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टूलकिट मामले के बहाने एक पुराना किस्सा:क्या अमेरिका ने की थी भारत में मच्छरों के सीक्रेट प्रयोग की साजिश? आज हम इससे क्या सीख सकते हैं?

15 दिन पहले
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ग्रेटा थनबर्ग टूलकिट केस में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को गिरफ्तार कर लिया गया है। और दो अन्य लोगों निकिता जैकब और शांतनु के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है। इस मामले में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है, जब देश को नुकसान पहुंचाने के लिए विदेशी ताकतों की साजिश का दावा किया जा रहा हो। पहले भी कई मामलों में सरकारें यह दावा करती आई हैं। 1970 के दशक का एक विदेशी साजिश का दावा बहुत रोचक है। इसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एक सीक्रेट मिशन को भारतीयों पर लागू करने का आरोप लगा था। इस प्रयोग में मच्छरों और अन्य कीड़ों में बदलाव करके भारतीयों पर उनके असर का अध्ययन किए जाने की बात कही गई थी।

मानवाधिकार वकील नंदिता हक्सर ने वेबसाइट स्क्रॉल पर इससे जुड़ा एक लेख लिखा है। नंदिता, इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीएन हक्सर की बेटी हैं। उनके मुताबिक, एक युवा पत्रकार उनके पिता से मिलने आया और मच्छरों पर होने वाले एक विचित्र प्रयोग का दावा किया। पत्रकार के मुताबिक, मच्छरों पर यह प्रयोग दिल्ली के IGI एयरपोर्ट (तब पालम एयरपोर्ट) के पास किए जा रहे हैं। जिस पत्रकार ने यह दावा किया, वह कोई साधारण पत्रकार नहीं थे। उनका नाम चक्रवर्ती राघवन था और वे आगे चलकर प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) के प्रमुख बने।

नंदिता के मुताबिक, 'राघवन का दावा था कि यह प्रयोग यलो फीवर पर किया जा रहा है।' जिस पर पीएन हक्सर ने उनसे कहा था, 'लेकिन भारत में यलो फीवर है ही नहीं।' इसपर राघवन ने उन्हें बताया कि ऐसा करके अमेरिका एक बायोलॉजिकल युद्ध की तैयारी का भारत में एक्सपेरिमेंट कर रहा है।

आपातकाल के दौरान छोड़ा देश, फिलहाल स्विट्जरलैंड में
आपातकाल के दौरान राघवन ने इंदिरा गांधी का विरोध किया और भारत छोड़ दिया। गूगल के मुताबिक, वे 1978 से ही स्विट्जरलैंड के जेनेवा में रह रहे हें। वह साउथ-नॉर्थ डेवलपमेंट मॉनिटर मैगजीन के एडिटर एमेरिट्स रह चुके हैं। वो व्यापार, वित्त और विकास से जुड़े मुद्दों पर लिखते रहे हैं।

राघवन ने यह भी खुलासा किया था कि जब उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर कहानी की तह में जाने की कोशिश की तो पीएन हक्सर ने उनकी और PTI के साइंस रिपोर्टर केएस जयरामन की मदद की और इंटेलिजेंस ब्यूरो, रॉ और मिलिट्री इंटेलीजेंस को उनसे मिलने के लिए कहा।

आलोचना के बाद प्रोजेक्ट बंद करने की बात कही गई
राघवन ने इस मामले पर छपे एक लेख में लिखा, 'जयरामन और मैंने गहन जांच की और भारत में चल रही 'रिसर्च' गतिविधियों में कई विदेशी ताकतों का हाथ होने का खुलासा किया। इनमें से ज्यादातर अमेरिका से फंड पा रही थीं और कुछ का बायोलॉजिकल युद्ध के साथ ही सैन्य महत्व भी था।' इसी में लिखा गया था, 'स्वास्थ्य मंत्री करण सिंह ने संसद में हमारी आलोचना की लेकिन दो स्वतंत्र पब्लिक एकाउंट्स कमेटियों (PAC) ने हमें सही ठहराया।' इनमें से एक PAC के नेता CPI (M) के ज्योतिर्मय बसु ने इस मामले में इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखकर चेताया भी था।

गूगल करने पर इस मामले से जुड़ा 9 अक्टूबर, 1975 का एक समाचार मिलता है। न्यू साइंटिस्ट में प्रकाशित इस लेख की हेडलाइन थी- 'कीड़ों के जरिए युद्ध के आरोपों ने WHO को भारतीय मच्छर प्रोजेक्ट से बाहर निकलने पर मजबूर किया...' रिपोर्ट में कहा गया था, 'PAC की रिपोर्ट यह घोषणा करती है कि जेनेटिक कंट्रोल ऑफ मॉस्किटोस रिसर्च यूनिट (GCMRU) प्रोजेक्ट को बुरी तरह से लागू किया गया और भारत के लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं है। केवल अमेरिका को इससे फायदा होना है।'

राघवन लिखते हैं, 'जब तक स्टोरी छपी पीएन हक्सर PM ऑफिस से बाहर हो चुके थे और योजना आयोग में चले गए थे। सरकार पर संजय गांधी का नियंत्रण था और अमेरिका खुफिया एजेंसी CIA के क्रेइसबर्ग उनके करीबी थे।' राघवन लिखते हैं, 'हम अडिग रहे, इंदिरा गांधी हमसे गुस्सा भी हुईं लेकिन उन्होंने कार्रवाई की और अंतत: इन प्रोजेक्ट्स को बंद करना पड़ा।'

चक्रवर्ती राघवन के तमाम दावों के बावजूद यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि यह योजनाएं थीं क्या और इन्हें कहां और किन उद्देश्यों से चलाया जा रहा था। देश के खिलाफ विदेशी शक्तियां कोई साजिश कर रही हैं, इसको लेकर कई आरोप सामने आते हैं लेकिन इनसे कुछ खास हासिल नहीं होता। ऐसा ही कुछ टूलकिट मामले में भी लग रहा है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के प्रोफेसर मणिंद्रनाथ ठाकुर कहते हैं, 'आंदोलन की आड़ में किसी बड़ी घटना की साजिश न हो, इसके लिए सरकार का एलर्ट रहना जायज है। लेकिन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ गैरजमानती वारंट वाली पुलिस और सरकार की कार्रवाई पलटवार की भावना से की गई लगती है।'

विदेशी साजिश में दिशा रवि के रोल को लेकर स्पष्टता नहीं
ठाकुर कहते हैं, 'पुलिस ने जिस ग्रुप मीटिंग या टूलकिट की बात कही है, उससे दिशा और उनकी टीम के साजिश करने का मामला सामने नहीं आया है। अगर पुलिस के पास साजिश जैसी कोई बात है तो उसे देश के सामने रखना चाहिए।'

JNU में ही प्रोफेसर रहे पुष्पेश पंत कहते हैं, 'टूलकिट एक जुमला है। जब विदेशी मीडिया में किसान आंदोलन की चर्चा हुई तो लता मंगेशकर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गजों ने एक सुर में ट्वीट किया। यह भी एक तरह का टूलकिट ही है। जिस टूलकिट के लिए युवाओं को गिरफ्तार किया जा रहा है उसमें ऐसी कोई बात है ही नहीं। इस शब्द से वो लोग खौफ खा रहे हैं जिन्हें डिजिटल दुनिया के बारे में कुछ अता-पता ही नहीं है। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा, अखंडता को कोई नुकसान नहीं है।'

मणिंद्रनाथ ठाकुर टूलकिट मामले को सरकार के हथियार के तौर पर भी देखते हैं। उनका मानना है कि अगर लगातार टूलकिट, खालिस्‍तान और इन्हीं बातों पर चर्चा होगी तो लोगों के मन में यह बैठ जाएगा कि आंदोलन में किसान नहीं किसी और का हाथ है। जबकि करीब तीन महीनों से हजारों किसान सड़क पर हैं। उनके अनुसार जब कभी ऐसा हुआ कि आंदोलनों को समाधान के बजाए दूसरे रास्तों से खत्म करने की कोशिश हुई तो बाद में यह आंतरिक कलह की वजह बना। आंदोलन से लोगों का ध्यान हटा तो ये लोग वापस लौटते वक्त असंतोष से भरे होंगे। आने वाले दिनों में यह देश के लिए आंतरिक कलह का विषय बन सकता है।

‘कोई बड़ा आंदोलन बिना दिशा-निर्देशों के नहीं चल सकता, टूलकिट में हिंसा की बात नहीं’
कुछ शांतिपूर्ण निर्देशों वाली टूलकिट को हथियार जैसे ट्रीट करने के रवैये पर रिटायर IPS अधिकारी विजय शंकर कहते हैं, 'स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी बहुत से दिशा-निर्देश बनाकर लोगों में बांटे जाते थे। चाहे इसे आप औजार कहिए, हथ‌ियार कहिए। लेकिन कोई भी बड़ा आंदोलन बिना दिशा-निर्देशों के नहीं चल सकता। इसके लिए योजना बनानी ही पड़ती है। टूलकिट पर मेरी एक सुप्रीम कोर्ट के वकील से बात हुई। उन्होंने कहा कि इसमें कहीं हिंसा की बात नहीं है। इसको लेकर हो रही कार्रवाई जल्दबाजी में हो रही है।'

'खालिस्तान मुद्दा खात्मे की कगार पर था, बार-बार नाम लेकर उसे दोबारा जगाया जा रहा'
विजय शंकर बार-बार खालिस्तान का मुद्दा उठने को खतरनाक भी मानते हैं। वो कहते हैं, 'मैं बतौर IPS 1987-1990 के बीच कई बार पंजाब गया। लगातार हिंसा का डर बना रहता था। लेकिन खालिस्तानी नेता जगजीत सिंह चौहान के बाद इस विचारधारा का खात्मा होने लगा था। बेहतर होता कि हम इसे 'गड़े जिन' का नाम ही नहीं लेते। लेकिन अब हम बार-बार खालिस्तान का नाम लेकर असामाजिक तत्वों को उकसा रहे हैं। इससे कई असामाजिक तत्व फेक संगठन बनाकर चंदा इकट्ठा करना शुरू कर देंगे और विचारधारा के नाम पर फिर से खड़े होने की कोशिश करेंगे।'

पूंजीपतियों की राह में सबसे बड़े रोड़ा पर्यावरणकर्मी
विजय शंकर टूलकिट आंदोलन में गिरफ्तार होने वाली दिशा रवि के पर्यावरण कार्यकर्ता होने की वजह भी बताते हैं। उन्होंने कहा, 'मेरी एक पर्यावरणकर्मी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि किसान आंदोलन के पूंजीपति कनेक्‍शन के चलते इसमें पर्यावरणविद कूदे हैं। असल में पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पूंजीपतियों से ही होता है। इसलिए पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले भी इस आंदोलन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।'

लोग बिना पुख्ता प्रमाण के किसी बात पर भरोसा क्यों कर लेते हैं?
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के कॉग्निटिव साइंटिस्ट स्टीफन के मुताबिक आमतौर पर लोग षडयंत्र की कहानी पसंद करते हैं क्योंकि वो जानना चाहते हैं कि उनकी समस्या का जिम्मेदार कौन है। लोग ऐसी कहानियों को शेयर करते हैं क्योंकि उन्हें भी कहानी के एक हिस्से जैसा महसूस होता है। ऐसी कहानियों पर भरोसा करने वाले कई बार सबूतों को भी दरकिनार कर देते हैं। कई बार षडयंत्र की ऐसी कहानियां जान बूझकर बुनी जाती हैं जिसका अपने हित में फायदा उठाया जा सके।

टूलकिट मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?
3 फरवरीः स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन के समर्थन में पहला ट्वीट किया। इसी दिन ग्रेटा ने अपने दूसरे ट्वीट में 'ग्लोबल फार्मर स्ट्राइक और ग्लोबल डे ऑफ एक्शन 26 जनवरी' नाम का गूगल डॉक्‍यूमेंट शेयर किया। इसमें ‘अर्जेंट, प्रायर और ऑन ग्राउंड एक्शंस’ का जिक्र था। दिल्ली पुलिस ने ट्वीट डॉक्यूमेंट को टूलकिट साजिश बताते हुए जांच शुरू कर दी। टूलकिट में डिजिटल स्ट्राइक और 26 जनवरी की घटनाओं का जिक्र था।

14 फरवरी: एक्टिविस्ट और BBA स्टूडेंट दिशा रवि को दिल्ली पुलिस ने अरेस्ट किया। उन पर टूलकिट एडिट करने और सोशल मीडिया में शेयर करने का आरोप है। वह क्लाइमेट एक्टिविस्ट ग्रुप फ्राइडे फॉर फ्चूयर की सदस्य हैं। इसकी फाउंडर ग्रेटा थनबर्ग हैं।

15 फरवरीः टूलकिट बनाने वाले पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन (PJF) संगठन की पहचान हुई। इसके फाउंडर एमओ धालीवाल ने सितंबर 2020 में सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि मैं खालिस्तानी हूं।

15 फरवरीः दिशा रवि के एक वॉट्सऐप ग्रुप का खुलासा हुआ। इसमें 26 जनवरी को डिजिटल स्ट्राइक की बारे में बातचीत हो रही थी। ग्रुप मेंबर निकिता जैकब और शांतनु पर गैर-जमानती वारंट जारी किया गया।

16 फरवरीः निकिता ने वकील के माध्यम से कहा, 'टूलकिट एक्सटिंक्शन रिबेलियन NGO (XR) के भारतीय वालंटियर्स ने बनाई थी। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसान आंदोलन की पूरी तस्वीर एक जगह पेश करना था।'

16 फरवरीः दिल्ली पुलिस का कहना है कि 11 जनवरी को 70 लोगों ने जूम पर मीटिंग की थी। इसे एमओ धालीवाल ने आयोजित किया था। सभी 70 लोगों की जानकारी जूम से मांगी गई है।

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