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बात बराबरी की:मर्दों की नजर में औरत वो सुपरवुमन है जो खाना पकाए, झाड़ू-पोंछा करे और रातभर जाग सुबह दफ्तर भी जाए

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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सर्दियों की शुरुआत थी, जब दाहिना हाथ जला। हथेली से लेकर कुहनी से कुछ पहले तक स्किन ऐसे उतरी, जैसे सांप केंचुली छोड़ता हो। डॉक्टर ने कहा- थर्ड डिग्री बर्न है, लापरवाही हुई कि इंफेक्शन हो जाएगा। जलन हाथ से होते हुए खून तक घुसपैठ कर चुकी थी।

मैं रो पड़ी, पहले सुबकते हुए, फिर हिलक-हिलककर। विदेशी परफ्यूम लगाए युवा डॉक्टर के हाथ अपने-आप कंधे पर आ टिके। उसे लगा, मैं दर्द से बेहाल हूं, लेकिन नहीं। मैं रो रही थी कि कल ऑफिस कैसे जाऊंगी! और- डेढ़ साल की बेटी की देखभाल कैसे करूंगी!

सुपरवुमन बनने की मेरी कोशिश बेकार हो चुकी थी। अब मैं औरतों पर पान की पीक से भी गहरा धब्बा थी- वे सारी औरतें जो बावर्ची, भिश्ती, कहारन से लेकर बच्चा पालने वाली भी हों, और जिनकी जेब भी गोल-गोल पूरियों जैसी फूली हो।

मैं एक ही काम कर सकती थी, या तो मां बनी रहूं या काम को लेकर बौराई रहूं। मैंने पहला ऑप्शन चुना। हुनर छोड़कर हल्के काम ले लिए। बिटिया को बढ़ता देखना मेरे लिए पांव जमीन में रोपने जैसा था। मैं बढ़ रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर जड़ों से।

इधर मेरे जानने वालों ने खूब झांय-झमक की। सबको लगा कि प्रेग्नेंसी ने मुझे निकम्मा बना दिया। वो चाहते थे कि मैं सुई की नोंक पर कथकली करूं, मैंने इनकार कर दिया। ये बात 5 साल पुरानी है, लेकिन औरतों को लेकर वक्त की घड़ी भी कुछ खास नई नहीं।

वो उसी दौर का घंटा टनटना रही है, जब मर्द शिकार पर जाते और औरतें चूल्हा सुलगाकर मांस-तरकारी की राह देखतीं। फिर धीरे-धीरे वे आगे बढ़ीं और सिलाई-बुनाई करके मर्दों की मदद करने लगीं। कुछ वक्त बाद कशीदाकारी की जगह ब्यूटी पार्लर में वैक्सिंग-पेडिक्योर ने ले ली। अब औरतें भी थोड़ा-बहुत कमाने लगीं, ताकि लिपस्टिक-सैनिटरी पैड जैसे गैरजरूरी खर्चे खुद निकाल सकें। और बच्चे पालना तो उनका जन्मसिद्ध धर्म है ही!

हाल में प्रेगा न्यूज का एक विज्ञापन आया, जो मुझ जैसी निकम्मी औरतों की मरी हुई आत्माओं को अमृत पिला-पिलाकर जिंदा कर रहा है। यूं तो पूरा का पूरा विज्ञापन ही मारक है, लेकिन पंच लाइन कुछ ऐसी है, जो उद्दंड औरतों को चाबुक मारे बगैर सीधा कर दे।

“मां बनना बेहद खूबसूरत है, लेकिन क्या कभी इसने आपको अपने ख्वाब पूरा करने से रोका? इस वुमन्स डे पर पुरानी सोच को बदल डालें, क्योंकि वो दोनों काम कर सकती है!”

गौर करें! दोनों काम यानी घर-परिवार भी, दफ्तर भी। मोटिवेशन की दुनियाभर की किताबों को जमा करके उनकी लुगदी घोलकर पी जाए तो भी जोश का वो डोज नहीं मिलेगा, जितना इस अकेली लाइन से!

हां, हम औरतें सब कुछ कर सकती हैं। हम बच्चे पैदा करके उन्हें पाल-पोस लेंगी। झाड़ू-फटका करके घर को हीरे जैसा जगर-मगर रखेंगी। छप्पन किस्म के खाने भी पकाएंगी और पति को सुख भी देंगी। इन तमाम कामों के बीच हमारा एक बाल भी तितर-बितर नहीं होगा। होंठों की मुस्कान जरा कम नहीं होगी। न ही कमानीदार भौंहों में गुस्से की गांठ दिखेगी। हम जनानियां हैं। हम सब कर लेंगी।

अब बाकी रहा दफ्तर! तो भला कौन-सी औरत घर-खर्च चलाने को कमाती है! भला किस औरत को दफ्तर चलाना आता है! जैसे खेल में कमजोर बच्चों को छूट मिलती है, वैसे ही बाहर के कामों में हम औरतों के पास दूध-भात का लंबा-चौड़ा कोटा है। हमारा काम तो बस घर-बच्चा संभालने के बीच आए पसीने को पोंछकर ठुमकते हुए ऑफिस जाना है और झमककर घर लौट आना है, लेकिन ध्यान रहे कि घरेलू कामों में जरा कमीबेसी न होने पाए।

दुनियाभर की चमकीली-चटकीली मैग्जीन्स में खाना पकाने के नुस्खे औरतों से बात करते हैं। कपड़ों को चकाचक रखने को लॉन्च हुए डिटर्जेंट में औरतें हैं। और डायपर खराब होने के कारण रोते बच्चे के लिए मां ही परेशान दिखती है। सिर्फ 2 प्रतिशत विज्ञापनों में पुरुषों को घरेलू काम करते दिखाया जाता है। और मजे की बात है कि ऐसे विज्ञापन खास हिट नहीं होते। कमाऊ मर्द कपड़े धोने का वो पावडर घर नहीं लाता, जिसके ऐड में पुरुष कपड़े फींचता दिखे। न ही वो डायपर हिट होगा, जिसमें मां की जगह पापा परेशान दिखें।

इस कायदे के साथ दुनिया मौज में चल रही थी कि तभी कुछ जलनखोर औरतें पुरुषों से बराबरी करने लगीं। वो डॉक्टर बन गईं, वकील बनकर जिरह करने लगीं और कलाकार बनकर आर्ट गैलरी भी घेरने लगीं। ये भटकी हुई औरतें अपनी साथिनों को भी बहकाने लगीं। तब शांतिदूत पुरुषों को मजबूरन दखल देना पड़ा। उन्होंने याद दिलाया कि औरतों का असल काम बच्चे पैदा करके उन्हें संभालना है, साथ में चुटपुट पैसे भी कमा लें तो कोई बुराई नहीं।

प्रेगा न्यूज का विज्ञापन भी असल में शांतिदूतों का पैगाम ही है, जो हम औरतों को पुचकारते हुए अपनी जगह दिखा रहा है।

सुनो औरतों! काम करो। खूब करो, लेकिन अपना औरत होना भूले बगैर। मां बनो। पैसे भी कमाओ, लेकिन खबरदार जो इसकी धौंस दिखाई। औरतों का तो काम ही सुपरवुमन होना है। वो सुपरवुमन जिसके चेहरे पर कोई मास्क नहीं होगा, न ही पीठ पर कोई उड़नखटोला होगा। दो दुबले हाथों और बिना किसी जादुई ताकत के वो रोज जादू करेगी।

खाना पकाएगी, घर चमकाएगी और बच्चों की टपकती नाक पर रातभर जाग अगली सुबह गुलाब-सी खिलकर दफ्तर भी चली जाएगी। वो औरत है, वो सब कुछ कर लेगी! प्रेगा न्यूज के विज्ञापन से लेकर हमारे-आपके घेरे में बसते मर्द तो कम से कम यही सोचते हैं।