बात बराबरी की:औरत के लिए मां बनने का मतलब है करियर में फुल स्टॉप लग गया, काम पर लौटीं भी तो पहले वाला रुतबा नहीं होगा

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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साल 1621, चीन के मिंग साम्राज्य के शासक जू यूजिओ ने 5 हजार सैनिकों को पूरे मुल्क में एक खास मकसद से बिखेर दिया। सैनिक घूम-घूमकर 13 से 16 साल की खूबसूरत लड़कियों को पकड़ने लगे। महल में उनकी कई लेयर पर छंटनी होती। यहां तक कि धूप और छांव में स्किन की रंगत और सोकर उठने के बाद सांस की महक भी जांची जाती, जिसके बाद खरी लड़की को राजा के पास भेज दिया जाता।

वे उपपत्नी कहलाईं, जिनका काम राजा के लिए ढेरों औलादें पैदा करना था। माना जाता था सुंदर और तंदुरुस्त युवतियों का एक ही इस्तेमाल है- शासक के लिए संतान पैदा करना।

इन 9 महीनों के दौरान लड़कियों को महल में बंद रहना पड़ता। खुली हवा में जाने पर पाबंदी थी कि यहां-वहां डोलती शैतानी ताकत बच्चे पर कब्जा न कर ले। नहाने, बाल धोने की मनाही थी कि गर्भ में पलते संतान को कहीं नजला न हो जाए। गर्भवती को आटे की लोई की तरह एक जगह बैठा दिया जाता। तो होता ये था कि नौ महीने बीतते-बीतते फुर्तीले शरीर वाली युवती पुराने आलू की तरह बेडौल और बेकार हो जाती।

हालांकि राजा को मजबूत संतानें देने के बदले ये कोई बड़ी कीमत नहीं। बदले में उसे महल में ही दासी का काम मिल जाता।

औरत का असल धर्म संतान पैदा करना ही है। इस बात को कभी प्यार से, कभी पुचकारते हुए, तो कभी अगियाबैताल बनकर इतनी बार बताया गया कि न्यूटन के लॉ की तरह ये बात भी सिद्ध हो गई। अब साइंस की किसी खोज पर भले लाख चर्चाएं हों, औरत के मां बनने-न बनने पर बहसाबहसी की गुंजाइश पूरी तरह से खत्म है। स्त्री हो- बच्चे पैदा करोगी। फुल स्टॉप! मां बनोगी- घर बैठोगी। फुल स्टॉप !

करीब छह महीने पहले SBI ने इसी तरह की बात की थी। उसने अपनी गाइडलाइन में गर्भवती महिलाओं को टेंपररी अनफिट बता दिया था। अब अच्छे शार्गिद की तरह इंडियन बैंक भी इसी कतार में शामिल हो चुका है। बैंक ने कहा कि नौकरी के लिए इंटरव्यू लेते समय ही देखा जाएगा कि महिला प्रेगनेंट तो नहीं! अगर ऐसा है तो उसे वेटिंग लिस्ट में रखा जाएगा। डिलीवरी के 6 हफ्ते बाद पूरे मेडिकल टेस्ट और तसल्ली के बाद ही उसे काम पर रखा जाएगा।

यानी अगर वो थकी हुई दिखती है, आंखों के नीचे काले घेरे हैं, बोलते हुए अटके या भूल जाए, तो बहुत मुमकिन है कि उसे अनफिट मानकर ड्यूटी पर आने से मना कर दिया जाए।

बैंक की नजर से देखें तो प्रेग्नेंसी वो ‘जरूरी बीमारी’ है, जिसका मरीज बड़े नखरे करता है। उसे मूंग दाल खानी तो है, लेकिन अचार का तड़का लगाकर। वो दवा तो गटकेगा, लेकिन शर्बत के साथ। ऐसी नखरीली औरत को बैंक के काउंटर पर बिठा दिया जाए तो अमेरिका जैसे देश को भी युगांडा बनते देर नहीं लगेगी। फिर बस। हर तिमाही-छमाही कोई न कोई बैंक सर्कुलर निकालकर युवा औरतों को अपने कैंपस से दूर रहने की वॉर्निंग देता रहता है।

यहां तक कि अमेरिका जैसा मॉडर्न मुल्क भी गर्भवती औरत को छूत की बीमारी की तरह देखता है। उसकी मौजूदगी बाकी सारी औरतों को भी अपनी चपेट में ले लेगी और वे भी काम-धाम छोड़ प्रेग्नेंसी प्लान करने लगेंगी।

कुछ साल पहले ओक्लाहोमा बोर्ड ऑफ एजुकेशन की कमेटी ने युवा महिलाओं पर इसी तरह की बात की। वो स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन में भर्तियों का समय था। इंटरव्यू में कई बेहद काबिल युवतियों को छोड़कर कमेटी ने कम काबिल लोगों और खासकर मर्दों को लिया- क्योंकि वे प्रेग्नेंट नहीं होते हैं!

एक तरफ एलन मस्क मंगल पर कॉलोनी बसाने की बात कर रहे हैं, वहीं इस दुनिया में अब भी 40 ऐसे देश हैं, प्रेग्नेंसी में जहां काबिल से काबिल औरत से सीना चौड़ा करके इस्तीफा मांगा जा सकता है। वे कोर्ट नहीं जा सकतीं, क्योंकि इसे कानूनी मान्यता मिली हुई है।

बात ठीक भी है। प्रेग्नेंसी में सूजे पैरों और पनीली आंखों वाली औरत, जो ये तक पक्का नहीं कर पाती कि कपड़े क्या पहने, वो भला कंपनी का क्या भला कर सकेगी। तो इस तरह से प्रेग्नेंट होना अपने-आप में एक किस्म की रिटायरमेंट बन गया। औरत सेहतमंद रहे, बच्चा संभालने की सुविधा रहे तो महीने-छह महीने बाद वो काम पर लौट सकती है, लेकिन पुराने रुतबे के साथ नहीं। हल्के काम के साथ। जैसे अगर वो साइंटिस्ट थी, तो उसे लैब की झाड़-पोंछ का काम मिलेगा, या सीईओ थी तो किसी ओहदेदार मर्द की सेक्रेटरी का। ये मां बनने की सजा है।

अंग्रेजी में इसे मदरहुड पेनल्टी कहते हैं। देसी-फिरंग ह्यूमन रिसोर्स कंपनियां लगातार इसपर रिसर्च कर रही हैं। थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के मुताबिक युवा लड़कियों को देखते ही कंपनियां सतर्क हो जाती हैं। भर्ती से पहले अपने अंदाज में खंगाला जाता है कि वो मां बनने का इरादा रखती है क्या, और हां, तो कब तक!

अगर औरत नई शादीशुदा है तो वे कोशिश करती हैं कि उसे काम पर न रखा जाए, या रखें भी तो कम जिम्मेदार पद पर ताकि मां बनने पर छुट्टी मांगे तो कंपनी के शेयर जमीन पर न लोट जाएं। इंडियन बैंक ने भी यही किया। प्रथा निभाते हुए दफ्तर के आगे ‘प्रेग्नेंट महिलाओं का प्रवेश निषेध’ बोर्ड लटका दिया।

आने वाले कुछ दिनों में मौसम अपनी जिल्द बदलेगा। रंगीन छतरियों के नीचे से फुदककर बच्चे बारिशों में भीगते हुए घर लौटेंगे। साइंस पढ़ेंगे, मैथ्स सीखेंगे। क्या ही बढ़िया हो, अगर साथ-साथ उन्हें बराबरी का सबक भी पढ़ाया जा सके। अगर वयस्क होकर वे समझ सकें कि प्रेग्नेंसी कोई बीमारी नहीं, न ही प्रेग्नेंट औरत कोई जिम्मेदारी है। अगर वे मान सकें कि एक औरत का मां बनना, एक मर्द को पिता भी बनाता है।

अब बात बराबरी की इन क्रिएटिव्स से होकर भी गुजर जाइए...