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बंगाल चुनाव पर एक्सपर्ट बोले:भाजपा बंगाल में आगे दिख रही है क्योंकि हिंसा से त्रस्त जनता और मुस्लिम तुष्टिकरण से खफा हिंदुओं को उसमें अपना सरपरस्त नजर आता है

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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  • सज्जन कुमार ने बंगाल की सभी सीटों का विश्लेषण कर 'मोड फॉर पॉरिवर्तन फॉर वेस्ट बंगाल-2021' नाम से एक रिपोर्ट तैयार की है

पश्चिम बंगाल में दो चरण की वोटिंग हो चुकी है। तीसरे चरण की वोटिंग 6 अप्रैल को होनी है। पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में इलेक्शन एक्सपर्ट सबसे ज्यादा बंगाल में सक्रिय हैं। आखिर बंगाल की जनता का मूड क्या दिख रहा है? TMC बनी रहेगी या परिवर्तन होगा। कुछ ऐसे ही सवालों के साथ दैनिक भास्कर ने राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार से बातचीत की। सज्जन कुमार पिछले तीन महीने से बंगाल में हैं। उन्होंने राज्य की सभी 294 सीटों की पड़ताल कर 'मोड फॉर पॉरिवर्तन वेस्ट बंगाल-2021' नाम से एक रिपोर्ट तैयार की है। इसमें उन्होंने बंगाल चुनाव से संबंधित कुछ निष्कर्ष भी दिए हैं। पेश है, उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

बंगाल में जमीनी मुद्दे क्या हैं?

पिछले दो चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने जबरदस्त जीत दर्ज की, लेकिन इस बार TMC के खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकंबेंसी है। इसके साथ जो सबसे बड़े 4 मुद्दे TMC के लिए परेशानी साबित हो रहे हैं, वह हैं- भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीतिक हिंसा और मुस्लिम तुष्टिकरण। बंगाल में गली-मोहल्लों में तोलाबाजी, कट मनी, जैसे शब्द सामान्य प्रचलन में हैं। लोग जबरन वसूली, रिश्वत और कमीशनखोरी से त्रस्त हैं। TMC से सबसे ज्यादा नाराज युवा हैं। बेरोजगारी इनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। बंगाल में कोई बड़ा उद्योग नहीं है। पिछले 10 सालों से वहां टीचर नियुक्ति के लिए होने वाली WBSSC की परीक्षा नहीं हुई। जबकि लेफ्ट शासनकाल में पब्लिक सेक्टर में यह परीक्षा नौकरी का एक बड़ा सोर्स थी।

CPM के समय विपक्षी पार्टी के कैडर या नेताओं के खिलाफ ही हिंसा होती थी, लेकिन TMC के शासन में आम आदमी हिंसा का शिकार है। 2018 के पंचायत चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। TMC 35 फीसदी सीटें बिना विरोध के जीती थी, इसलिए नहीं क्योंकि लोग ममता दीदी को पसंद करते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि विरोधियों को चुनाव ही नहीं लड़ने दिया गया था। मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से वहां का हिंदू वर्ग बेहद नाराज है। इसलिए हिंदुत्व का मुद्दा तो वहां है ही।

क्या भारतीय जनता पार्टी बंगाल में TMC के विकल्प के तौर पर स्वीकार्य हो रही है?

भाजपा में बंगाल की जनता को पूरा पैकेज दिखाई देता है। TMC की हिंसा से त्रस्त जनता को उसमें अपना रक्षक नजर आता है तो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से निराश हिंदुओं को भाजपा में अपना सरपरस्त नजर आता है। TMC के दबंगों से मोर्चा लेने की कुव्वत भी भाजपा के ही लोगों में दिखती है। युवाओं को लगता है कि भाजपा उन्हें रोजगार देगी।

क्या वहां कोई सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव दिखता है?

अभी तक देश के दूसरे हिस्सों में बंगाल की छवि वह बनी, जो वहां के भद्रलोक ने बनाई। यह वर्ग कोलकाता में रहता है, लेकिन कोलकाता पूरा बंगाल नहीं है। जब आप बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में जाएंगे तो दिखेगा कि बंगाल की संस्कृति देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही है। जैसा कि पूरे देश में अनुसूचित जाति एवं आदिवासियों की अपनी संस्कृति होती है, यहां पर भी है। बाकी जातियों की भी अपनी संस्कृति है। यह भद्रलोक बंगाल की संस्कृति पर कब्जा जमाए बैठा था, लेकिन अब यह पकड़ ढीली पड़ने लगी है। कोलकाता के भद्रलोक ने फैलाया कि वहां बंगाली ही सब बोलते और समझते हैं। जबकि यहां दुर्गा पूजा पंडाल में कुमार शानू के गाने जमकर बजते हैं। पुरानी हिंदी फिल्में भी यहां खूब देखी जाती हैं।

दुर्गा और काली के उपासकों के बीच भाजपा राम को ले गई। क्या वहां की जनता 'जय श्रीराम' के नारे के साथ सहज है?

जिन लोगों को यह लगता है कि जय श्रीराम को भाजपा बंगाल में ले गई तो वे बिल्कुल गलत हैं। बंगाल में कुछ हिस्सों में राम का कल्ट हमेशा से मौजूद था। बंगाल में पुरुलिया जिले में अजोध्या (अयोध्या) पहाड़ है। यहां के बारे में कहा जाता है कि वनवास के दौरान राम, सीता लक्ष्मण कुछ दिनों के लिए यहां भी ठहरे थे। यह पहाड़ बंगाल का मशहूर तीर्थस्थल है। बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर में बनाई जाने वाली बालूचरी साड़ी दुनियाभर में मशहूर है। इस साड़ी में रामकथा के कथानक को बुना जाता है।

महाभारत के पात्र कृष्ण और द्रौपदी के चरित्रों का चित्रण भी साड़ी में किया जाता है। आदिवासी रामकथा के बारे में बड़े गर्व से बात करते हैं। वर्धमान, नदिया या उत्तर 24 परगना में रामकथा का प्रचलन काफी ज्यादा है। राजा राममोहन राय, रामकृष्ण परमहंस के नाम भी यहां पर पहले से विराजमान राम की पुष्टि करते हैं।

धर्म और राजनीति के बीच यहां कैसा संबंध है?

CPM ने कभी भी धार्मिक भावनाओं को राजनीति में नहीं आने दिया था, लेकिन TMC ने खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण किया। उनके धार्मिक उत्सवों को बढ़ावा दिया। हाल ही में TMC से भाजपा में आए शिशिर अधिकारी ने भी कहा कि ममता बनर्जी मुस्लिम इमाम को 25,000 रु. प्रति माह देती हैं, जबकि पुरोहितों को महज 1000 रु. प्रतिमाह मिलता है। भाजपा के बढ़ते दखल के बाद दुर्गा पूजा पंडाल के लिए भी CM ऑफिस से फंड जाने लगा। अब तो ममता खुद को हिंदू बताने के सारे प्रयास कर रही हैं।

बंगाल का चुनाव दूसरे राज्यों से अलग कैसे है?

अन्य राज्यों के मुकाबले वहां राजनीतिक हिंसा बहुत है। पिछली बार तक लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था, इस बार उनके पास विकल्प है। इसलिए इस बार लोग ज्यादा मुखर हैं।

ममता बनर्जी आज भी बंगाल में लोकप्रिय हैं, लेकिन TMC से लोग नाराज हैं, ऐसा क्यों?

मैं इसे ऐसे कहूंगा कि ममता बनर्जी की अलोकप्रियता TMC के बाकी लोगों से कम है। 2016 की ममता 2021 से बिल्कुल अलग थीं। नारदा, शारदा जैसे घोटालों के बाद भी उन्होंने 211 सीटें जीतीं, लेकिन इस बार स्थिति यह है कि ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के लिए तीन दिन रुकना पड़ता है। दरअसल, ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। लोग उनसे नफरत करते हैं। बंगाल में इस वक्त सबसे बड़ा विलेन अभिषेक ही हैं। ममता पार्टी के दूसरे लोगों से खुद को अलग कर लेती हैं, लेकिन वह अभिषेक को प्रोटेक्टर की भूमिका में देखती हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा के लिए कितनी जमीन तैयार की?

RSS बंगाल में सांगठनिक स्तर पर काफी कमजोर है। जंगलमहल या कोलकाता के बाहर RSS का प्रभाव बहुत कम है। अगर संगठन वहां मजबूत होता तो फिर भाजपा को TMC के नेताओं की जरूरत नहीं पड़ती। भाजपा के पास बंगाल में अपने नेता नहीं हैं, लेकिन इस बात को RSS कभी मानेगा नहीं। दरअसल, भाजपा के लिए जमीन TMC ने तैयार की। एंटी इनकंबेंसी फैक्टर तो था ही। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ने TMC से लोगों का मोह भंग किया और भाजपा को विकल्प के तौर पर उभारा। TMC की हिंसक राजनीति के खिलाफ मोर्चा लेने की ताकत लोगों को भाजपा में ही दिखती है।

भाजपा क्या ध्रुवीकरण की राजनीति के सहारे चुनाव लड़ रही है?

सीधे तौर पर कहना ठीक नहीं होगा। यहां लोग भाजपा को नहीं बल्कि 'मोदी-शाह' को वोट देंगे। दरअसल, तृणमूल की छवि वहां एक बड़े खलनायक की है। लोगों को लगता है कि TMC की गुंडागर्दी को मोदी और शाह ही खत्म कर सकते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मोदी-शाह ने वहां रुचि भी ली और दोनों ने अपनी मजबूत छवि का प्रदर्शन भी किया। मोदी और शाह के भीषण दौरों ने लोगों को विश्वास दिलाया कि TMC का विकल्प वही हैं।

इस इलेक्शन को बचाने के लिए ममता के पास अब क्या उपाय हैं?

लोकसभा चुनाव के बाद अगर वह इमोशनल अपील करतीं तो इसका फायदा होता। लोग उनका अतीत याद करते तो शायद उनसे जुड़ते, लेकिन उन्होंने गुंडागर्दी और हिंसा को खत्म करने की जगह आक्रामक रवैया अपनाया।

बंगाल में आपका चुनावी निष्कर्ष क्या है?

मैंने रिपोर्ट में आंकड़े भी दर्ज किए हैं। मेरे राजनीतिक विश्लेषण के हिसाब से भाजपा आगे दिख रही है। ज्यादातर सीटों पर TMC-भाजपा के बीच कांटे की टक्कर दिख रही है। कुछ सीटों पर TMC, लेफ्ट और भाजपा के बीच त्रिकोणीय टक्कर हो सकती है।

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