ग्राउंड रिपोर्टउना में मरी गायों का मांस जानवर नोंच रहे:धर्म बदला, पर दलितों को पीटने-धमकाने का सिलसिला खत्म नहीं होता

उना17 दिन पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी और किशन बमभानिया

11 जुलाई 2016 को खुद को गौरक्षक बताने वाले कुछ लोगों ने उना के मोटा समाधियाला गांव में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे 7 दलितों को जमकर पीटा। गाड़ी के पीछे बांधकर घसीटते हुए थाने तक ले गए। वहां भीड़ ने पीटा, वीडियो वायरल हुआ, आंदोलन हुआ, बड़े-बड़े नेता गांव आए और 43 आरोपी जेल गए। 35 आरोपी जमानत पर बाहर आए और 25 अप्रैल 2018 की शाम फिर पीड़ितों में से 2 लोगों की पिटाई की गई। पुलिस ने आरोपियों को फिर से जेल भेज दिया।

25 जुलाई 2022 को गुजरात हाईकोर्ट ने 4 आरोपियों को जमानत दे दी। दो आरोपी फिर पीड़ितों के पास पहुंचे। केस वापस लेने के लिए धमकाया और जातिसूचक गालियां दीं। पीड़ित एक बार फिर पुलिस के पास पहुंचे और दोनों आरोपियों को 14 नवंबर को फिर से जेल भेज दिया गया।

ये ऐसा चक्र है, जिसमें गुजरात में दलित लगातार पिस रहे हैं, पीटे और धमकाए जा रहे हैं। बार-बार पीटा जा रहा परिवार ही सुरक्षा में जीने के लिए मजबूर है। गुजरात पुलिस के 4 जवान 24 घंटे और सातों दिन सुरक्षा में तैनात हैं। हालांकि, इनमें से भी 2 को चुनाव ड्यूटी पर भेज दिया गया है।

धर्म बदला, चमड़े का काम बंद, लेकिन बार-बार लौट आता है जुलाई 2016
मोटा समाधियाल पहुंचते ही हम सबसे पहले पीड़ित परिवार के घर जाते हैं। यहां मेरी मुलाकात वश्राम सरवैया से हुई। कथित गौरक्षकों ने वश्राम, उनके भाई रमेश और चचेरे भाई बेचर और अशोक सरवैया को सरेआम नंगा करके बेरहमी से पीटा था। ये परिवार गांव के ही पास मरी हुई गाय का चमड़ा निकालकर बेचने का काम करता था।

हमलावरों का मन सिर्फ पिटाई से ही नहीं भरा। वे इन लोगों को गाड़ी के पीछे बांधकर उना के थाने तक घसीटते हुए ले गए थे। उना में एक भीड़ इकठ्ठा हो गई और करीब 45 लोगों ने इन्हें बारी-बारी से पीटा। उस दिन को याद करते हुए वश्राम अब भी सहमे नजर आते हैं।

वश्राम बताते हैं- हम लोगों ने गाय का चमड़ा निकालने का काम बंद कर दिया। पहले हमें लगता था कि ये हमारा ही काम है, लेकिन अब पता चला कि ये हमारा काम नहीं है। अब हम अपने बच्चों से भी ये नहीं करवाएंगे, बल्कि उन्हें पढ़ाएंगे-लिखाएंगे।

2016 में जब वो सब हुआ तो राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और तब मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल घर आईं थीं। सभी ने मदद करने का वादा किया था। आनंदीबेन ने तो कहा था कि मैं एक महीने बाद फिर आऊंगी और देखूंगी कि मदद मिली या नहीं, लेकिन हमें सिर्फ वादे ही मिले।

गुजरात सरकार ने कहा था जमीन और रोजगार मिलेगा, वो भी नहीं मिला। हमें सिर्फ एट्रोसिटी एक्ट वाले तीन-तीन लाख रुपए मिले हैं। वो चेक घटना के दूसरे-तीसरे दिन ही मिल गए थे। उसके बाद से न किसी ने मदद की और न ही मुड़कर देखा।

बौद्ध धर्म अपना लिया, होली-दिवाली मनाना छोड़ा
वश्राम ने अपने पूरे परिवार समेत 2018 में ही हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। उना में करीब 300 लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ दिया था। वश्राम कहते हैं- बीते 6 सालों से हम लोगों ने होली-दिवाली मनाना छोड़ दिया है। अब हम सिर्फ दो ही त्योहार मनाते हैं। पहला 14 अप्रैल को बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती और दूसरा बुद्ध पूर्णिमा।

वश्राम बताते हैं- उस घटना के बाद इलाके के दलित युवकों ने डॉ. बीआर अंबेडकर ग्रुप बनाया है। गांव के बीचोंबीच आंगनवाड़ी है जिसके सामने खाली सरकारी जमीन पड़ी है, वहां बाबा साहेब के नाम का बोर्ड लगाया गया है। जल्द ही इस जगह पर अंबेडकर भवन बनाने की तैयारी है। स्थानीय विधायक से बात हो गई है, वे जल्द ही इसकी इजाजत दिलवा देंगे।

गांव में मरे जानवरों को अब कोई पूछने वाला नहीं
हम वश्राम सरवैया के साथ उस जगह पर पहुंचे, जहां उन पर हमला हुआ था। वहां जाकर देखा तो मरी हुई गाय और भैंस पड़ी थी। बदबू इतनी तेज आ रही थी कि एक पल भी ठहरना मुश्किल था। वश्राम ने बताया कि गांव वाले अब मरे हुए जानवरों को ऐसे ही फेंककर चले जाते हैं। कोई जमीन में गाड़ने का काम नहीं करता। उसके लिए JCB बुलानी पड़ती है और बड़ा खर्चा आता है।

पहले भी लोग जानवरों को ऐसे ही फेंककर जाते थे। हम चमड़ा खींच लेते थे और बचे हुए हिस्से को दफना देते थे। चमड़ा बेचकर जो आमदनी होती थी, उसी से हमारी रोजी-रोटी चल जाती थी। हमने ये काम पूरी तरह से बंद कर दिया है। अब इन जानवरों का मांस जंगली-जानवर थोड़ा-थोड़ा करके खाते हैं। रात में बाघ भी आता है।

गांव वाले अब मरे हुए जानवरों को खुले में फेंक देते हैं। इससे हमेशा बदबू आती रहती है और बीमारी फैलने का डर रहता है।
गांव वाले अब मरे हुए जानवरों को खुले में फेंक देते हैं। इससे हमेशा बदबू आती रहती है और बीमारी फैलने का डर रहता है।

भेदभाव में कमी आई, अब बराबरी में बिठाया जा रहा
वश्राम के साथ ही रमेश और अशोक से मुलाकात होती है। वे बताते हैं कि 2016 की घटना के बाद से गांव के दलित परिवारों की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आया है। अब गांव में उनके साथ होने वाले जातिगत भेदभाव में भारी कमी आई है। गांव में हमें भी अब बराबरी से बैठाया जाता है। जिस गिलास में ऊंची जाति के लोग पानी पीते हैं, उसी में अब हमें भी देने लगे हैं। पहले हमें दूसरे गिलास में देते थे और खुद दूसरे में पीते थे।

वश्राम का कहना है कि दलितों की पिटाई की घटना के बाद गांव में बड़ा बदलाव आया है। अब उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
वश्राम का कहना है कि दलितों की पिटाई की घटना के बाद गांव में बड़ा बदलाव आया है। अब उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाता।

जिस मोटा समाधियाल गांव में यह घटना हुई थी वहां और उना में इस बार चुनाव में भी दलित अत्याचार बड़ा मुद्दा नहीं है। 2016 में गुजरात में पटेल आंदोलन के अलावा दलित अत्याचार बड़ा मुद्दा था। इन्होंने BJP को बड़ा नुकसान पहुंचाया था और 2017 विधानसभा चुनावों में पार्टी 100 सीटों के अंदर सिमट गई थी और कांग्रेस 77 सीटों तक पहुंच गई थी।

25 जुलाई को जमानत, धमकाने पर दो आरोपी 14 नवंबर को फिर जेल गए
गुजरात हाईकोर्ट के जज न्यायूर्ति निखिल करिएल ने 25 जुलाई को मामले के 4 मुख्य आरोपियों को जमानत दे दी थी। अदालत ने उनके गिर सोमनाथ जिले में प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था। आरोपी रमेश जादव, प्रमोद गिरी गोस्वामी, बलवंत गिरी गोस्वामी एवं राकेश जोशी जिले में सिर्फ सुनवाई के लिए ही जा सकते थे।

हालांकि वश्राम सरवैया और उनके पिता बालूभाई सरवैया ने उना पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई है कि जमानत पर बाहर आए दो आरोपी प्रमोद गिरी गोस्वामी, बलवंत गोस्वामी और एक अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें धमकाया है।

आरोप के मुताबिक उन्हें और उनके चचेरे भाई अशोक को उना में प्रमोद और बलवंत ने रोक लिया। आरोपियों ने जातिसूचक गालियां दीं और कहा कि 'याद कर ले कि पहले कैसे पीटा गया था।' दोनों आरोपियों को 14 नवंबर को फिर से जेल भेज दिया गया है।

आरोपी के जीजा बोले- किसी को धमकी नहीं दी, FIR झूठी
उधर, प्रमोद गिरी के जीजा मुन्ना गिरी ने आरोप लगाया है कि जमानत पर बाहर आने के बाद किसी ने कोई धमकी नहीं दी है। वश्राम सरवैया ने झूठी FIR दर्ज कराई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जब गाय वाला मामला हुआ था और हम मौके पर पहुंचे थे तो गाय का मांस ताजा था। इसी कारण विवाद हुआ और भीड़ ने उन्हें पीटा था।

हालांकि ये पहली बार नहीं था। इससे पहले 29 अप्रैल 2018 को होने वाले धर्म परिवर्तन कार्यक्रम से ठीक पहले 25 अप्रैल की शाम को रमेश सरवैया और अशोक सरवैया पर दोबारा हमला हुआ था। हमला करने वाला जमानत पर बाहर आए उना कांड के आरोपियों में से एक था।

बालुभाई सरवैया अपने परिवार के साथ उना से गांव लौट रहे थे, तभी किरन सिंह दरबार ने रमेश और अशोक पर हमला किया था। इसके बाद भी आरोपियों की जमानत कैंसिल कर उन्हें वापस जेल भेज दिया गया था।

हालांकि, पीड़ित सरवैया परिवार कभी चैन से नहीं जी पाया। उन्हें आए दिन केस वापस लेने के लिए जान से मारने की धमकियां मिलती रहती हैं। उना मामले में 350 गवाह हैं और अभी लोकल कोर्ट में गवाही ही चल रही है।

अधिकतम 10 साल की सजा, 6 साल की काट चुके
जुलाई 2022 में उना केस में आरोपियों की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए अदालत ने कहा कि वे सब 6 साल जेल में बिता चुके हैं। ये अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम के तहत अधिकतम 5 साल की सजा के प्रावधान से ज्यादा है।

इसके अलावा हत्या के प्रयास और डकैती के मामले में IPC के तहत मिलने वाली अधिकतम सजा 10 साल है। ऐसे में इस मामले में भी ये लोग आधे से ज्यादा सजा काट चुके हैं। हालांकि, आरोपियों का जेल से बाहर आते ही फिर से पीड़ित परिवार को खुलेआम धमकाना चौंकाने वाला है।

कांग्रेस का गढ़ है उना, सिर्फ एक बार कमल खिला
समुद्र के किनारे बसा उना विधानसभा कांग्रेस का गढ़ है। 1962 में हुए पहले चुनाव से लेकर 2017 तक सिर्फ एक ही बार यहां कमल खिल सका है। 2007 में यहां BJP कैंडिडेट कालूभाई ने जीत हासिल की थी। कांग्रेस के पुंजाभाई यहां से 6 बार चुनाव जीत चुके हैं। इस बार भी पार्टी ने उन्हीं को कैंडिडेट बनाया है।

हालांकि, उना में घूमने पर पता चलता है कि यहां ज्यादा डेवलपमेंट नहीं हो पाया। कई गांवों में तो सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बेसिक सुविधाएं भी बमुश्किल मिल पा रही हैं। ‌BJP ने इस बार भी यहां कालूभाई राठौर को मैदान में उतारा है। वो 2007 में कांग्रेस के पुंजाभाई को हरा चुके हैं। अब दोनों एक बार फिर आमने-सामने हैं।

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