी लोग डिजिटल वॉलेट से UPI की तरफ मुड़ गए। ग्राफिक्स में दिया आंकड़ा सारी कहानी कह रहा है।

अब आखिर में बात करते हैं हाल ही में लिए गए दो बड़े फैसलों की जो आने-वाले दिनों में भारत में पेमेंट का भविष्य तय कर सकते हैं...

पहला फैसलाः 'वॉट्सऐप-पे' को पेमेंट सेवा की अनुमति

एनपीसीआई ने वॉट्सऐप को भारत में भुगतान सेवा शुरू करने की अनुमति दे दी है। भारत में वॉट्सऐप के 400 मिलियन, यानी करीब 40 करोड़ यूजर्स हैं। पेमेंट की मंजूरी मिलने से अब पैसे मैसेज भेजने जितना आसान हो सकता है। फिलहाल वाट्सएप अपने सिर्फ 20 लाख यूजर्स को ये सर्विस दे रहा है। वॉट्सऐप के बड़े यूजर बेस को देखते हुए अन्य पेमेंट कंपनियां जरूर चिंतित होंगी। वॉट्सऐप पे डिजिटल पेमेंट की दुनिया की एक नई तस्वीर बना सकता है लेकिन इस राह में एनपीसीआई का नया नियम एक बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है।

दूसरा फैसलाः एनपीसीआई ने लगा दिया बैरिकेड

एनपीसीआई ने हाल ही में एक नया नियम जारी किया है जिसमें कोई भी थर्ड पार्टी UPI ऐप कुल UPI लेन-देन का अधिकतम 30 प्रतिशत ही अपने प्लेटफॉर्म पर कर सकता है। इसको ऐसे समझे कि अगर भारत में UPI से कुल ट्रांजैक्शन 100 रुपये का होता है तो गूगल पे, फोन पे या वॉट्सऐप पे जैसी कंपनियां अधिकतम 30 रुपये तक का ही ट्रांजैक्शन कर सकती हैं। एनपीसीआई का तर्क है कि इससे बाजार में किसी कंपनी का एक छत्र राज नहीं हो पाएगा। फिलहाल गूगल पे, फोन पे, पेटीएम और अमेजन पे मिलकर UPI बाजार का 97 प्रतिशत ट्रांजैक्शन करते हैं। जबकि केपीएमजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल 45 से ज्यादा मोबाइल वॉलेट और करीब 50 UPI आधारित ऐप्स हैं।

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