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खुद्दार कहानी:गरीबी में पले-बढ़े, फिर IAS बने, आज इनके कोरोना कंट्रोल करने के मॉडल की देश भर में तारीफ हो रही है

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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देश कोरोना से कराह रहा है। मौत की रफ्तार दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। किसी को अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहा है तो कहीं ऑक्सीजन की कमी से सांसें उखड़ रही हैं। कोई दवाइयों की कमी से दम तोड़ रहा है तो कोई मदद के लिए दर-दर हाथ जोड़ रहा है। ऐसे में महाराष्ट्र का एक जिला है नंदुरबार जो इस भयंकर महामारी में मिसाल बना है। यहां न तो ऑक्सीजन की कमी है, न बेड की मारामारी है और न ही कोई दवाइयों के लिए जूझ रहा है। इसके पीछे मेहनत और डेडिकेशन है जिले के कलेक्टर डॉक्टर राजेंद्र भारुड की। जिनके मॉडल की तारीफ देशभर में हो रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट भी इनके मॉडल का जिक्र कर चुका है। आज की खुद्दार कहानी के लिए हमने राजेंद्र भारुड से बातचीत की और उनके मॉडल को समझने की कोशिश की।

कौन हैं राजेंद्र भारुड?

नंदुरबार जिले में पले-बढ़े राजेंद्र भारुड 2013 बैच के IAS ऑफिसर हैं। वे बहुत ही साधारण ट्राइबल फैमिली से ताल्लुक रखते हैं। उनका जीवन स्ट्रगल और चुनौतियों से भरा रहा है। जब वे मां के गर्भ में थे तब ही उनके पिता की डेथ हो गई। इसके बाद उनकी मां ने मेहनत-मजदूरी करके उन्हें पाला। भारुड में बचपन से ही टैलेंट कूट कूटकर भरा था। वे अपनी क्लास में टॉप करते थे। आगे उनका नवोदय में सिलेक्शन हो गया। इसके बाद उन्होंने मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम पास किया और MBBS की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे IAS बने और अभी नंदुरबार जिले के कलेक्टर हैं।

कैसे शुरुआत की? क्या चुनौतियां रहीं?

जिले के हेल्थ वर्कर्स का अभिवादन करते हुए राजेंद्र भारुड। IAS होने के साथ-साथ वे खुद भी एक डॉक्टर हैं।
जिले के हेल्थ वर्कर्स का अभिवादन करते हुए राजेंद्र भारुड। IAS होने के साथ-साथ वे खुद भी एक डॉक्टर हैं।

राजेंद्र भारुड बताते हैं कि पिछले साल जब कोविड के मामले आए तो हमारे पास न तो टेस्टिंग की सुविधा थी, न ही जिले में कोई मेडिकल कॉलेज था। 200 बेड का एक सरकारी अस्पताल था, वो भी लगभग भरा हुआ था। अगर हम उसे कोविड हॉस्पिटल में बदलते तो नॉन कोविड पेशेंट को दिक्कत हो जाती। प्राइवेट हॉस्पिटल्स कोविड के ट्रीटमेंट के लिए तैयार नहीं थे।

इसलिए हमने युद्धस्तर पर नए सिरे से प्लानिंग की और फौरन काम करना शुरू कर दिया। एक हॉस्पिटल प्रोजेक्ट का काम सालों से रुका हुआ था, उसे हमने तीन से चार महीने में पूरा कर लिया। 200 से ज्यादा मेडिकल स्टाफ्स की भर्तियां की। प्राइवेट डॉक्टरों को भी इलाज के लिए राजी किया। कोरोना टेस्टिंग के लिए खुद का लैब बनाया। 2 दर्जन से ज्यादा मोबाइल टीम बनाईं जो गांवों में जाकर रैपिड एंटीजन टेस्ट करती थीं।

वे कहते हैं कि ट्राइबल क्षेत्र होने के चलते यहां के लोगों को अवेयर करना सबसे मुश्किल टास्क रहा। उन्हें इस बीमारी के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उन्हें मास्क क्या होता है, सैनिटाइजर क्या होता है। ये सब कुछ भी पता नहीं था। हमने गांव-गांव जाकर लोगों को अवेयर किया। माइक से अनाउंसमेंट करते रहे। वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर करते थे। तब जाकर हमने फर्स्ट वेव को कंट्रोल किया।

फर्स्ट वेव में ही हमने सेकंड वेव की प्लानिंग शुरू कर दी थी
वे कहते हैं कि फर्स्ट वेव में कोरोना की रफ्तार तो थम गई, लेकिन हमारी कोशिश जारी रही। हमें तभी अंदेशा हो गया था कि सेकंड वेव भी आएगी जो और ज्यादा खतरनाक होगी। इसलिए हम अपनी तैयारी बढ़ाते गए। तब जिले में कोई भी लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट नहीं था। हमारे जिले के लोग गुजरात के सूरत और धुले पर निर्भर थे। ऐसे में हमारे सामने चुनौती थी कि अगर कल को ये लोग ऑक्सीजन देने से मना करेंगे तो हम क्या करेंगे?

कोरोना की पहली लहर के बाद से ही उनकी टीम ने तैयारियां शुरू कर दी थीं। अब उनके यहां ऑक्सीजन बेड की कोई दिक्कत नहीं है।
कोरोना की पहली लहर के बाद से ही उनकी टीम ने तैयारियां शुरू कर दी थीं। अब उनके यहां ऑक्सीजन बेड की कोई दिक्कत नहीं है।

इसके बाद हमने डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग डेवलपमेंट के फंड से पिछले साल एक ऑक्सीजन जेनरेटेड प्लांट की शुरुआत की। कुछ प्राइवेट अस्पतालों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। अभी हमारे पास तीन गवर्नमेंट और दो प्राइवेट यानी पांच ऑक्सीजन प्लांट हैं। हर दिन 50 लाख लीटर ऑक्सीजन का प्रोडक्शन हम कर रहे हैं। खुद के साथ-साथ हम दूसरे जिलों के लोगों को भी ऑक्सीजन मुहैया करा रहे हैं।

बंद पड़े हॉस्टल्स और स्कूलों को कोविड हॉस्पिटल में कन्वर्ट किया
राजेन्द्र कहते हैं कि जब सेकंड वेव में केस अचानक से बढ़ने लगे तो अस्पतालों में बेड की दिक्कत होने लगी। इसके बाद हमने पूरे जिले में टास्क फोर्स की तैनाती की। हर उस जगह का जायजा लिया जहां कोविड हॉस्पिटल बनाया जा सके। बंद पड़े हॉस्टल्स को कोविड सेंटर में कन्वर्ट कर दिया। सरकारी स्कूलों में ऑक्सीजन बेड की सुविधा उपलब्ध करा दी। इसके साथ ही रेलवे कोचेज को भी हमने आइसोलेशन वार्ड में तब्दील कर दिया।

अभी हमारे पास 7 हजार से ज्यादा आइसोलेशन वार्ड हैं। कोविड ट्रीटमेंट के लिए 13 हजार से ज्यादा बेड की व्यवस्था है। सभी बेड ऑक्सीजन से लैस हैं। अगर आज की बात करें तो अभी भी हमारे पास 200 से ज्यादा ऑक्सीजन बेड उपलब्ध हैं।

एक वक्त था जब 1200 से ज्यादा केस रोज आ रहे थे, अब 75% तक घट गए

पिछले साल जिले में कोविड टेस्ट की व्यवस्था नहीं थी। अब हर रोज 2000 हजार तक कोविड टेस्ट हो रहा है।
पिछले साल जिले में कोविड टेस्ट की व्यवस्था नहीं थी। अब हर रोज 2000 हजार तक कोविड टेस्ट हो रहा है।

सेकंड वेव में एक वक्त ऐसा था जब अचानक से कोविड मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। हर दिन 1000-1200 तक मामले आने लगे। लोग पैनिक होने लगे। इसके बाद हमने टेस्टिंग बढ़ा दी। हर दिन दो हजार तक लोगों की जांच करने लगे। जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आती उसे फौरन आइसोलेट कर देते। जरूरत पड़ती तो अस्पताल में दाखिल करते। गांवों में मोबाइल टीम को ड्यूटी पर लगा दिया।

राजेंद्र कहते हैं कि कोरोना की चेन तोड़ने के लिए संक्रमितों को आइसोलेट करना जरूरी है। हमने इस काम पर फोकस किया। जिसे अस्पताल, स्कूल या खुद के घर में जहां जगह मिली आइसोलेट कर दिया। वहां उन्हें खाने पीने की व्यवस्था की। इसका फायदा ये हुआ कि महज एक हफ्ते में केस घटकर 200 तक आ गए। पॉजिटिविटी रेट भी 50% से घटकर 15% पर आ गई।

कैसे करते हैं काम? क्या है काम करने का मॉडल?

ये नंदुरबार जिले की वेबसाइट है। जिसपर कोविड से संबंधी अस्पताल, ऑक्सीजन बेड और बाकी रिसोर्सेस की रियल टाइम जानकारी उपलब्ध है।
ये नंदुरबार जिले की वेबसाइट है। जिसपर कोविड से संबंधी अस्पताल, ऑक्सीजन बेड और बाकी रिसोर्सेस की रियल टाइम जानकारी उपलब्ध है।

राजेंद्र भारुड कहते हैं कि कोविड कंट्रोल करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। अगर सही तरह से चीजों को इम्प्लीमेंट किया जाए और एक डेडिकेटेड टीम के रूप में काम किया जाए तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है। हमने सबसे पहले हर तहसील में कंट्रोल रूम तैयार किए। इसमें डॉक्टर, नर्स से लेकर पुलिस-प्रशासन सबकी जिम्मेदारी तय कर दी। कोविड टेस्टिंग बढ़ा दी। गांवों के लिए अलग से मॉनिटरिंग टीम का गठन किया।

अभी हर रोज करीब 50 से 60 फोन कंट्रोल रूम में आते हैं। किसी को आइसोलेशन में रहना है तो किसी को बेड की जरूरत होती है। तत्काल टास्क फोर्स की टीम उस व्यक्ति को उस लोकेशन पर बेड दिलाती है। अगर कोई अस्पताल एडमिट करने में आनाकानी करता है तो वहां पहुंचकर टीम हकीकत का पता लगाती है। अगर कोई दोषी पाया जाता है तो तत्काल कार्रवाई भी की जाती है।

हमने जिले में अब ब्लड बैंक बना दिया है। वैक्सीनेशन के लिए 55 सेंटर बनाए हैं। करीब 2 लाख लोगों को वैक्सीन लग भी गई है। हम कोई भी स्टॉक बचाकर नहीं रख रहे हैं। जितना डोज आता है सब खपत हो जाता है। इसके साथ ही हमने एक वेबसाइट भी लॉन्च की है। इसके जरिये जिले में उपलब्ध अस्पताल, बेड, ऑक्सीजन, आइसोलेशन वार्ड इन सबकी जानकारी लाइव हासिल की जा सकती है।

वे कहते हैं कि अगर कलेक्टर को काम करने की छूट मिले और वो करना चाहे तो कर सकता है। फंड की कोई कमी नहीं होती है। कलेक्टर को डिसीजन लेने और इम्प्लीमेंटेशन की फ्रीडम मिलनी चाहिए।

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