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पंथराम-राम नहीं, रावण जी कहिए:ना रावण दहन, ना दशहरा; मान्यता ऐसी कि सोने की दुकान खोली तो शिवलिंग सा काला हो जाएगा सोना

कांगड़ा, हिमाचल2 महीने पहलेलेखक: मनीषा भल्ला

राम की धरती पर रावण जी। यहां ना कोई दशहरा मनाता है और ना रावण दहन होता है। दूसरे शहरों में या टीवी पर भी रावण दहन दिख जाए, तो लोग मुंह फेर लेते हैं, टीवी बंद कर देते हैं। अगर किसी की जुबान से रावण निकल जाए, तो लोग नाराज हो जाते हैं। वे रावण को रावण जी कहते हैं।

यहां कोई सोने की दुकान भी नहीं खोलता। मान्यता ये कि जिसने भी दशहरा मनाया उसकी अकाल मृत्यु हो जाती है। जिसने सोने की दुकान खोली उसका सोना शिवलिंग के रंग का हो जाता है, काला पड़ जाता है।

पंथ सीरीज में इन्हीं मान्यताओं की कहानी जानने मैं पहुंची हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ धाम मंदिर।

मान्यताओं के मुताबिक यह मंदिर हजारों साल पुराना है। जबकि मंदिर के शिलालेख के मुताबिक इसका निर्माण 9वीं से 12वीं सदी में हुआ है।
मान्यताओं के मुताबिक यह मंदिर हजारों साल पुराना है। जबकि मंदिर के शिलालेख के मुताबिक इसका निर्माण 9वीं से 12वीं सदी में हुआ है।

रात करीब 1.30 बजे का वक्त। मैं चंडीगढ़ बस स्टैंड से बैजनाथ मंदिर के लिए निकली। बस में सवार ज्यादातर लोगों को बैजनाथ मंदिर जाना है।

कुछ देर बाद मैंने लोगों से हल्की-फुल्की बातचीत शुरू की। इस दौरान एक बात मेरे ध्यान में आई। हमारी तरफ तो लोग एक दूसरे से मिलने पर राम-राम कहते हैं, लेकिन यहां किसी की जुबां पर राम का नाम नहीं है। लोग जय शंकर या जय महाकाल बोलते हैं।

पास की सीट पर बैठे युवक से मैंने पूछा यहां लोग रावण को इतना इज्जत क्यों देते हैं?

नाराजगी भरे लहजे में युवक ने कहा, ‘रावण जी कहिए। मैं गुरुग्राम में नौकरी करता हूं, वहां भी दशहरा नहीं मनाता, ना रावण दहन देखने जाता हूं, क्योंकि वे हमारे लिए पूज्य हैं।’

इसी बीच बस ड्राइवर बोले, ‘ मैडम… हम अपने बच्चों को राम की नहीं, रावण जी की कहानियां सुनाते हैं। उनकी वीरता के किस्से सुनाते हैं। आज तक उनके जैसा विद्वान और शक्तिशाली कोई हुआ ही नहीं।’

मन में सवाल आया कि रावण ने तो एक स्त्री के साथ गलत किया था। सीताजी का हरण किया था, फिर उसका इतना मान-सम्मान क्यों? लेकिन जहां लोग सिर्फ रावण कहने से नाराज हो जाते हों, वहां ये सवाल पूछना ठीक नहीं होता। मैं चुप रह गई।

सात घंटे के सफर के बाद सुबह 11 बजे मैं बैजनाथ धाम पहुंच गई। थोड़ा फ्रेश होने के बाद सीधे शिव मंदिर पहुंची। मंदिर में आरती हो रही थी। आरती में शिव की स्तुति गाई गई। प्रसाद बांटा गया।

मंदिर के भीतर जमीन में धंसा हुआ शिवलिंग है। थोड़ी दूर पर गणेश, कार्तिकेय, हनुमान, पार्वती और लक्ष्मी नारायण जी की मूर्तियां हैं, लेकिन राम-सीता की कोई मूर्ति नहीं। राम नाम का कहीं जिक्र नहीं।

बैजनाथ मंदिर का शिवलिंग जमीन की तरफ धंसा हुआ है। मान्यता ये कि रावण ने गुस्से में शिवलिंग को अपने अंगूठे से दबा दिया था।
बैजनाथ मंदिर का शिवलिंग जमीन की तरफ धंसा हुआ है। मान्यता ये कि रावण ने गुस्से में शिवलिंग को अपने अंगूठे से दबा दिया था।

आरती के बाद मंदिर के पंडित संजय शर्मा से बात हुई। वे कहते हैं, ‘इस मंदिर में रावण जी की ना तो कोई मूर्ति है और ना ही उनकी पूजा होती है, लेकिन उनका दर्जा बहुत बड़ा है। देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां उनकी छवि नहीं है।

हम बैजनाथवासी मानते हैं कि वे शिव के परमभक्त थे। चार वेदों के ज्ञाता, उनसे बड़ा विद्वान पूरी दुनिया में कोई दूसरा नहीं हुआ।’

यहां दशहरा क्यों नहीं मनाया जाता?

पंडित संजय शर्मा बताते हैं, ‘बैजनाथ में रावण जी ने तप किया था। यहां जब भी किसी ने दशहरा मनाया, एक महीने बाद उसकी मौत हो गई। अकाल मृत्यु हो गई। भगवान शिव की धरती पर उनके भक्त का दहन कोई नहीं कर सकता। महाकाल नाराज हो जाते हैं। इसलिए यह परंपरा बंद करनी पड़ी।’

मैंने सुना है यहां लोग सोने की दुकान नहीं खोलते?

पंडित संजय शर्मा बताते हैं, ‘जो भी यहां सोने की दुकान खोलता है, तीसरे दिन ही उसका सोना शिवलिंग की तरह काला पड़ने लगता है। उसे व्यापार में घाटा होने लगता है। अनहोनी होने लगती है। इसलिए कोई यहां सोने की दुकान नहीं खोलता। मैं साठ साल का हो गया, लेकिन एक भी सोने की दुकान नहीं देखी है।’

वे कहते हैं, ‘भगवान शिव ने रावण जी को सोने की लंका दान में दी थी। इसलिए कोई और सोने की दुकान नहीं खोल सकता है, अपने यहां भारी मात्रा में सोना नहीं रख सकता।’

शिव मंदिर के गर्भ गृह के बाहर नंदी विराजमान हैं। लोग इनके कान में कुछ कहते हुए अपनी मन्नतें मांग रहे हैं।
शिव मंदिर के गर्भ गृह के बाहर नंदी विराजमान हैं। लोग इनके कान में कुछ कहते हुए अपनी मन्नतें मांग रहे हैं।

मंदिर के एक पंडित बताते हैं कि कोई कितना भी पैसा लगा ले। कहीं से भी सोना ले आए, तीसरे दिन सोने का रंग शिवलिंग जैसा काला हो ही जाता है। बड़े-बड़े लोगों ने लाखों रुपए इनवेस्ट करके यहां सोने का व्यापार करने की कोशिश की, लेकिन तीसरे दिन उन्हें दुकान बंद करनी पड़ी।’

बैजनाथ ट्रेड वेलफेयर के अध्यक्ष विनोद नंदा कहते हैं, ‘80 के दशक की बात है। यहां एक सोने की दुकान खुली थी। जनकराज नाम के व्यापारी ने यह दुकान खोली थी। वो जो भी सोना लाता, तीन दिन बाद काला पड़ जाता। उसे लगा कि उसके सोने में ही दोष है।

उसने कई जगहों से सोने लाकर आजमा लिया, लेकिन कोई फायदा नहीं। इस दौरान उसे बहुत नुकसान उठाना पड़ा। कोई अनहोनी भी उसके घर हो गई थी। इसलिए उसे दुकान बंद करनी पड़ी। वो दुकान ही यहां की आखिरी सोने की दुकान थी। उसके बाद किसी ने सोने की दुकान खोलने की हिम्मत नहीं जुटाई।’

वे कहते हैं, ‘यहां सिर्फ मंदिर के पास नहीं, बल्कि गांवों में भी लोग रावण जी ही बोलते हैं। बच्चे-बुजुर्ग सभी। हमारे यहां तो लोग अपनी दुकानों के नाम, घरों के नाम भी रावण जी के नाम पर रखते हैं। मेरे गांव में ही रावण जी के नाम से टी स्टॉल है।’

मुझे इनकी बातों पर यकीन तो नहीं होता कि सोना काला पड़ जाता है, लेकिन इनकी मान्यता इतनी मजबूत है कि मुझे यहां एक भी सोने की दुकान नहीं दिखी।

मन में सवाल उठा रावण का इतना महिमामंडन क्यों?

अश्विनी डोगरा बैजनाथ में रहते हैं। वे पूजा करने के लिए मंदिर आए हैं। कहते हैं, ‘किसी धर्म ग्रंथ में तो नहीं लिखा है कि रावण जी का सम्मान करिए, लेकिन हम बचपन से ऐसा करते आ रहे हैं।

जिसने भी दशहरा मनाया है, वो जिंदा नहीं बचा। अगर कोई दूसरा भी आदर के साथ उनका नाम नहीं लेता है, तो हमें तकलीफ होती है, गुस्सा भी आता है, क्योंकि हमारे दादा-बाबा सब उनका सम्मान करते रहे हैं।’

राम से दिक्कत क्या है?

मंदिर के पुजारी संजय शर्मा कहते हैं, ‘हमें राम से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हम पूजा शिव की करते हैं और स्तुति रावण की। अपने घरों में भी लोग शिव को ही पूजते हैं। त्योहार के नाम पर केवल सावन और शिवरात्रि मनाई जाती है। शिव के अलावा अगर हम किसी को मानते हैं तो रावण जी को, क्योंकि वे शिवजी के भक्त थे।

हम लोगों से मिलते हैं तो शिवशंकर या जय महाकाल बोलते हैं। राम-राम कहते मैंने किसी को नहीं सुना। कुछ लोग अपने घरों में रामायण रखते हैं, लेकिन कोई उनकी जय नहीं बोलता। उनका उत्सव नहीं मनाता।’

बैजनाथ मंदिर में शिवजी के साथ ही कई देवताओं की मूर्तियां हैं, पर राम की मुझे नहीं दिखी।
बैजनाथ मंदिर में शिवजी के साथ ही कई देवताओं की मूर्तियां हैं, पर राम की मुझे नहीं दिखी।

अब मन में सवाल उठता है, रावण का इस मंदिर से क्या कनेक्शन है?

मंदिर में रखी किताब के मुताबिक बैजनाथ मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा का जिक्र है।

‘’त्रेता युग की बात है। रावण शिवजी का भक्त था। उसने कैलाश पर्वत पर तप किया, लेकिन शिवजी प्रसन्न नहीं हुए। तब रावण ने एक हवन कुंड बनाया। नृत्य और तांत्रिक क्रिया के बाद उस हवन कुंड में अपना एक-एक शीश चढ़ाने लगा।

9 शीश चढ़ाने के बाद भी जब शिवजी प्रसन्न नहीं हुए तो रावण अपने 10वें शीश की आहुति देने लगा। इससे देवता घबरा गए। वे शिवजी से कहने लगे कि अब कुछ कीजिए वर्ना रावण अजर-अमर हो जाएगा। इसके बाद शिवजी प्रकट हुए। उन्होंने रावण को ऐसा करने से रोक लिया और उसके सभी शीश वापस जीवित कर दिए।

रावण ने कहा कि प्रभु मैं आपको लंका में स्थापित करना चाहता हूं। शिवजी ने इसे स्वीकार तो कर लिया, लेकिन एक शर्त भी रखी। उन्होंने कहा कि मुझे एक बार उठाने के बाद बीच में कहीं रख दोगे, तो मैं वहीं विराजमान हो जाऊंगा। रावण ने शिवजी की शर्त मान ली।

रास्ते में शिवलिंग ले जाते वक्त रावण को लघुशंका लगी। वो बैजू नाम के एक ग्वाला को शिवलिंग देकर लघुशंका के लिए चला गया। काफी देर तक जब रावण नहीं लौटा तो ग्वाले ने शिवलिंग जमीन पर रखा दिया। जब रावण वापस लौटा तो शिवलिंग को उठाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वो शिवलिंग हिला भी नहीं सका। वो शिवजी की माया समझ गया। उसे काफी गुस्सा आया।

उसने शिवलिंग को अपने अंगूठे से बहुत तेज दबाया, जिस वजह से वह जमीन में धंस गया। आज भी यहां का शिवलिंग जमीन में धंसा हुआ है। शिवजी ने रावण के शीश ठीक किए थे, इसलिए इस मंदिर का नाम वैद्यनाथ या बैजनाथ बाबा पड़ा। लोग इसे रावणेश्वर भी कहते हैं।’’

पंडित संजय शर्मा कहते हैं, ‘भले ही इस मंदिर को 12 ज्योतिर्लिंगों में जगह नहीं मिली हो, लेकिन यहां के लोगों के लिए यह ज्योतिर्लिंग से कम नहीं है। हजारों साल से यहां लोग शिव की पूजा करते आ रहे हैं। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी यहां पूजा की थी। इसको मुगलों ने तोड़ने की कोशिश की थी, जिसे बाद में कांगड़ा के राजा ने बनवाया।’'

शिवलिंग लेकर लंका जाते हुए रावण, लेकिन वो इसे लंका नहीं ले जा सका। स्केच- आयुषी झा
शिवलिंग लेकर लंका जाते हुए रावण, लेकिन वो इसे लंका नहीं ले जा सका। स्केच- आयुषी झा
शिवलिंग को उठाने की कोशिश करता रावण। स्केच- आयुषी झा।
शिवलिंग को उठाने की कोशिश करता रावण। स्केच- आयुषी झा।

कहीं रावण का मंदिर तो कहीं दशहरे में उतारी जाती है आरती

  • जोधपुर के मौदगिल में ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज मानते हैं। वे लोग रावण दहन की बजाय उसकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं।
  • महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के एक गांव में रावण को देवताओं का पुत्र माना जाता है। उसकी पूजा की जाती है।
  • उज्जैन के चिकली गांव में भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है।
  • मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी रावण की पूजा होती है। मंदसौर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है।
  • आंध्र प्रदेश के काकिनाड में रावण का मंदिर बना है। वहां भगवान शिव के साथ रावण की पूजा होती है।
  • उत्तर प्रदेश के जसवंतनगर में दशहरे के दिन रावण की आरती उतारी जाती है। उसकी मूर्ति के टुकड़े किए जाते हैं। इसके बाद उन टुकड़ों को लोग घर ले जाते हैं और रावण की तेरहवीं करते हैं।

अब पंथ सीरीज की ये तीन कहानियां भी पढ़ लीजिए...

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