Sunday जज्बात:कसाब को पहचानने के बाद एक साल तक मुझे नींद नहीं आई; मैंने उंगली उठाई तो वो बोला-हां मैं ही कसाब हूं

मुंबईएक वर्ष पहलेलेखक: अंजली कुलथे

फिर वही नवंबर आ रहा है, यानी 11वां महीना। तारीख थी 26, दुनिया उसे 26/11 कहती है। 13 साल हो गए। सब कुछ जस का तस आंखों में धरा हुआ सा है। सपने तो आज भी आते हैं... कसाब का गोलियां चलाते हुए कामा अस्पताल में घुस आना, चारों ओर खून से सने भागते लोग, लाशें और हर तरफ फायरिंग। वो चीखें अभी भी कानों में धंसी हुई हैं, लेकिन तब भी फायरिंग और धमाकों के बीच मैंने अपने 20 प्रेग्नेंट मरीजों को बचा लिया था।

जब आर्थर रोड जेल में अजमल कसाब की तस्दीक करने पहुंची थी, तो एक जैसे पांच लोगों को मेरे सामने खड़ा कर दिया गया। मैं पसीने से तरबतर थी। कांपते हुए हाथ उठाकर बोली- ‘ये है अजमल कसाब।’ तो वो हंसने लगा। बोला- ‘हां मैडम, ठीक पहचाना। मैं ही हूं अजमल कसाब।’ मेरी तस्दीक से ही कसाब फांसी के फंदे तक पहुंचा था।

मेरा नाम अंजली कुलथे है। तब मुंबई के कामा अस्पताल में नर्स थी। चलिए अब पूरी कहानी सुनाती हूं...

उस रोज ठीक रात के आठ बज रहे थे, एंटीनेटल वार्ड (जच्चा वार्ड) में मेरी नाइट ड्यूटी थी। मैंने अपनी साथी नर्स से हैंडओवर लिया। कुछ देर बाद पता चला कि सीएसटी स्टेशन पर फायरिंग हो रही है। करीब 9.30 बजे मुझे अस्पताल के बाहर से गोलियों की आवाज सुनाई दी। मैंने खिड़की से देखा कि सड़क पर दो आतंकवादी फायरिंग करते हुए भाग रहे हैं और दो पुलिस वाले उन पर पीछे से फायरिंग कर रहे हैं।

उस सड़क पर एक ओर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट है और दूसरी तरफ कामा अस्पताल। अस्पताल की दीवार छोटी थी, जिससे छलांग लगाकर दोनों आतंकी अंदर घुस आए। हमें खिड़की पर देखकर उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। मेरे साथ खड़ी हेल्पर हीरा जाधव के हाथ को गोली छूकर गई, उसका हाथ लहूलुहान हो गया। एक ट्यूबलाइट टूट गई। मेरे वार्ड में 20 प्रेग्नेंट औरतें थीं, जिनका रो-रो कर बुरा हाल होने लगा। किसी का बीपी लो हो रहा था तो किसी का हाई। उधर हीरा जाधव के हाथ से खून के फव्वारे बह रहे थे।

मैं उससे बोली कि तुम नीचे कैजुअल्टी में जाकर पट्टी करवाओ, लेकिन वह इतना डर गई कि अकेले जाने को राजी नहीं हुई। उधर सभी प्रेग्नेंट औरतों का रोना जारी था। मुझे लगा कि इस वक्त अगर मैं भी डर गई तो हम सभी की जान चली जाएगी। मरना ऐसे भी है और वैसे भी, इससे बेहतर है कि किसी की जान बचाते हुए मेरी जान चली जाए। मैं कीड़ों की तरह नहीं मरना चाहती थी, मैंने ठान लिया कि अपने वर्कर और सभी मरीजों को हर हाल में बचाऊंगी। मैंने सभी मरीजों से वादा किया कि मेरे होते हुए किसी को कुछ नहीं होगा, सब रोना बंद करो।

मैंने सभी औरतों कों दस बाई दस की पेंट्री में शिफ्ट किया, क्योंकि वहां कोई खिड़की नहीं थी। यानी कहीं से भी गोली आने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने वार्ड के बाहर से कुंडी मार दी। हीरा जाधव को नीचे कैजुअल्टी में ले जाने के लिए बाहर आई। बाहर देखा तो चारों ओर से फायरिंग हो रही थी। आतंकी अस्पताल के अंदर घुस आए थे। हीरा इतनी डरी हुई थी कि जाने के लिए तैयार नहीं थी। मैंने उससे कहा- 'मैं आगे रहूंगी तुम मेरे पीछे आओ।' मैं किसी तरह से फायरिंग के बीच हीरा को ग्राउंड फ्लोर पर डॉक्टर अर्चना गरुड़ के पास लेकर गई।

मैंने उनसे कहा- आतंकवादी अस्पताल के अंदर घुस आए हैं। आप पुलिस को फोन करो और हीरा की पट्टी कर दो, मुझे ऊपर मेरे वार्ड में अपने मरीजों के पास जाना है।' यह सुनकर डॉ. रचना बुत की तरह सुन्न हो गई, लेकिन मेरे पास वक्त नहीं था कि मैं उन्हें इस खतरे के बारे में और चेताती। मुझे मेरे मरीजों की चिंता थी। मैं जैसे ही कैजुअल्टी से बाहर निकली तो सामने गेट पर देखा कि दोनों गार्ड की लाशें खून से लथपथ पड़ी हैं। फायरिंग जारी थी, मैं किसी तरह सीढ़ियों से सट-सट कर फर्स्ट फ्लोर पर गई और अंदर से कुंडी मारकर दरवाजे पर टेबल फंसा दिया।

इधर पेंट्री में देखा कि सभी औरतें रो रही थीं। मुझे डर लग रहा था कि ऐसे में लेबर पेन शुरू होने का खतरा रहता है। फिर वही हुआ जिसका डर था। हाई बीपी की एक मरीज को लेबर पेन शुरू हो गया। मेरी सांस अटक गई। सेकेंड फ्लोर पर डॉ. सुचिता ही इस केस को हैंडल कर सकती थीं। मैंने लैंडलाइन से उन्हें बोला कि वह किसी तरह से फर्स्ट फ्लोर पर आ जाएं, लेकिन डॉ. सुचिता ने साफ मना कर दिया।

आतंकी छठे फ्लोर तक आ चुके थे। चारों तरफ से फायरिंग जारी थी। मुझे लगा कि अगर उस औरत को डॉ. सुचिता तक नहीं पहुंचाया गया तो वह मर जाएगी। मैं अपनी आंखों के सामने उसे मरता हुआ नहीं देख सकती थी। वह पेंट्री में भी मर जाती, इससे अच्छा था कि मैं रिस्क लेकर उसे डॉक्टर तक पहुंचाती।

वह पेंट्री से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा और वादा किया कि तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी। बस मेरे पीछे-पीछे आओ। मैं फिर से उसे लेकर पेंट्री और फिर वार्ड से बाहर निकली। मैं उसे लिफ्ट से लेकर जाना चाहती थी, लेकिन लिफ्ट पर आतंकी भी गोलियां चला रहे थे और पुलिस भी। आतंकियों को लग रहा था कि इसमें पुलिस है और पुलिस को लग रहा था कि इसमें आतंकी हैं।

मैं उस औरत को लेकर सीढ़ियों की दीवार से सटकर धीरे-धीरे ऊपर की मंजिल पर गई, क्योंकि मैं जरा सी भी इधर-उधर होती तो गोली सीधे हमें लगती। किसी तरह मैं ऊपरी मंजिल पर पहुंची। डॉ. सुचिता ने भी अपने वार्ड को अंदर से बंद कर रखा था। मैंने जोर-जोर से दरवाजा पीटा, बताया कि मैं अंजली हूं। तब जाकर दरवाजा खुला और मैं उसे वहां छोड़कर फौरन सीढ़ियों की दीवार के सहारे नीचे आई। यहां पेंट्री में प्रेग्नेंट औरतों को प्यास भी लग रही थी, पेशाब भी आ रहा था, भूख भी लगी थी, लेकिन मैं बेबस थी। उनकी जान बचाने से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी।

इतना तो पता था कि इस रात की सुबह नहीं होगी। बस यह सोच रही थी कि किसकी मौत कैसे होगी? किसी भी सूरत में अपने सामने किसी को मरते नहीं देखना चाहती थी। बाहर गोलियां चल रही थीं। करीब दो घंटे तक अस्पताल में गोलियों की बरसात होती रही। सुबह के 7 बज गए थे। कोई बाहर से वार्ड का दरवाजा पीट रहा था। मैं पेंट्री से बाहर निकल वार्ड के दरवाजे तक गई। बाहर से आवाज आई कि हम पुलिस वाले हैं, दरवाजा खोलो। मैंने दरवाजा खोला। सभी औरतें पेंट्री से बाहर आईं। सभी रो रही थीं। इतने में उनके रिश्तेदार भी आने लगे। एक-दूसरे के गले लगकर खूब रोए।

मैं थकी-मांदी अपने रूम में गई और यूनिफॉर्म चेंज करने लगी। मुझे लगा कि बीती रात मैंने क्या किया, कहां से इतनी हिम्मत आई, वो सुबह मेरे लिए बहुत अजीब थी, अनोखी थी, क्योंकि मैंने इस सुबह के बारे में सोचा ही नहीं था कि यह हमारी जिंदगी में होगी। मुझे वह सुबह अच्छी लग रही थी, बाकी सुबह से कुछ हटकर। इतने में पुलिस पंचनामा करने लगी।

मैं ट्रेन से चारकोप अपने घर आ रही थी तो लोगों को बेसुध देखकर मन कर रहा था कि इन्हें चिल्ला-चिल्ला कर बताऊं कि बीती रात हमने कैसे गुजारी है। घर पहुंची तो हम सब एक-दूसरे के गले लगकर बहुत रोए। मेरा बेटा तब दस साल का था। रात भर वह TV के सामने बैठा सब देखता रहा। वह मुझसे कहने लगा कि आई आप AK-47 नहीं लेकर आईं।

फिर एक महीने के बाद अस्पताल के स्टाफ से कसाब की तस्दीक के लिए क्राइम ब्रांच वाले आते रहे। सभी ने मना कर दिया कि किसी ने कसाब को नहीं देखा, कोई उसे नहीं पहचानता है, लेकिन मेरे जमीर ने मुझे इजाजत नहीं दी कि मैं भी बाकी लोगों की तरह मना कर दूं। हालांकि मेरा परिवार इसके खिलाफ था। मेरी मां ने कहा कि तू क्या जिंदा नहीं रहना चाहती? लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी और तस्दीक के लिए क्राइम ब्रांच की बात मान ली।

एक महीने के बाद मैं आर्थर रोड जेल गई। वहां सुपरिंटेंडेंट मैडम साठे थीं। मेरे सामने एक जैसे पांच लोग खड़े किए गए, मैंने हाथ उठाकर उंगली से इशारा किया कि यह कसाब है, मुझे पसीना आ रहा था, घबराहट हो रही थी, मैडम साठे ने मेरा हाथ पकड़ा, मुझे हौसला दिया। कसाब जोर से हंसते हुए कहने लगा- 'हां मैडम ठीक पहचाना आपने, मैं ही कसाब हूं।' उसके बाद को-विटनेस हुआ फिर कोर्ट में हियरिंग। वकील उज्जवल निकम के तीखे सवालों का सामना किया कि मैं कैसे पहचानती हूं कसाब को।

एक साल तक मुझे नींद नहीं आई। बहुत थकी होती थी, बहुत नींद आती थी, लेकिन सो नहीं पाती थी। एक साइकाएट्रिस्ट के यहां से एक साल तक इलाज चला। आज भी एक बुरे सपने की तरह वो रात याद आती है।

ये सारी बातें अंजली ने भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला को बताईं

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