भास्कर एक्सक्लूसिवनौसेना की बगावत से नेहरू-गांधी ने किया था किनारा:अंग्रेजों ने 400 लोगों को गोलियों से भून डाला, बॉम्बे की सड़कों पर लाशें पड़ी थीं

मुंबई13 दिन पहलेलेखक: मनीषा भल्ला

इसलिए हम आजाद हैं... सीरीज की पहली स्टोरी...

सबसे पहले तस्वीर देखिए...

आप समझ ही गए होंगे। ये पुरानी तस्वीर मुंबई में अरब सागर के किनारे बने गेट वे ऑफ इंडिया और ठीक उसके सामने 560 कमरों और 44 लग्जरी सुइट वाले पांच सितारा होटल ताज की है। आज इन्हें देखकर सबसे पहले 26/11 का मुंबई हमला याद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं, साल 1946 में अगर सरदार पटेल ने रोका न होता है तो इन दोनों इमारतों को युद्धपोतों की 3 इंच की तोपों ने उड़ा दिया होता।

चौंकिए मत। मैं आज इन्हीं इमारतों के सामने खड़ी हूं। मकसद है आपको आजादी की एक खूनी जंग का किस्सा सुनाना। ये वो जंग थी जिसके बाद तब के ब्रिटिश PM क्लीमेंट एटली ने फौरन भारत छोड़ने का फैसला ले लिया और हम तय तारीख 20 जून 1948 से 10 महीने पहले 15 अगस्त 1947 को ही आजाद हो गए।

बात 18 फरवरी 1946 की है। बम्बई (अब मुंबई) के इसी बंदरगाह पर ब्रिटिश भारतीय नौसेना यानी रॉयल इंडियन नेवी के भारतीय नौसैनिकों ने घटिया खाने के बहाने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। कई महीनों से इन नौसैनिकों को घटिया खाना दिया जा रहा था। उन्हें नाश्ते में दाल और डबल रोटी दी जा रही थी, तो दोपहर में उसी दाल के साथ चावल परोसे जा रहे थे।

आखिरकार बंदरगाह के करीब संचार प्रशिक्षण केंद्र HMIS तलवार के नौसेनिकों का सब्र जवाब दे गया और उन्होंने नारे लगा दिए- ‘’खाना नहीं तो काम नहीं।’’ उन्होंने अंग्रेज अफसरों का हुक्म मानने से इनकार कर दिया। बगावत पर उतारू नौसेनिकों ने HMIS तलवार के कमांडर आर्थर फेडरिक किंग की कार के टायर पंचर कर उस पर गांधी का Quit India और नेता जी का Jai Hind लिख दिया।

HMIS तलवार का कमांडर आर्थर फेडरिक किंग ऊंची कदकाठी का शख्स था। भारतीय नौसैनिकों को ब्लैकबास्टर्ड जैसे अपशब्द बोलना उसकी आदत थी। इसलिए बागी नौसैनिकों ने सबसे पहले उसकी कार पंचर कर उस पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" के नारे लिख दिए। बगावत के ये तेवर दिखाने के लिए तब की कोई तस्वीर नहीं है, तो दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने उस घटना को आपके लिए इलस्ट्रेट किया है।
HMIS तलवार का कमांडर आर्थर फेडरिक किंग ऊंची कदकाठी का शख्स था। भारतीय नौसैनिकों को ब्लैकबास्टर्ड जैसे अपशब्द बोलना उसकी आदत थी। इसलिए बागी नौसैनिकों ने सबसे पहले उसकी कार पंचर कर उस पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" के नारे लिख दिए। बगावत के ये तेवर दिखाने के लिए तब की कोई तस्वीर नहीं है, तो दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने उस घटना को आपके लिए इलस्ट्रेट किया है।

सुनने में यह वजह बहुत छोटी लग रही है, लेकिन बगावत की चिंगारी तो पहले से भड़क रही थी। घटिया खाने ने इसे लपटों में बदल दिया।

दरअसल, भारतीय नौसैनिक तो दिल्ली के लाल किले में 5 नवंबर 1945 से आजाद हिंद फौज के तीन बड़े अफसरों पर चल रहे मुकदमों से सुलग रहे थे । इन अफसरों में मेजर जनरल शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल गुरबक्श ढिल्लों शामिल थे। उन पर ब्रिटिश रानी के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप मढ़कर मुकदमे चलाए जा रहे थे। इन्हें रेड फोर्ट ट्रायल्स कहा गया।

एक ही दिन में, यानी 19 फरवरी तक बम्बई में नौसेना की सभी 11 यूनिट के 20 हजार नौसैनिक इस विद्रोह में शामिल हो गए। 22 फरवरी तक बगावत कुचलने पहुंचे अंग्रेज सैनिक और बागी भारतीय सैनिक एक-दूसरे को धमकाते रहे। जमकर गोलीबारी भी हुई।

भारतीय नौसैनिकों ने बम्बई बंदरगाह के आसपास 22 पोतों पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने नौसैनिकों को डराने के लिए बंदरगाह के ऊपर बहुत कम ऊंचाई पर युद्धक विमानों को उड़ाना शुरू कर दिया। जवाब में बगावत कर रहे नौसैनिकों ने बम्बई के आसपास कब्जे में लिए गए युद्धपोतों की तोपों का मुंह गेटवे ऑफ इंडिया और होटल ताज की ओर मोड़ दिया। उन्होंने अंग्रेजों को चेताया- अगर हमें नुकसान पहुंचाया तो दोनों इमारतों को उड़ा देंगे।

HMIS तलवार तब ब्रिटिश नौसेना का अड्डा था। उन दिनों वहां कम्युनिकेशन ट्रेनिंग होती थी। आजकल इसे नेवल ट्रांसपोर्ट डिपो कहते हैं, जहां पुराने जहाजों की रिपेयरिंग होती है। यह साउथ मुंबई के कुपरएज एरिया में है।

नेवी के इतिहास पर कई किताबें लिखने वाले कमांडर श्रीकांत बी केसनूर (रिटायर्ड) बताते हैं कि HIMS तलवार में एक रेडियो स्टेशन भी था। विद्रोहियों ने इस रेडियो स्टेशन के जरिए ऐलान कर दिया कि वह हड़ताल पर जा रहे हैं। इस तरह से देश के सभी नेवल कैंप में यह संदेश फौरन फैल गया और देखते ही देखते 20 फरवरी तक 20,000 लोग, 78 युद्धपोत, 23 नौसैनिक स्टेशन इस विद्रोह से जुड़ गए। 19 फरवरी को कराची बंदरगाह पर नौसैनिकों के तमाम दफ्तरों में बगावत शुरू हो गई। कराची बंदरगाह के करीब HMIS हिन्दुस्तान के नाविकों ने अंग्रेज अफसरों से कनेक्शन तोड़ लिया। 22 फरवरी 1946 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में युद्धपोत HMIS हुगली के नाविकों ने अफसरों का हुक्म मानने से इनकार कर दिया।

साउथ बम्बई की सड़कों पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के नारे लगने लगे। आजाद मैदान में भारतीय नौसैनिकों ने मीटिंग्स कर अंग्रेजों के खिलाफ अभियान को तेज कर दिया। उन दिनों लग रहा था कि हर रास्ता साउथ बम्बई की सड़कों तक जा रहा है। देखते ही देखते बम्बई के इस इलाके की सड़कों पर दो लाख से ज्यादा लोग थे।

अंग्रेजों ने इस बगावत को कुचलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। अंग्रेजी फौज और पुलिस ने विद्रोह कुचलने के लिए कोलाबा और साउथ बम्बई की सड़कों पर 19 फरवरी से 24 फरवरी के बीच 400 लोगों को गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया। 1500 से ज्यादा लोग जख्मी हो गए।

तब..

22 फरवरी, 1946 : भारतीय नौसैनिकों की बगावत के साथ ही तब की बम्बई के गिरगांव इलाके में आम लोग भी उनके समर्थन में उतर आए। ये तस्वीर अंग्रेज फौज और लोगों के बीच हुए जबरदस्त टकराव को बयां कर रही है।
22 फरवरी, 1946 : भारतीय नौसैनिकों की बगावत के साथ ही तब की बम्बई के गिरगांव इलाके में आम लोग भी उनके समर्थन में उतर आए। ये तस्वीर अंग्रेज फौज और लोगों के बीच हुए जबरदस्त टकराव को बयां कर रही है।

और अब...

31 अगस्त, 2022 : आज गिरगांव का यह इलाका पूरी तरह बदल चुका है। 1946 की बगावत का न ही इस सड़क पर कोई निशान बाकी है और न लोगों के जहन में। सड़क पर एक पुराना गिरजाघर है, तो दूर पीछे से झांकती एक ऊंची इमारत इसके कल की ओर इशारा कर रही है।
31 अगस्त, 2022 : आज गिरगांव का यह इलाका पूरी तरह बदल चुका है। 1946 की बगावत का न ही इस सड़क पर कोई निशान बाकी है और न लोगों के जहन में। सड़क पर एक पुराना गिरजाघर है, तो दूर पीछे से झांकती एक ऊंची इमारत इसके कल की ओर इशारा कर रही है।

शहर के गिरगांव की वो सड़क जिस पर बागी नौसैनिकों का साथ दे रहे कम से कम 100 मुंबईकर अंग्रेजों की गोली का शिकार बने, आज वहां राशन से लेकर चश्मों की दुकानें हैं। कई चायखाने और एक चर्च भी है। सड़क के दोनों ओर 100 साल से पुरानी बिल्डिंग हैं। ज्यादातर में ऊपर मकान हैं और नीचे दुकान। मकानों और दुकानों पर लगे बोर्ड इनकी उम्र की गवाही दे रहे हैं।

मेरीटाइम हिस्ट्री सोसाइटी के रिटायर्ड निदेशक और 'टाइमलेस वेट' किताब के लेखक कमांडर डॉ. जॉन्सन ओडाक्कल बताते हैं कि इस विद्रोह को बम्बई के मिल मजदूरों का पूरा साथ मिला, यही वजह थी कि मारे गए 400 लोगों में ज्यादातर बम्बई वाले थे।

नौसैनिकों ने 2 फरवरी को ही चिपका दिए थे 'भारत छोड़ो' के पोस्टर

2 फरवरी 1946 को ब्रिटिश भारतीय नौसेना के संचार प्रशिक्षण केंद्र HMIS तलवार की लकड़ी सीढ़ियों पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" के नारे वाले पोस्टर लगाते भारतीय नौसैनिक बीसी दत्त साथियों के साथ पकड़े गए। इस घटना की भी कोई तस्वीर नहीं है, इसलिए दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने उस घटना को आपके लिए इलस्ट्रेट किया है।
2 फरवरी 1946 को ब्रिटिश भारतीय नौसेना के संचार प्रशिक्षण केंद्र HMIS तलवार की लकड़ी सीढ़ियों पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" के नारे वाले पोस्टर लगाते भारतीय नौसैनिक बीसी दत्त साथियों के साथ पकड़े गए। इस घटना की भी कोई तस्वीर नहीं है, इसलिए दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने उस घटना को आपके लिए इलस्ट्रेट किया है।

इस बगावत की शुरुआत तो 18 फरवरी 1946 को हुई थी, लेकिन इसकी चिंगारी 2 फरवरी 1946 से भड़कने लगी थी। विद्रोह की अगुआई करने वालों में शामिल रहे बीसी दत्त ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था- हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ काम करने वाले सैनिकों की रिहाई चाहते थे, क्योंकि उनका मकसद 'क्रांतिकारी कार्रवाई' था, वे हमारी ही तरह देशभक्त थे।

दत्त ने बताया, “हमने 2 फरवरी 1946 की सुबह HMIS तलवार तक जाने वाली लकड़ी की सीढ़ियों पर 'भारत छोड़ो' और 'जय हिंद' जैसे नारे वाले पोस्टर चिपका दिए। इसी दौरान हमें गोंद के साथ पकड़ लिया गया और 8 फरवरी 1946 को कोर्टमार्शल हो गया।

HMIS तलवार पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" वाले पोस्टर लगाते पकड़े गए भारतीय नौसैनिक बीसी दत्त और उनके साथियों को कोर्ट मार्शल के दौरान अंग्रेज अफसर फ्रेडरिक किंग ने ब्लैक बास्टर्ड जैसी नस्लीय गाली दीं। यही वह चिंगारी थी जिसने 18 फरवरी 1946 की आग भड़का दी। इस घटना को भी दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने इलस्ट्रेट किया है।
HMIS तलवार पर "भारत छोड़ो" और "जय हिंद" वाले पोस्टर लगाते पकड़े गए भारतीय नौसैनिक बीसी दत्त और उनके साथियों को कोर्ट मार्शल के दौरान अंग्रेज अफसर फ्रेडरिक किंग ने ब्लैक बास्टर्ड जैसी नस्लीय गाली दीं। यही वह चिंगारी थी जिसने 18 फरवरी 1946 की आग भड़का दी। इस घटना को भी दैनिक भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रबर्ती ने इलस्ट्रेट किया है।

ट्रायल के दौरान कमांडिंग ऑफिसर फ्रेडरिक किंग ने हमारे साथी नौसैनिकों के लिए 'ब्लैक बास्टर्ड', 'सन ऑफ बिच' और कुली जैसे नस्लीय अपशब्द बोले। इसके बाद मैंने एमएस खान और मदन सिंह के साथ भारतीय नौसैनिकों को भूख हड़ताल के लिए राजी कर लिया। 18 फरवरी की सुबह 1500 नौसैनिकों ने अलग-अलग जगह "खाना नहीं! कोई काम नहीं!" के नारे लगा दिए। इसी दौरान बम्बई वायु सेना के पायलट और हवाई अड्डे के कर्मचारी भी नस्लीय भेदभाव के खिलाफ हड़ताल पर चले गए, पायलटों ने भी इस विद्रोह को समर्थन दिया।"

छुप-छुपकर नेहरू और गांधी के भाषण सुनने जाते थे नौसैनिक

बगावत का हिस्सा रहे नौसैनिक बीबी मुतप्पा ने BBC को दिए एक इंटरव्यू में बताया था, ''हममें से कई नौसैनिक छुपकर बम्बई के अलग-अलग इलाकों में जवाहर लाल नेहरू और बाकी नेताओं के भाषण सुनने जाया करते थे। मुझ पर महात्मा गांधी का खासा असर था। इस विद्रोह के दौरान 18 से 20 फरवरी के बीच गेटवे ऑफ इंडिया और ताजमहल होटल के करीब रॉयल नेवी के कोस्टल ब्रांच में तैनात नाविकों ने अंग्रेज अफसरों को उनके कमरों और शौचालय में बंद कर दिया था। कई जहाजों पर भी यही हुआ था।

अंग्रेजों को डर था कि नौसैनिक ताजमहल होटल पर हमला न कर बैठें। बावर्ची, सफाई कर्मचारी, खाना परोसने वाले और यहां तक कि सैनिक बैंड के सदस्यों ने भी हथियार लूट लिए थे। 22 फरवरी तक बम्बई की कोस्टल ब्रांच को मराठा लाइट इंफैंट्री के सैनिकों ने घेर लिया था। इस दौरान कई घंटों तक बागी नाविकों और उनके बीच फायरिंग चलती रही।

19 फरवरी 1946 को शुरू हुई इस बगावत को बम्बई के मिल मजदूरों का पूरा साथ मिला। 20 से 22 फरवरी के बीच शहर की सड़कों पर करीब दो लाख लोकल लोग थे। यही वजह थी कि मारे गए 400 लोगों में ज्यादातर बम्बई वाले थे।
19 फरवरी 1946 को शुरू हुई इस बगावत को बम्बई के मिल मजदूरों का पूरा साथ मिला। 20 से 22 फरवरी के बीच शहर की सड़कों पर करीब दो लाख लोकल लोग थे। यही वजह थी कि मारे गए 400 लोगों में ज्यादातर बम्बई वाले थे।
23और 24 फरवरी 1946 के बीच बगावत थमने लगी। विद्रोह की अगुआई कर रहे ज्यादातर भारतीय नौसैनिकों ने सरदार पटेल के कहने पर आत्मसमर्पण कर दिया। इस दौरान बम्बई की सड़कों पर भी बागी नौसैनिकों को पकड़ा जाता रहा। इस तस्वीर में ब्रिटिश पुलिस दक्षिण बम्बई के कोलाबा की एक सड़क पर एक बागी नौसैनिक को ले जाती नजर आ रही है।
23और 24 फरवरी 1946 के बीच बगावत थमने लगी। विद्रोह की अगुआई कर रहे ज्यादातर भारतीय नौसैनिकों ने सरदार पटेल के कहने पर आत्मसमर्पण कर दिया। इस दौरान बम्बई की सड़कों पर भी बागी नौसैनिकों को पकड़ा जाता रहा। इस तस्वीर में ब्रिटिश पुलिस दक्षिण बम्बई के कोलाबा की एक सड़क पर एक बागी नौसैनिक को ले जाती नजर आ रही है।

पटेल के कहने पर एक हफ्ते में बागियों ने किया सरेंडर

बागी बीसी दत्त और एमएस खान के साथी मदन सिंह के मुताबिक- हमने कांग्रेस नेताओं खासतौर पर सरदार पटेल के अनुरोध के बाद आत्मसमर्पण करने का फैसला लिया था। हमें आश्वासन दिया गया था कि कोई उत्पीड़न नहीं होगा। हम पहले ही साफ कर चुके थे कि बागी नौसैनिक ब्रिटिश अफसरों के सामने नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय नेताओं के सामने ही आत्मसमर्पण करेंगे। इसके बाद ही 23-24 फरवरी को बागियों ने समर्पण कर दिया।

सालों तक इस बगावत को इतिहास में दर्ज नहीं किया गया

कमांडर श्रीकांत बी केसनूर (रिटायर्ड) बताते हैं कि इंडियन नेवी के इतिहास में पहले इस घटना को विद्रोह, रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी और बॉम्बे म्युटिनी भी कहा जाता था, लेकिन अब हम इसे अपराइजिंग यानी आंदोलन कहते हैं। बहुत साल तक इस आंदोलन को डॉक्युमेंट ही नहीं किया गया था। यही वजह है कि देशवासी इस आंदोलन से वाकिफ नहीं हैं, लेकिन इंडियन नेवी ने बाकायदा कुछ सालों से इसे अलग-अलग तरह से डॉक्युमेंट किया है ।

बगावत का हिस्सा रहे बीबी मुतप्पा कहते हैं कि नौसैनिकों के विद्रोह को महात्मा गांधी का समर्थन नहीं मिला था, उन्होंने नाविकों को अनुशासन में रहने को कहा। नेहरू ने खुद को नौसैनिक विद्रोह से अलग कर लिया था। शायद इसी कारण स्वतंत्र भारत के इतिहास में हमारी कोई जगह नहीं है। भारतीय नौसेना ने हमारे योगदान को 50 साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद याद किया और एक छोटा सा स्मृति चिह्न देकर काम चला लिया।

आखिर में पढ़िए बम्बई नौसैनिक विद्रोह की तारीख दर तारीख डीटेल...

एडिटर्स बोर्ड :- निशांत कुमार और अंकित फ्रांसिस

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