J&k अध्यक्ष नहीं बनाने से खफा गुलाम नबी:कैंपेन कमेटी छोड़ी पर कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे; मोदी से दोस्ती, लेकिन BJP में जाना मुश्किल

एक महीने पहलेलेखक: प्रेम प्रताप सिंह

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने के दो घंटे के भीतर ही गुलाम नबी आजाद ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद ये चर्चा होने लगी कि क्या वे BJP में जा रहे हैं। क्या वह अलग पार्टी बनाएंगे। हालांकि, आजाद के एक करीबी ने साफ किया है कि वे फिलहाल कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस में रहकर ही अपनी बात उठाते रहेंगे।

आजाद और कांग्रेस की सियासत को करीब से जानने वालों का भी मानना है कि वे पार्टी में ही रहेंगे। अभी BJP जॉइन करना भी बहुत मुमकिन नहीं लग रहा है, भले ही उनके PM मोदी से अच्छे संबंध हैं।

73 साल के आजाद अपनी सियासत के आखिरी पड़ाव पर फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालना चाह रहे थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी बजाय 47 साल के विकार रसूल वानी को ये जिम्मेदारी दे दी। वानी गुलाम नबी आजाद के बेहद करीबी हैं। वे बानिहाल से विधायक रह चुके हैं। आजाद को यह फैसला पसंद नहीं आया। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व आजाद के करीबी नेताओं को तोड़ रहा है।

आजादी की 75 वीं सालगिरह पर कांग्रेस ने महंगाई-भ्रष्टाचार के विरोध में मार्च निकाला था। इसमें गुलाम नबी आजाद भी शामिल हुए थे।
आजादी की 75 वीं सालगिरह पर कांग्रेस ने महंगाई-भ्रष्टाचार के विरोध में मार्च निकाला था। इसमें गुलाम नबी आजाद भी शामिल हुए थे।

गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस हाईकमान के बीच पिछले डेढ़ साल से टकराव चल रहा है। सुलह की बजाय यह टकराव लगातार बढ़ रहा है। बताया जाता है कि कांग्रेस नेतृत्व जम्मू-कश्मीर में गुलाम नबी आजाद के सियासी प्रभाव को कम करना चाह रहा है। गुलाम नबी आजाद भी लीडरशिप को समय-समय पर चुनौती दे रहे हैं। आजाद की नाराजगी कांग्रेस को 2022 के विधानसभा चुनाव में महंगी पड़ सकती है, क्योंकि जम्मू कश्मीर कांग्रेस में गुलाम नबी आजाद ही सबसे प्रभावशाली नेता हैं।

गुलाम नबी के विरोध पर मीर हटे, नया चेहरा भी नापसंद
गुलाम नबी आजाद पिछले प्रदेश अध्यक्ष अहमद मीर का विरोध कर रहे थे। मीर से उनकी लंबे समय से अनबन चल रही थी। उन्हीं के दबाव में कांग्रेस आलाकमान ने मीर को हटाया भी था। कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आजाद के करीबी को दायित्व भी दे दिया, लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आया। इतना ही नहीं आजाद के करीबी लोगों को किसी न किसी पद पर रखा जा रहा है, लेकिन मन की बात पूरी न होने पर आजाद ने खराब सेहत की वजह से कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष का पद संभालने से इनकार कर दिया।

आजाद ने पार्टी को उस वक्त झटका दिया, जब उनके 20 करीबियों ने प्रदेश कांग्रेस पार्टी में अपनी जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया था। इससे आजाद जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी में अपनी पैठ मजबूत करना चाह रहे थे, लेकिन आलाकमान ने झुकने की बजाय इस्तीफा मंजूर कर लिया।

जम्मू क्षेत्र के रामबन, डोडा, किश्तवाड़, रियासी और उधमपुर जिले में आजाद का ज्यादा प्रभाव हैं। इन 5 जिलों में विधानसभा की 12 सीटें हैं। 8 महीने पहले इन जिलों पर ध्यान लगाकर आजाद किंगमेकर बनने की कोशिश कर रहे थे।

विरोध मार्च में आजाद राहुल और प्रियंका के काफी नजदीक रहे थे। इससे संकेत दिया गया कि पार्टी एकजुट है।
विरोध मार्च में आजाद राहुल और प्रियंका के काफी नजदीक रहे थे। इससे संकेत दिया गया कि पार्टी एकजुट है।

राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद से ही टकराव बढ़ा
गुलाम नबी आजाद का राज्यसभा का कार्यकाल 15 फरवरी 2021 को पूरा हो गया था। उसके बाद उन्हें उम्मीद थी कि किसी दूसरे राज्य से उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा। आजाद का कार्यकाल खत्म होने वाले दिन उन्हें विदाई देते हुए PM नरेंद्र मोदी भावुक हो गए थे।

पिछले साल 2021 में मोदी सरकार ने गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण सम्मान दिया था। कांग्रेस के कई नेताओं को यह पंसद नहीं आया। नेताओं ने सुझाव दिया था कि आजाद को यह सम्मान नहीं लेना चाहिए।

गुलाम नबी आजाद की राज्यसभा से विदाई के वक्त अपने भाषण में PM मोदी ने उन्हें दोस्त बताया था।
गुलाम नबी आजाद की राज्यसभा से विदाई के वक्त अपने भाषण में PM मोदी ने उन्हें दोस्त बताया था।

आर्टिकल 370 हटाने के विरोधी, BJP में नहीं जाएंगे
केंद्र सरकार ने 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म कर दिया था। इसका BJP के अलावा प्रदेश की सभी पार्टियां विरोध कर रही हैं। प्रदेश की सियासत इसी पर टिकी है। गुलाम नबी आजाद निजी तौर पर भी आर्टिकल 370 खत्म करने का विरोध कर रहे थे। ऐसे में वह कांग्रेस छोड़कर BJP में जाते हैं तो उन्हें विरोध झेलना पड़ सकता है। जिन जिलों में आजाद का प्रभाव है, वहां भी असर होगा। 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 12 सीटें ही मिली थीं। यहां कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी थी।

कांग्रेस की हार पर बगावती हुए थे आजाद
5 महीने पहले 5 राज्यों में मिली करारी हार के बाद गुलाम नबी आजाद के घर पर कांग्रेस के असंतुष्ट G-23 गुट की डिनर मीटिंग हुई थी। इसके बाद पार्टी में नेतृत्व को लेकर विद्रोह की अटकलें शुरू हो गई थीं। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में सोनिया और राहुल-प्रियंका ने इस्तीफे की पेशकश की थी, जिसे बैठक में मौजूद नेताओं ने ठुकरा दिया था।

तब से G-23 गुट लोकसभा चुनाव के लिए भरोसेमंद विकल्प पेश करने की बात कर रहा था। इससे पार्टी में टूट का खतरा पैदा हो गया था। बाद में ये खतरा टल गया।

10 जनपथ पर सोनिया गांधी और गुलाम नबी आजाद के बीच मुलाकात हुई। इसके बाद आजाद ने कहा था कि सोनिया अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। हमने पार्टी की मजबूती के लिए कुछ सुझाव दिए हैं। उनकी मांगों पर सवाल पूछे जाने पर आजाद ने कहा- इसे सार्वजनिक नहीं कर सकते।

जी-23 में भी फूट, आठ कांग्रेसियों ने खुद को अलग किया
गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस के नाराज नेताओं के साथ जी-23 बनाया था। इनमें से 8 ने खुद को अलग कर लिया। एक नेता जितिन प्रसाद ने UP विधानसभा चुनाव से पहले BJP का दामन थाम लिया था। असंतुष्ट खेमे में अब सिर्फ 14 नेता बचे हैं। इनमें गुलाम नबी आजाद, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पृथ्वीराज चव्हाण पूर्व CM रह चुके हैं। इनके अलावा ज्यादातर नेताओं का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है।

राज्यसभा टिकट के बंटवारे पर भी नाराज हुए थे आजाद
तीन महीने पहले राज्यसभा के लिए कैंडिडेट्स की लिस्ट जारी होने के बाद भी कांग्रेस में कलह शुरू हो गई थी। कांग्रेस सिर्फ 10 लोगों को राज्यसभा भेज सकती थी, लेकिन दावेदार 20 से ज्यादा हो गए। इनमें गुलाम नबी आजाद भी शामिल थे। उन्हें टिकट नहीं मिली। इस पर आजाद ने सोनिया गांधी से बात भी की थी।

तय है कि नबी कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे
वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई का मानना है कि 'गुलाम नबी आजाद कोई बड़ा पद चाह रहे थे, लेकिन उनके मन मुताबिक पद नहीं मिला। इसलिए शायद उन्होंने पार्टी से नाराज होकर कांग्रेस कैंपेन कमेटी के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, कांग्रेस से आजाद के करीबी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, लेकिन वे अपने लिए भी बड़ी भूमिका चाह रहे थे। वैसा पद उन्हें नहीं मिला। यह भी तय है कि वह कांग्रेस छोड़कर कहीं नहीं जा रहे। वह कांग्रेस में ही रहेंगे।

BJP में तो आजाद शायद ही शामिल हों
BJP को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह बताते हैं कि गुलाम नबी आजाद और PM मोदी के बीच दोस्ती है। यह जगजाहिर है, लेकिन दोस्ती के जरिए आजाद BJP में आएंगे। यह कहना गलत होगा। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है। कब क्या हो जाए। यह कहना मुश्किल है, लेकिन अभी जो स्थितियां है। उससे तो आजाद BJP में शायद ही शामिल हों।

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