बात बराबरी की:तूफान से घर की दीवारें भले बच जाएं, लेकिन किसी गैरमर्द ने स्त्री को छू लिया, तो इज्जत भरभराकर गिरती है

नई दिल्ली7 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
  • कॉपी लिंक

26 दिसंबर, 2004! सारी दुनिया क्रिसमस के खुमार में डूबी थी। समंदर किनारे सैलानियों की हंसी लहरों से कदमताल कर रही थी। तभी श्रीलंका और इंडोनेशिया में एक तूफान आया। सुनामी- जिसमें कुछ ही घंटों के भीतर तकरीबन 3 लाख लोग मारे गए और कई गुना ज्यादा बेघर हो गए। इनमें महिलाएं भी थीं। घर-बार वाली वो महिलाएं, जिनकी जिंदगी अब मौत से बदतर होने जा रही थी।

'शाम का झुटपुटा घिर आया था। कैंप से निकलकर शौच के लिए मैं झाड़ियों की तरफ गई कि दो पुरुषों ने मुझे पकड़ लिया। मेरा मुंह दबाकर, हाथ-पैर जकड़कर उनमें से एक ने कहा- समंदर अभी भी उफन रहा है। तुम लहरों में जाकर मरना चाहोगी या रेप के बाद जीना? वे मुझसे कोऑपरेशन चाहते थे ताकि उनका जी बहल जाए और मैं भी बची रहूं। मैंने वही किया।'

ये दर्द है उस अनाम महिला का जिसका जिक्र यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज और ऑक्सफेम समेत कई संस्थाओं ने सुनामी-प्रभावित इलाकों में सर्वे के बाद किया है। इस सर्वे में पाया गया कि राहत कैंपों में रहती ज्यादातर महिलाएं किसी न किसी किस्म की हिंसा, खासकर यौन हिंसा की शिकार हुईं। किसी के पास न तो घर था, न खाना और न दवाई।

कई मांएं भूख से रोते बच्चों के लिए दूध जुटाने खातिर यौन हिंसा सहतीं, कई महिलाएं शाम घिरने के कारण, तो कई महिलाएं दिन के उजाले में अकेला होने के कारण। रेप हुए। कमउम्र बच्चियां बेची-खरीदी गईं। स्कूल ड्रेस पहनने और कुछ बनने का सपना देखती आंखें दुनिया से ऐसे गायब हो गईं, जैसे कभी इसका हिस्सा ही नहीं थीं।

‘द लैंसेट’ ने अपने ताजा इश्यू में इसी पर बात की है कि कैसे कोई प्राकृतिक आपदा महिलाओं के लिए मौत से भी भयंकर खतरे लेकर आती है। एक्सट्रीम इवेंट्स एंड जेंडर बेस्ड वॉयलेंस नाम से छपी स्टडी में अलग-अलग देशों की कुल 41 स्टडीज शामिल की गईं, जिसमें समुद्री तूफान से लेकर बाढ़, सूखा, भूकंप और जंगलों की आग भी शामिल थी।

इस दौरान देखा गया कि कोई भी देश प्राकृतिक आपदा की सोचते हुए सिर्फ यही देखता है कि कितने मारे गए, या फिर कितने बेघर हुए। खानपान और नौकरी के इंतजाम सोचे जाते हैं, लेकिन किसी की नजर महिलाओं पर नहीं जातीं।

तिनका-तिनका जोड़कर घर संजोती स्त्री अब उस शिविर में है, जिसका कोई दरवाजा नहीं। जहां दिन से लेकर रात तक कोई भी आ सकता है और किसी भी किस्म की हिंसा कर सकता है। इस हिंसा की कोई सुनवाई नहीं।

एक विकल्प और भी है। वो बाढ़-भूकंप-जंगल की आग-सूखे के बीच चुपचाप पड़ी मौत का इंतजार करे। हिंसा से हालांकि यहां भी वे अनछुई नहीं रहेंगी, क्योंकि ये विकल्प भी उनके लिए उनके पति-पिता-भाई चुन रहे हैं।

पाकिस्तान का बड़ा हिस्सा इन दिनों बाढ़ की चपेट में है, जिसमें लगभग एक तिहाई आबादी सीधे-सीधे प्रभावित हुई। हजारों लोग राहत-शिविर में है। इस बीच खबर आती है कि वहां के पंजाब प्रांत के एक गांव के लोगों ने कैंप में जाने से मना कर दिया।

क्यों? क्योंकि गांव के पुरुषों को डर है कि वहां जाने पर उनकी स्त्रियां गैर-पुरुषों के संपर्क में आएंगी। वे उन्हें देख सकेंगे। उनसे बात करेंगे। मदद भी करेंगे। इस तरह से स्त्रियां पाक नहीं रह जाएंगी।

गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क पानी में डूब चुकी है। रास्ते बंद हैं। न खाना आ सकता है, न दवा, लेकिन पुरुष जिद पर अड़े हैं। पाकिस्तानी राहत और बचाव दल बार-बार चेतावनी दे रहा था कि कभी भी हालात और खराब हो सकते हैं, ऐसे में गांव में रहना खतरनाक है, लेकिन स्थानीय पुरुषों के लिए महिलाओं की 'पवित्रता' हर चीज से ऊपर है।

गौर करने की बात ये है कि पवित्रता के मायने पुरुष ही तय करते हैं। कुछ साल पहले दुबई से ऐसी ही घटना सामने आई, जब समुद्र तट पर पिकनिक मनाने आई एक युवती डूबने लगी। रेस्क्यू विभाग तुरंत पानी में छलांग लगाने को तैयार हुआ, तभी युवती के पिता विरोध में आ गए।

उनका कहना था कि जान बचाने के क्रम में पराए-पुरुष उनकी बेटी को छुएं, उससे बेहतर उसकी मौत होगी। मदद की आवाज लगाते हुए बेटी डूब गई। पिता को अरेस्ट करने के कुछ समय बाद छोड़ दिया गया, क्योंकि आखिरकार उसने एक स्त्री को उसके दायरे में रखा।

ढेरों-ढेर वाकये हैं। ये वो दुनिया है, जहां तूफान से घर की दीवारें नहीं ढहतीं, औरतों की इज्जत भरभराकर गिरती है। बारिश की कमी, यहां आटे के कनस्तर से ज्यादा महिलाओं की पाकीजगी (पवित्रता) पर असर डालती है। जंगल की आग में पेड़ जितना ही उनकी किस्मत भी सुलगती है।

सिलसिला चलता ही रहेगा, जब तक कि महिलाएं खुद आगे बढ़कर अपने विकल्प चुनना न शुरू कर दें। जब बाढ़ में घर डूबने पर वे जल-समाधि लगाने से इनकार कर दें, बल्कि दुनिया के बीहड़ का खुलकर मुकाबला करें। वक्त बदलेगा- जब महिलाएं पवित्रता पर आजादी चुनने लगेंगी।

चलते-चलते बात बराबरी सीरीज की ये तीन स्टोरीज भी पढ़ लीजिए

1. वजनदार स्त्री या तो गुस्से की वजह बनती है, या मजाक की; न तो उसे प्रेम मिलता है, न तरक्की

कुछ रोज पहले मेरठ में तलाक का अजीबोगरीब मामला सुनाई पड़ा, जहां पीड़िता का कहना है कि शादी के बाद वजन बढ़ने के कारण शौहर ने उसे तलाक दे दिया। 28 साल की महिला का कहना है कि बच्चे के जन्म के बाद से उसका वजन लगातार बढ़ने लगा। नाखुश पति आए-दिन इस पर फसाद करता। आखिरकार मोटापा न थमने के कारण पति ने उसे तीन तलाक दे दिया। (पढ़िए पूरी स्टोरी)

2. कुछ लोगों की सोच है कि जो औरतें घरेलू काम करना नहीं चाहतीं; वे सिरदर्द का बहाना ओढ़ लेती हैं

औरतों को सिरदर्द हुआ तो उसे कमजोर दिमाग की बीमारी कह दिया गया। माना गया कि जो औरतें घर के कामकाज से बचना चाहती हैं, या पति को यौन-सुख देने में नखरे करती हैं, वो सिरदर्द का बहाना ओढ़ लेती हैं। (पूरी स्टोरी पढ़िए)

3. लोगों को लगता है कि औरतों के लिए शरीर की पवित्रता ही उसकी अकेली उपलब्धि है, वो चाहे और कुछ बने न बने

जो मुल्क खतना जैसे खून-खराबे पर यकीन नहीं करते थे, प्योरिटी कंट्रोल का उनके पास दूसरा तरीका था। इसमें औरत के शरीर के निचले हिस्से को लोहे से कैद कर दिया जाता। ये अंर्तवस्त्र की तरह होता, जिसपर एक ताला लगा होता। घर का पुरुष बाहर जाते हुए इस पर ताला मढ़कर जाता और रात लौटने पर खोल दिया करता। (पूरी स्टोरी पढ़िए)