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देश में कोरोना से 2.5 लाख से ज्यादा मौतें:दूसरी लहर में ब्राजील-मैक्सिको में दोगुनी तो भारत में 3 गुना ज्यादा जानें गईं; 35% मौतें यहीं हुईं

एक महीने पहले

भारत में कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा 2.5 लाख के पार चला गया है। कोरोना से भारत से ज्यादा मौतें सिर्फ अमेरिका और ब्राजील में हुई हैं। भारत में जहां हर 100 कोरोना संक्रमण के मामलों पर मरने वालों की संख्या 1.1 है, वहीं अमेरिका में यह 1.8 और ब्राजील में 2.7 है। दक्षिण अफ्रीका में कोरोना से मरने वालों का औसत सबसे खराब है, जहां हर 100 संक्रमण के मामलों में 3.4 लोगों की जान गई है।

कोरोना से दुनिया में अब तक हुई कुल मौतों में से 18% अमेरिका में, 12.8% ब्राजील में और 7.6% भारत में हुई हैं। भारत के कई शहरों से अब कम मौतों की खबरें सामने आ रही हैं। जबकि कुछ रिपोर्ट्स में श्मशान में कम जगह और नदियों में लाशें बहाए जाने की बातें भी सामने आई हैं। ऐसे में यहां मौत के आंकड़ों पर सवाल उठ गए हैं।

10 मई को सबसे ज्यादा भारत में गई जानें
अक्टूबर में शुरू हुई कोरोना की तीसरी लहर का प्रकोप अब भी अमेरिका झेल रहा है। 10 मई को वहां 370 मौतें हुईं। ब्राजील में 10 मई को 1018 जान गई। मैक्सिको में इस दिन 57 मौतें हुईं। लेकिन भारत में 10 मई को 3879 लोगों की जानें गईं। इस तरह 10 मई को दुनियाभर में कोरोना से हुई कुल मौतों में करीब 35% सिर्फ भारत में हुईं।

भारत में पिछले 14 दिनों में 2 दिन छोड़कर रोजाना कोरोना से 3.5 हजार से ज्यादा लोगों की जान गईं। और इन 14 दिनों में कई दिन मौत का आंकड़ा 4 हजार के भी पार गया।

कुछ देशों में पहले के मुकाबले दोगुना मौतें, लेकिन भारत में तीन गुना से भी ज्यादा
अमेरिका में पहली लहर के दौरान जहां एक दिन में सबसे ज्यादा 2759 मौतें हुई थीं, वहीं पिछले साल ही आ चुकी दूसरी लहर इतनी घातक नहीं रही, लेकिन तीसरी लहर के दौरान एक दिन में सबसे ज्यादा मौतों का आंकड़ा 4468 रहा। ब्राजील में पहली लहर के दौरान एक दिन में सबसे ज्यादा 1554 मौतें हुई थीं, जबकि दूसरी लहर के दौरान वहां एक दिन में सबसे ज्यादा 4211 मौतें हुईं। मैक्सिको में पहली लहर में सबसे ज्यादा 796 मौतें हुई थीं, जो दूसरी लहर में बढ़कर 1394 हो गईं।

भारत में पहली लहर के दौरान एक दिन में सबसे ज्यादा 2006 मौतें हुई थीं, जबकि दूसरी लहर के दौरान सर्वाधिक मौतों का आंकड़ा 4194 रहा। बता दें भारत में सर्वाधिक मौत का यह आंकड़ा पहले 1283 था। पहले कुछ आंकड़े गिने जाने से बच गए थे, जिन्हें जोड़ देने के चलते यह संख्या 2006 आई। 1283 के हिसाब से देखें तो दूसरी लहर के दौरान मौतों की संख्या तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ गई।

ब्रिटेन में हर नागरिक का हुआ 2.39 बार टेस्ट, भारत में सिर्फ 5 में 1 शख्स की टेस्टिंग
भारत में कोरोना संक्रमण और मौतों के सही आंकड़ों को लेकर भी संशय है क्योंकि यहां बहुत कम टेस्टिंग हुई हैं। ब्रिटेन अपनी कुल जनसंख्या से 239% टेस्टिंग करा चुका है। यानी वहां हर नागरिक की करीब 2.39 बार कोरोना टेस्टिंग की जा चुकी है। वहीं अमेरिका में भी कुल जनसंख्या से 137% ज्यादा टेस्टिंग कराई जा चुकी है, लेकिन भारत में अभी मात्र जनसंख्या की 21% टेस्टिंग हुई है, यानी हर 5 में से सिर्फ 1 नागरिक की। भारत टेस्टिंग के मामले में ब्राजील जैसे देशों से भी पीछे है। कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में भारत से पीछे सिर्फ मैक्सिको है, जो अपनी जनसंख्या के केवल 5% के बराबर टेस्टिंग कर सका है।

कम टेस्टिंग होने से कोरोना के खिलाफ रणनीति बनाने में भारत अन्य देशों के मुकाबले कमजोर साबित हुआ है। WHO की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन का कहना है, 'हम फैसले लेने के लिए पॉजिटिव मामलों पर निर्भर रहे हैं, जिनमें असली आंकड़ों के मुकाबले एक बड़ा अंतर आ जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों के अंदर कोरोना के संक्रमण नहीं दिख रहे हैं। और कई सारे लोग टेस्टिंग नहीं करा पा रहे हैं।'

भारत में मौत के आंकड़ों पर उठे सवाल, सिर्फ 20% डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह
इसी साल फरवरी में कई दिन भारत में कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा 100 से भी कम रहा। 15 फरवरी को भारत में कोरोना से मात्र 76 लोगों की जान गई थी, जबकि उस दिन दुनिया में 7000 से ज्यादा मौतें कोविड से हुई थीं। उस समय भारत में कम मौतों को एक सफलता माना गया था। साथ ही दावे किए गए थे कि युवाओं की अधिक संख्या होना और पर्यावरण में पर्याप्त विटामिन डी की मात्रा होना, भारत में कोविड से हुई कम मौतें की मुख्य वजह रहा। लेकिन दूसरी लहर में भारत में बड़ी संख्या में हो रही मौतों के दौरान ये दावे नहीं सुने जा रहे और अब आंकड़ों पर ही सवाल उठने लगे है।

भोपाल में आधिकारिक आंकड़ों से 24 गुना ज्यादा और लखनऊ में 3 गुना ज्यादा मौतों की रिपोर्ट सामने आने के बाद दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में वैज्ञानिकों ने लिखा, 'संक्रमण को फैलने से रोक पाने में हमारी असमर्थता बड़े स्तर पर महामारी से जुड़े आंकड़ों की उपलब्धता न होने के चलते भी है। आंकड़ों को व्यवस्थित ढंग से नहीं जुटाया गया है और समय से इन्हें जारी नहीं किया जा रहा है।' स्वामीनाथन का भी मौतों के मामले में कहना है कि केवल 20% डेथ सर्टिफिकेट में ही मौतों की कोई वजह बताई जाती है।

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