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बात बराबरी की:लड़कियों की लड़ाई हमेशा ही बेडरूम चुटकुले जैसी चटकारेदार रही है, मानो वो लड़ती हैं और मुल्क बंट जाते हैं

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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कुछ रोज पहले लखनऊ से एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक होटल के सामने लड़कियां गुत्थमगुत्था थीं। वे एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींच रही थीं, बीच-बीच में बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह गाली-गुफ्तार भी चल रही थी। शायद इस झोंटा-कुटाई में स्ट्रॉबेरी से भी ज्यादा रस रहा हो जो वीडियो तेजी से फैला। इसे कांग्रेसी नारे 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' से जोड़ते हुए दनादन मीम्स बने। वैसे लड़कियों की लड़ाई हमेशा ही लोगों के लिए बेडरूम चुटकुले जैसी चटकारेदार रही। मान लिया गया कि जहां दो लड़कियां इकट्ठा हों, वहां सिर-फुटौवल होगी ही। चूल्हे से लेकर मुल्क और दिलों का बंटवारा भी लड़कियां ही करती आई हैं।

महाभारत की लड़ाई भी कथित तौर पर 'द्रौपदी' के चलते हुई थी। द्रौपदी शायद हिंदुस्तान की पहली बागी औरत रही होगी। उसने दूसरों की गलतियों पर शर्म से मुंह में पल्लू नहीं ठूंसा, बल्कि भरी सभा में उन्हें ललकारा। द्रौपदी के खुले केशों से होते हुए खून कुरुक्षेत्र की जमीन को रंगने लगा। इसके बाद से लेकर अब तक, हजारों साल बीते, लेकिन महाभारत शब्द औरतों से ऐसे चिपका, जैसे ताजा सुबह के साथ टूथपेस्ट की आदत।

औरतें या तो खुद लड़ती हैं या फिर मर्दों को लड़वाती हैं- इस बात को पक्का करने के लिए कई मुहावरे गढ़े गए। जर (दौलत) और जमीन के साथ जोरू (पत्नी) को सारे फसाद की जड़ बताकर मर्द आराम से जंग के मैदान की ओर निकल पड़े। इधर, औरतें मरती हैं। वे अपने मासूम बच्चों को अपनी आंखों के आगे दम तोड़ता देखती हैं। ये वो मौतें हैं, जिनमें कोई गर्व नहीं होता। यहां होती है तो केवल दहशत और शर्म। साथ में, कई बार उम्र से भी लंबा इंतजार- अपने साथी के लौटने का। या फिर उस वक्त का, जहां वे बिना डरे बाजार जा सकें।

दो मर्दों में बीड़ी के कश के बीच लड़ाई होती है। कुछ रोज बाद एक घर की बेटी गायब हो जाती है और फिर उसकी नुची हुई देह किसी खेत-नाले के पास पड़ी मिलती है। ये बेजान देह जीत का ताज है, जो पुरुष के सिर पर हीरा-जड़े मुकुट की तरह सजेगा।

कबीलाई सभ्यता में पशुधन के लिए लड़ाइयां हुआ करतीं। तब गाय-भेड़ों के साथ खूबसूरत औरतें भी उठा ली जाती थीं। इन औरतों के पैरों या गले में चांदी का कड़ा डाल दिया जाता। ये कड़ा चमचमाता तो था, लेकिन हार की स्याही में डूबकर।

अब आते हैं ताजा और देसी लड़ाई पर। साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान की हार के बाद वहां के जनरल याहया खान ने कहा था कि वो उतने भड़के नहीं होते, अगर भारत का नेता इंदिरा गांधी की बजाए कोई पुरुष होता। भारत में महिला लीडर का होना पड़ोसी मुल्क के लिए सांड को लाल कपड़ा दिखाने जैसा साबित हुआ। शराबनोशी और रंगीनमिजाजी के लिए कुख्यात इस जनरल के सीधे शब्द थे- अगर औरत (इंदिरा) सोचती है कि वो मुझे डरा सकती है तो मैं उसे इसका मजा चखाऊंगा। भड़के हुए जनरल का गुस्सा हालांकि किसी काम नहीं आ सका और पाकिस्तान मुंह के बल गिरा था।

3500 ईसा पूर्व से लेकर 20वीं सदी के आखिर-आखिर तक दुनियाभर में हुई लड़ाइयों में करीब 164 करोड़ मौतें हुईं। इन मौतों का जिक्र इतिहास में बार-बार है, लेकिन इसके अलावा भी लाखों जानें, युद्ध या उससे पैदा हुए हालातों के कारण गईं। व्यापार बंद हुए। नदियां रोक दी गईं। हर युद्ध के बाद अकालों का सिलसिला चला, जिनमें पटापट जानें गईं। ये लड़ाइयां रोटी या दौलत के लिए नहीं, बल्कि सनक से उपजी थीं- खुद को ज्यादा ताकतवर दिखाने और रहस्य सुलझाने की।

जंग रहस्यों से भरी होती है। दुश्मन कौन हैं, ये पता होता है लेकिन हमला कहां से और कैसे करेंगे, ये रहस्य होता है। रहस्य पुरुषों को लुभाता है। ठीक वैसे ही, जैसे स्त्री-देह या फिर क्रॉसवर्ड पजल। वे इसे खोजने में महीनों या कई बार पूरी जिंदगी खपा देते हैं। वे भूल जाते हैं कि घर पर पत्नी इंतजार कर रही है कि बच्चों का स्कूल छूट गया है, फ्रिज में सब्जियां खत्म हैं। वे युद्ध कर रहे होते हैं। इधर, छूटे हुए घरों में पहले अनाज खत्म होता है, फिर लोग, लेकिन पुरुष लड़ रहे होते हैं।

वियतनाम युद्ध कवर कर चुके पत्रकार फिलिप कप्टो ने अपनी किताब ए रूमर ऑफ वॉर (A Rumor of War) में लिखा था- रुटीन कामों से उकताया पुरुष युद्ध का इंतजार करता है। उसे साग-भाजी लाने या पैसे कमाने से छुट्टी मिल जाती है। वो जंग के मैदान को हॉलीडे की तरह एंजॉय करता है। साथ में ये लालच भी होता है कि लौटेगा तो जीत का मुकुट उसके माथे होगा। ये मुकुट नई नौकरी, रुतबा और इंतजार खत्म होने पर फफककर रोती स्त्री भी हो सकती है, या फिर शांति पुरस्कार भी हो सकता है।

युद्ध पुरुष छेड़ते हैं और उसे खत्म करने के बाद शांति पुरस्कार भी उन्हीं के हिस्से आता है। औरतें न युद्ध में शामिल होती हैं, न शांति पुरस्कारों में। वे हिस्सा बनती हैं तो चुटकुलों का। या फिर जहरीले किस्सों का, जो बताते हैं कि फलां जंग औरत की मूर्खता या जिद के कारण हुई।

हम औरतों ने अब तक कोई सीधी लड़ाई नहीं लड़ी। हम घायल सैनिकों के जख्मों पर फाहा रखती रहीं, लेकिन अब वक्त आ चुका है। लड़कियों, अबकी एक जंग तुम्हें भी लड़नी होगी। घुन लगे दिमागों से जंग। यहां तुम्हारी सोच ही युद्ध का मैदान होगी, और खुली हुई आवाज तुम्हारा हथियार। तो लड़ो। ऐसे लड़ो कि फिर युद्ध रुके तो सिर्फ शांति हो, और बराबरी हो।

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