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दुमका की लड़की को शाहरुख ने जलाया, सिस्टम ने मारा:अस्पताल में मरहम तक नहीं मिला, जलने के 28 घंटे बाद पहली बार ड्रेसिंग

3 महीने पहलेलेखक: वैभव पलनीटकर

‘मुझे सुबह करीब साढ़े चार बजे फोन आया कि कांड हो गया है, जल्दी घर आ जाओ। मैंने बाइक उठाई और ससुराल के लिए निकल गया। घर में घुसते ही देखा कि मेरी साली बुरी तरह जली हुई है और तड़प रही है। मैं तुरंत ऑटो लेकर आया। हम उसे दुमका के सदर अस्पताल लेकर भागे।

चाहते तो थे कि प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाएं, लेकिन हमारे पास पैसे नहीं थे। हॉस्पिटल पहुंचा तो पहले इमरजेंसी वार्ड में ले गए। जिले का ये सबसे बड़ा हॉस्पिटल मेडिकल कॉलेज भी है, लेकिन उसमें जलने के बाद लगाया जाने वाला मरहम भी नहीं था। मैं बाहर गया और मेडिकल स्टोर से मरहम लेकर आया। तब जाकर मेरी साली का इलाज शुरू हुआ।

ये बातें हमें झारखंड के दुमका में जलाई गई 16 साल की लड़की के जीजा ने बताई हैं। लड़की को घर में सोते वक्त 23 अगस्त की सुबह शाहरुख नाम के लड़के ने पेट्रोल डालकर जला दिया था। 5 दिन इलाज के बाद 28 अगस्त को उसने दम तोड़ दिया।

इन 5 दिनों में उसके जीजा दुमका के सरकारी हॉस्पिटल से रांची के रिम्स तक साथ रहे। इलाज और खर्च की जिम्मेदारी उन्हीं पर रही।

सदर अस्पताल में ड्रेसिंग नहीं की गई
लड़की के जीजा ने बताया कि सबसे पहले हम दुमका के सदर अस्पताल पहुंचे। वहां मेरी साली की ड्रेसिंग तक नहीं की गई। इसके बाद उसे इमरजेंसी वार्ड से बर्न वार्ड में ले जाया गया। यह सिर्फ कहने का बर्न वार्ड था। वहां सुविधाओं के नाम पर सिर्फ बेड और पंखा था। AC लगा था, लेकिन काम नहीं कर रहा था। बाकी सब कुछ नॉर्मल वार्ड की तरह था। हॉस्पिटल में सलाइन के अलावा और कुछ नहीं दिया गया।

जीजा से बातचीत के बाद हम उस वार्ड में गए, जहां पीड़ित लड़की को एडमिट किया गया था। वहां हमें AC ठीक मिला। इलाज करा रहे दूसरे मरीजों ने बताया कि लड़की वाला केस होने के बाद हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने AC ठीक करवा दिया है। इलाज भी ठीक तरीके से हो रहा है।

हम बर्न वार्ड में मरीजों से बात कर रहे थे, तभी हॉस्पिटल सुपरिटेंडेंट वहां आ गए और AC चेक करने लगे। हमने पूछा- ‘सर पहले AC खराब था, अभी ठीक करवाया है क्या?’ उन्होंने जवाब दिया- ‘कुछ-कुछ दिनों में AC की सर्विसिंग होती रहती है। AC खराब थे, इसलिए ठीक कराए गए हैं।'

तब हमने पूछ लिया कि ये जिले का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है, मेडिकल कॉलेज भी है, लेकिन पीड़ित लड़की को यहां मरहम तक नहीं मिला। इस पर उन्होंने कहा- ‘मरहम रहता है, लेकिन कुछ चीजें कम होती हैं। जिस जगह इलाज हो रहा था, वहां मरहम नहीं था। पहले दिन घाव को खुला रखा गया था, पट्टी नहीं बांधी।’

दुमका के सर्जन डॉ. शशि कुमार ने लड़की का शुरुआती इलाज किया था। उन्होंने बताया कि जब उसे लाया गया था, वह 90% जली हुई थी। हमने अपनी कैपेसिटी में प्रोटोकॉल के हिसाब से इलाज शुरू किया। बर्न केस में सबसे जरूरी होता है फ्लूड सर्कुलेशन। हमने 12-13 सलाइन दीं। सुबह करीब 10 बजे परिवारवालों को बता दिया कि इस केस में इलाज के लिए रांची जाना होगा।

सुबह 10 बजे रांची रेफर किया, एंबुलेंस रात 10 बजे मिली
दुमका में इलाज की कम सुविधाएं होने की वजह से डॉक्टरों ने लड़की को रांची के लिए रेफर कर दिया। इससे उसके परिवारवालों को सामने नई मुसीबत आ गई। इलाज के लिए पैसे नहीं थे, एंबुलेंस के लिए कहां से लाते। हालांकि, इस तरह के केस में हॉस्पिटल मैनेजमेंट को तुरंत एंबुलेंस का इंतजाम करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

लड़की के परिवार ने बताया कि हम रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन करके पैसे इकट्ठा करने लगे। रांची जाने से पहले कम से कम 10 हजार रुपए तो पास में होना जरूरी था। ये सब करते-करते शाम के 5 बज गए। फिर भी जितनी जरूरत थी, उतने पैसे इकट्ठे नहीं हो पाए। फिर कुछ नेताओं को फोन किया। उनकी मदद से हमें एंबुलेंस मिली और रात करीब 10 बजे हम दुमका से रांची के लिए निकल पाए।

28 घंटे बाद पहली ड्रेसिंग हुई
24 अगस्त की सुबह तक हादसा हुए 24 घंटे से ज्यादा बीत चुके थे। पीड़ित लड़की अब झारखंड के सबसे बड़े हॉस्पिटल रिम्स में थी। कुछ देर की कागजी कार्रवाई के बाद लड़की को भर्ती कर लिया गया। ट्रीटमेंट शुरू हुआ। करीब 28 घंटे बाद रिम्स में उसकी ड्रेसिंग की गई। जरूरी दवाएं दी गईं।

लड़की के जीजाजी बताते हैं कि सोशल मीडिया पर लड़की का वीडियो है, जिसमें वह शाहरुख को इसी तरह तड़पाने की बात कह रही है। ये वीडियो 24 अगस्त को पहली ड्रेसिंग के बाद का ही है। उस दिन उसकी हालत में काफी सुधार आया था। उसकी जलन कम हो गई थी। उस दिन उसके खाना भी ठीक से खाया। अगर यही ड्रेसिंग पहले ही दिन हो जाती तो शायद रिकवरी अच्छी होती।

रिम्स में भी जरूरी दवाएं नहीं मिली, बाहर से लानी पड़ीं
दुमका हॉस्पिटल से रिम्स में पहले ही बता दिया गया था कि सीरियस केस आ रहा है। फिर भी तैयारी के नाम पर मैनेजमेंट ने कुछ नहीं किया। पीड़ित परिवार के मुताबिक, हॉस्पिटल में जले के इलाज के लिए जरूरी दवाएं भी नहीं थीं। हमें ज्यादातर दवाएं बाहर से अपने खर्च पर लानी पड़ी।

हम रिम्स के बर्न वार्ड में भी गए। कई मरीज अब भी यहां भर्ती हैं। वार्ड में AC लगे हैं, लेकिन उनसे ठंडी हवा नहीं आती। लंबे वक्त से AC की सर्विसिंग नहीं की गई है।

लड़की के परिवार ने बताया कि रिम्स के वार्ड में इतनी गर्मी थी कि लड़की को बहुत जलन हो रही थी। हॉस्पिटल के पंखे हवा नहीं दे रहे थे। इसलिए हमने बाजार से एक हजार रुपए का टेबल फैन खरीदा।

पहली ड्रेसिंग के बाद लड़की की स्थिति में सुधार आ रहा था। डॉक्टरों ने हर दूसरे दिन ड्रेसिंग करने के लिए कहा था। 26 तारीख को लड़की की दूसरी ड्रेसिंग होने वाली थी। उसके पहले ही बेटी की तबीयत बिगड़ने लगी।

अब एक सवाल जिस पर आपकी राय जरूरी है...

रिम्स हॉस्पिटल में लड़की का इलाज करने डॉ. शीतल मालुआ ने बताया कि बर्न केस के ट्रीटमेंट का प्रोटोकॉल होता है। अगर कोई मरीज 60-65% जला है तो उसे कितनी सलाइन और एंटीबायोटिक्स देनी है, इसका पूरा कोर्स है। बर्न पेशेंट हॉस्पिटल आता है, तो सबसे पहला काम है वॉशिंग और क्लीनिंग। इसके बाद फौरन उसकी ड्रेसिंग की जाए, ताकि जल्द घाव भरना शुरू हों और मरीज को जलन कम हो।

दुमका के हॉस्पिटल में ऐसा कुछ नहीं किया गया। न ठीक से जले हिस्से की क्लीनिंग की गई, न प्रॉपर ड्रेसिंग हुई। मरीज की ठीक से केयर ही नहीं की गई।

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