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संडे जज्बात:मेरी टांगें ट्रेन के नीचे थीं, मैं जिंदा लाश बना रहा; अस्पताल से अपने घर नहीं गया, क्योंकि लोग मुझ पर तरस खाते

एक महीने पहलेलेखक: चित्रसेन साहू

वो 4 जून 2014 की सुबह थी। घड़ी में 6 बज रहे होंगे। मैं रायपुर में अपने एक दोस्त के घर से निकला और स्टेशन जाने के लिए ऑटो लिया। ऑटो चालक 16 साल का युवा था। मेरे बैठने के बाद उसने एक परिवार को भी ऑटो में बिठा लिया। जाहिर है, मैं पहले बैठा था तो मेरा सामान भी अंदर की तरफ रखा था।

स्टेशन आने पर ऑटो रुका और उस परिवार ने अपना सामान निकाल लिया और ऑटो वाले ने अपना ऑटो आगे जल्दी में भगा लिया। मेरा बैग ऑटो में ही रह गया। अब सुबह से लेकर दोपहर तक मैं उस ऑटो वाले को मारा-मारा ढूंढता रहा। मैंने उसका नंबर देख लिया था और यहां से वहां ऑटो वालों से उसका पता ठिकाना पूछता रहा। खैर ऑटो वाला मिल गया और मेरा बैग भी उसी में था। मेरी कहानी यहीं से शुरू होती है।

बिलासपुर जाने वाली मेरी ट्रेन तो छूट चुकी थी। अब मै शाम को अमरकंटक एक्सप्रेस से ही जा सकता था। मेरे पास टिकट नहीं था इसलिए जनरल डिब्बे में चढ़ गया। जून का वह दिन इतना गर्म था कि अंगारे उगल रहे थे। कहीं किसी स्टेशन पर पानी तक नहीं मिल रहा था। सभी लोग हड़बड़ाए, हताश, परेशान, गर्मी से त्राहिमाम मचाए हुए थे। पानी के लिए हाहाकार मचा था।

साहू कहते हैं, ट्रेन पर चढ़ने के लिए जैसे ही उसका हैंडल पकड़ा, हाथ फिसल गया। हैंडल पर तेल लगा था।
साहू कहते हैं, ट्रेन पर चढ़ने के लिए जैसे ही उसका हैंडल पकड़ा, हाथ फिसल गया। हैंडल पर तेल लगा था।

किसी स्टेशन पर पानी की बोतल नहीं थी। भाटापारा स्टेशन आया। मैं पानी की तलाश में नीचे उतरा। कहीं पानी नहीं मिला। इस बीच ट्रेन ने हॉर्न दे दी। मैंने ट्रेन पर चढ़ने के लिए जैसे ही उसका हैंडल पकड़ा, हाथ फिसल गया। दरअसल, उस पर तेल लगा था। जैसे किसी ने कोई तेल वाली चीज खाने के बाद हैंडल पर लगा दी हो।

हाथ फिसलते ही मैं ट्रेन के नीचे आ गया। ट्रेन का पहिया मेरी टांग पर चढ़ चुका था। मैं उसी वक्त समझ गया कि मेरी यह टांग गई। टांग पर ट्रेन चढ़ने के बावजूद मुझे दर्द महसूस नहीं हो रहा था क्योंकि मैं यह सोचने लग गया कि अब मेरे सपनों का क्या होगा। सपने दर्द को भुला देते हैं।

मुझे किसी तरह से जिंदा बचना था। खून इतना बह रहा था कि मैं लाश बना रहा, लेकिन मुझे किसी भी तरह से जिंदा रहना था। जिस वक्त ये हादसा हुआ, ट्रेन धीमी थी और फौरन ही रुक गई। रेलवे पुलिस के जवान आए। मैंने अपने पूरे होश हवास में उनसे कहा कि मुझे किसी भी सूरत में सरकारी अस्पताल लेकर मत जाना।

एडमिट होने के दूसरे दिन डॉक्टरों ने साहू की दाहिनी टांग काट दी और ठीक 26 दिन दूसरी टांग भी काट दी गई।
एडमिट होने के दूसरे दिन डॉक्टरों ने साहू की दाहिनी टांग काट दी और ठीक 26 दिन दूसरी टांग भी काट दी गई।

मुझे रायपुर के मेकाहारा अस्पताल ही लेकर जाना। मैं जानता था कि सरकारी अस्पताल जाने का मतलब है कि लेने के देने पड़ जाएंगे।

कुदरती वहां एंबुलेंस खड़ी थी और मुझे एंबुलेंस से रायपुर लाया जा रहा था। मैंने रास्ते में अपने नाना को पहले ही फोन कर दिया था कि अस्पताल में एडमिट करने की सारी कागजी प्रक्रिया कर ली जाए। हम रास्ते में आ रहे थे। एंबुलेंस पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी। मुझे अभी तक दर्द नहीं हो रहा था क्योंकि मुझे मेरे दिमाग में मेरे सपने परेशान कर रहे थे।

मैं सोच रहा था कि अब क्या होगा, कैसे होगा। खून बह रहा था, मैं शारीरिक तौर पर लाश बनता जा रहा था, लेकिन मुझे जिंदा रहना था। मेरी सारी कोशिश थी कि मैं किसी भी तरह से जिंदा रहूं बस।

त्रासदी यही तक नहीं थी। एंबुलेंस जिस रास्ते से आ रही थी, वह बहुत उबड़-खाबड़ और कच्चा था। रास्ते में हमारी एंबुलेंस के आगे एक गाय आ गई और एंबूलेंस के ड्राइवर ने इतनी जोर से ब्रेक मारा कि मेरी जो टांग घुटने की हड्डी से अलग हो गई थी, वह बिल्कुल निकल कर नीचे गिर गई। उसके बाद जो मुझे दर्द हुआ, मैं बता नहीं सकता हूं। किसी तरह मैं अस्पताल पहुंचा। एडमिट किया गया।

दूसरे ही दिन डॉक्टरों ने मेरी दाहिनी टांग काट दी। मैं इस बारे में पहले से ही आश्वस्त था। ठीक 26 दिन बाद मेरी दूसरी टांग भी काट दी गई। लेकिन मुझे तनाव नहीं हुआ। जब हम परिस्थिति को स्वीकार कर लेते हैं तो उससे निकलना आसान हो जाता है। मैं इसे स्वीकार कर चुका था कि मेरी दोनों टांगे काट दी जाएंगी।

साहू कहते हैं, मैंने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो पर ट्रैकिंग करने का सोचा। मुझे बालौद के एक सीएसआर से फंडिंग भी मिली। मैंने बहुत सफलतापूर्वक उस मिशन को पूरा किया।
साहू कहते हैं, मैंने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो पर ट्रैकिंग करने का सोचा। मुझे बालौद के एक सीएसआर से फंडिंग भी मिली। मैंने बहुत सफलतापूर्वक उस मिशन को पूरा किया।

इससे पहले मैं बताना चाहता हूं कि मैं छतीसगढ़ के बालौद जिले के बिलौदी गांव का रहने वाला हूं। मेरे पिता के पास सात एकड़ जमीन थी जो बारिश के भरोसे थी। बारिश अच्छी नहीं होती थी तो सूखा पड़ जाता था। मैंने पिता की आंखों को आसमान की ही तरफ बारिश के इंतजार में देखा था। इसलिए मैंने बचपन से आर्मी में टेक्निकल पोस्ट पर जाने का निर्णय लिया था।

बिलासपुर के सरकारी कॉलेज में मेरा इंजीनियरिंग में दाखिला हो चुका था। मैंने एयरफोर्स में एयरमैन का एग्जाम भी क्लीयर कर लिया था। इसके अलावा आर्मी में भर्ती होने के लिए एसएसबी, सीडीएस जैसे एग्जाम भी दे चुका था, लेकिन अब टांगे न रहने से सारे सपने पानी हो गए। बेड पर मैं हमेशा सोचा करता था कि आर्मी नहीं तो अब क्या?

लगभग 37वें दिन मैं अस्पताल से डिस्चार्ज हो गया, लेकिन मैंने अपने पिता से गांव जाने से मना कर दिया। मैं जानता था कि गांव में सब लोग मुझे देखने आएंगे, मुझ पर तरस खाएंगे। मुझे उनका तरस नहीं चाहिए था, लेकिन करीब 50वें दिन इलाज के बाद मुझे गांव जाना पड़ा।

गांव में वही हुआ जैसा मैं सोच रहा था। हर कोई मुझे देखने आता और बार-बार पूछता था कि क्या हुआ था उस दिन। फिर कहते थे कि इतना अच्छा बच्चा, कैसे इसके साथ इतनी बड़ी अनहोनी हो गई।

मेरे लिए जो सबसे ज्यादा गुस्से कि बात थी वो ये थी कि हमारे एक रिश्तेदार हैं। वो मुझे अस्पताल में देखने के लिए नहीं आए। इसलिए मेरे पिता उनसे नाराज थे। जब मैं गांव गया तो वो हमारे घर आए। मैं बेड पर लेटा था। उन्होंने आते ही किसी से कोई बात नहीं की।

मेरे पास आए, मेरी चादर ऊपर उठाकर पूछने लगे कि कहां तक कटी हैं टांगे? मेरी कटी टांगे देखकर बिना किसी से बात किए चले गए। वो देखना चाहते थे कि आखिर मेरी टांगे कहां तक कटी हुई हैं।

ऐसा कई लोगों ने मेरे साथ किया। मेरे गुस्से की कोई सीमा नहीं रही। मुझे लगता था कि कोई किसी दिव्यांग के साथ ऐसा कैसे कर सकता है? खून का घूंट पीता रहा। मैं जानता था कि गुस्से को जाहिर करना खुद को कष्ट देना है। कुछ दिन के बाद मैं गांव से फिर बिलासपुर अपने कॉलेज चला गया।

वहां से पहली दफा अपने पिता के साथ भिलाई एग्जाम देने गया। मुझे उठाकर सीढ़ियां चढ़ाया जाता। एग्जामिनर मुझे एग्जाम हॉल के गेट पर ही बैठा देते। नवंबर-दिसंबर तक मेरे जख्म हरे थे, दर्द के मारे मेरी हालत खराब हो जाती थी। आखिरकार मैंने एक एग्जाम क्रैक किया और मुझे हाउसिंग बोर्ड में बतौर सिविल इंजीनियर नौकरी मिल गई।

व्हील चेयर बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया छतीसगढ़ की टीम में साहू का सिलेक्शन हो गया। वो कहते हैं, मुझे दौड़ने का कीड़ा काटने लगा था।
व्हील चेयर बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया छतीसगढ़ की टीम में साहू का सिलेक्शन हो गया। वो कहते हैं, मुझे दौड़ने का कीड़ा काटने लगा था।

अब नौकरी तो मिल गई, लेकिन मुझे दौड़ने का कीड़ा काटने लगा। टांगे तो थी नहीं। व्हील चेयर बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया छतीसगढ़ के लिए टीम बना रही थी। एक सरकारी अधिकारी ने मुझे भी ट्रायल देने के लिए कहा। मेरा सिलेक्शन हो गया और मैंने स्टेट टीम तैयार की।

बास्केटबॉल का फायदा यह होता है कि उसके नियम हम दिव्यांग लोगों के लिए भी वैसे ही होते हैं जो सामान्य खिलाड़ियों के लिए होते हैं। इसलिए उसमें दिव्यांगों के लिए कोई माफी नहीं होती है। मुझे वो चैलेंजिंग लगा। तीन दफा मैंने उसमें नेशनल खेला। अब मुझे ट्रैकिंग का शौक चढ़ गया। मैं अपने भाई के साथ हिमाचल में भृगु लेक तक गया। यहां जाने से मेरा हौसला और बढ़ गया।

मैंने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो पर ट्रैकिंग करने का सोचा। मुझे बालौद के एक सीएसआर से फंडिंग भी मिली। मैंने बहुत सफलतापूर्वक उस समिट को पूरा किया। हालांकि, मेरी कटी हुई टागों में जख्म हो गए थे।

मेरी टांगे घुटने के उस हिस्से से कटी हैं जहां जब मैं आर्टिफिशल टांगे लगाता हूं तो पसीना आने की वजह से वह फिसलती हैं। इसलिए मैं चढ़ाई चढ़ने में कितना ही जोर क्यों न लगाऊं, लेकिन पीछे की तरफ धकेला जाता हूं।

इसके बाद फिर मैंने ऑस्ट्रेलिया की कोस्कीयूज्को चोटी फतह की। उसके बाद रूस की चोटी एलब्रुस माउंट को फतह किया। हाल ही में मैं आठ लोगों की टीम के साथ एवरेस्ट का बेसकैंप करके लौटा हूं। इसमें समावेशन को बढ़ावा देने के नजरिए से 4 दिव्यांग, एक ट्रांसजेंडर, एक प्रशासनिक अधिकारी, 2 आंत्रप्रन्योर थे।

अब मेरा सपना दुनिया की सबसे ऊंची 7 पर्वतों की चोटियों पर फतह करना है। मैंने कई मुहिम चलाईं। दिव्यांगों को कार चलाने का लाइसेंस मिले, इसकी पहल की है। मैंने राज्य व्हील चेयर बास्केटबॉल टीम गठित की है और अब माउंटेनियरिंग की मुहिम। आज बेशक मैं बहुत कुछ हूं, लेकिन गांव समाज की सोच नहीं बदल पाया हूं। अब इन पर गुस्सा भी नहीं आता है।

पैरा एथलीट चित्रसेन ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं...