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भास्कर ओरिजिनल:बिजली खपत में भारत तीसरे लेकिन ग्रीन एनर्जी बनाने में 10वें नंबर पर, आखिर घरों में सोलर क्यों नहीं लगवा रहे लोग?

एक वर्ष पहलेलेखक: अविनाश द्विवेदी
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दुनिया में ग्रीन एनर्जी के जरिए बिजली उत्पादन के मामले में भारत 10वें नंबर पर है, जबकि बिजली खपत में इसका तीसरा स्थान है। इतना ही नहीं इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की 2021 की 'इंडिया एनर्जी आउटलुक रिपोर्ट' में कहा गया है कि अभी भारत की ऊर्जा मांग 2040 तक तेजी से बढ़ती रहेगी। IEA के मुताबिक, 'इसकी बड़ी वजह यहां तेजी से बढ़ने वाला औद्योगीकरण होगा।'

नवीकरणीय ऊर्जा (ग्रीन पावर) के मामले में भारत अप्रैल, 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार के तय किए लक्ष्यों से बहुत पीछे चल रहा है। सरकार ने साल 2022 तक भारत की ग्रीन पावर क्षमता को 175 गीगावाट (GW) तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा था। तब भारत सिर्फ 40GW ग्रीन पावर का उत्पादन करता था और 175GW उत्पादन के लिए उसे अपनी क्षमता में चार गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी करनी थी।

संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री के दावे के बावजूद ग्रीन पावर के लक्ष्यों से दूर
ग्रीन पावर क्षमता से जुड़ी इस योजना की डेडलाइन आने में सिर्फ एक साल का समय बचा है और भारत अभी सिर्फ 93GW ग्रीन पावर के लक्ष्य तक ही पहुंच सका है, यानी सिर्फ 53% लक्ष्य ही अब तक पाया जा सका है। ऐसे में माना जा रहा है कि देश अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पाने से चूक जाएगा।

ऐसा तब हो रहा है, जबकि प्रधानमंत्री सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र में दिए एक भाषण में घोषणा कर चुके हैं कि भारत डेडलाइन से पहले 175GW ग्रीन पावर उत्पादन के लक्ष्य को हासिल कर लेगा और इसके बाद उसका लक्ष्य 450GW ग्रीन पावर के उत्पादन का होगा।

हाउ इंडिया लिव्स डॉट कॉम के लिए लिखे एक लेख में रंगोली अग्रवाल कहती हैं, 'लक्ष्य के पूरा न होने के पीछे एक बड़ी वजह, इन लक्ष्यों को पाने के लिए जरूरी माने जा रहे राज्यों का सौर ऊर्जा के लक्ष्यों से बहुत पीछे रह जाना है। गिरते दामों, कानूनी अनिश्चितताओं और हाल ही में महामारी के चलते बिजनेसों को हुए नुकसान भी ग्रीन पावर के लक्ष्यों से चूकने की बड़ी वजहों में शामिल हैं।'

सौर ऊर्जा से बनी बिजली के बहुत सस्ते हो जाने से बढ़ी चिंता
सौर ऊर्जा से बनी बिजली के गिरते दाम भी एक समस्या हैं। दरअसल राज्य, सौर ऊर्जा उत्पादक कंपनियों को उनकी 'बोली' के आधार पर सौर ऊर्जा से बिजली बनाने का ठेका देते है। बोली में तय दामों पर वितरण कंपनियां या डिस्कॉम, बिजली उत्पादकों से बिजली खरीदती हैं। बता दें कि दिसंबर तिमाही में जो बोली लगी, उसमें एक यूनिट बिजली (kWh) के दाम अब तक के सबसे नीचे स्तर 1.99 रुपए और 2.01 रुपए प्रति यूनिट तक चले गए। पिछले पांच सालों में सौर ऊर्जा से बनी बिजली के दाम करीब 50% तक गिरे हैं। पहले तो इन गिरते टैरिफ को राज्य के डिस्कॉम फायदे का सौदा मान रहे थे, लेकिन गुरुग्राम स्थित ग्रीन एनर्जी कंसल्टेंसी 'ब्रिज टू इंडिया' के नए तिमाही रिसर्च डॉक्यूमेंट में कहा गया है, 'गिरते दाम डिस्कॉम को भविष्य में दाम और कम होने का लालच दे रहे हैं, जिससे प्रोजेक्ट के कैंसिल होने का खतरा बढ़ रहा है। साथ ही पहले से चल रहे प्रोजेक्ट के दामों पर फिर से मोलभाव करने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।' रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस वजह से डिस्कॉम, सौर ऊर्जा उत्पादकों से 19GW क्षमता के नए समझौते करने से हिचकिचा रहे है।

'स्पष्ट दामों के बिना लोग भी सोलर लगवाने से झिझक रहे'
सौर ऊर्जा से बनी बिजली के दाम ग्राहकों को भी परेशान करने वाले हैं। सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस में सीनियर फेलो राहुल टोंगिया लिखते हैं, 'सोलर पावर के मामले में दाम केंद्रीय मुद्दा हैं। जो लोग अपनी छतों पर सोलर लगाना चाहते हैं, उनके लिए भी दाम तय करने में दो समस्याएं हैं। पहली, सभी उपभोक्ता एक जैसे नहीं हैं। फिलहाल खुदरा बिजली के दाम आवासीय, कृषि, व्यापारिक और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के लिए अलग-अलग हैं। इसके अलावा दिन के अलग-अलग समय के हिसाब से भी बिजली के दाम अलग हो जाते हैं। यही वजह है कि बड़े उत्पादकों को तो फायदा होता है, लेकिन सामान्य लोगों को इससे नुकसान ही होता है।'

राहुल टोंगिया वर्तमान सोलर पावर के दाम निर्धारण नियमों को जटिल बताते हैं। वो सुझाव देते हैं, 'राज्य नियामकों को दाम तय करने के मामले में कई सालों तक स्पष्टता और सरलता रखनी होगी, जिसके बिना लोग सोलर लगवाने से झिझकते रहेंगे।'

सौर ऊर्जा के जरिए बिजली बनाने का आधा लक्ष्य भी नहीं पाया जा सका
जब इस योजना की घोषणा की गई थी तो माना गया था कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऊर्जा इंडस्ट्री को बदल देगा, लेकिन तब से अब तक भारत हर साल औसतन 12GW क्षमता ही बढ़ा सका। जबकि भारत को लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हर साल करीब 20GW क्षमता बढ़ानी थी। पिछले साल तो कोरोना के चलते भारत अपनी क्षमता में सिर्फ 7GW की बढ़ोतरी ही कर सका।

ग्रीन पावर में सौर ऊर्जा को हमेशा प्रमुख माना गया है। 175GW के कुल लक्ष्य में सिर्फ सौर ऊर्जा के जरिए 100GW क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था। बता दें कि 2015 में जब यह लक्ष्य रखा गया था, तब देश सौर ऊर्जा के जरिए सिर्फ 3GW ऊर्जा का उत्पादन करता था। तब से जनवरी 2021 तक देश की सौर ऊर्जा क्षमता बढ़कर 48GW हो चुकी है, लेकिन अभी यह अपने लक्ष्य की आधी भी नहीं है।

सौर ऊर्जा में बढ़ोतरी हुई, लेकिन पवन ऊर्जा का हिस्सा घटा
भले ही भारत लक्ष्य से अभी बहुत पीछे हो, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसने ग्रीन पावर में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी की है। भारत की ग्रीन पावर में हवा और सौर ऊर्जा का हिस्सा सबसे बड़ा (दोनों मिलाकर करीब 80%) है। हालांकि चिंता की बात यह है कि जहां 2017-18 के मुकाबले सौर ऊर्जा का हिस्सा 25% से बढ़कर 39% हुआ है, वहीं वायु ऊर्जा का हिस्सा 52% से गिरकर 44% हो गया है।

सिर्फ तेलंगाना, कर्नाटक और अंडमान पूरे कर पाएंगे ग्रीन एनर्जी के लक्ष्य
वर्तमान में केवल कुछ ही राज्य और केंद्रशासित प्रदेश 2022 के लिए तय लक्ष्यों को पूरा कर पाने की राह पर हैं। इनमें से जो तीन अपने लक्ष्यों से आगे भी निकल सकते हैं, वो हैं- तेलंगाना, कर्नाटक और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह। हालांकि कर्नाटक को छोड़कर बाकी दो ग्रीन एनर्जी क्षमता के लिए बड़ा योगदान देने में असमर्थ हैं।

देश में 8 राज्य ऐसे हैं, जिनका 2022 का ग्रीन पावर की क्षमता का लक्ष्य 10GW से ज्यादा है, लेकिन उनमें से सिर्फ दो- कर्नाटक और गुजरात ही अपने लक्ष्य का 70% पूरा कर सके हैं। तमिलनाडु और राजस्थान 69% क्षमता के साथ इनसे पीछे हैं। बाकी चार राज्य आंध्र प्रदेश (47%), महाराष्ट्र (47%), मध्य प्रदेश (43%) और उत्तर प्रदेश (27%) अब तक 50% का आंकड़ा भी नहीं छू सके हैं।

क्षमता निर्माण ही काफी नहीं, भारत को ग्रीन एनर्जी से बनी बिजली का औसत भी बढ़ाना होगा
ब्रिज टु इंडिया के मुताबिक, '31 दिसंबर, 2020 तक कुल 46GW के सोलर प्रोजेक्ट पाइपलाइन में थे। कंपनी के मुताबिक मार्च की तिमाही में 2.04GW सोलर पावर और जून की तिमाही में 2.34GW सोलर पावर क्षमता और बढ़ाई जा सकती है।' लेकिन क्षमता निर्माण के बाद भारत के सामने इन ग्रीन एनर्जी सोर्सेज से बिजली उत्पादन की चुनौती भी होगी।

फिलहाल इन ग्रीन एनर्जी सोर्सेज की क्षमता, भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का सिर्फ 25% है और इनका वास्तविक बिजली उत्पादन सिर्फ 9% है। हालांकि यह वैश्विक औसत 10% के आस-पास ही होगी। चीन का ग्रीन एनर्जी के जरिए पैदा की गई बिजली का औसत भी करीब इतना ही है। जबकि वह भारत के मुकाबले चार गुना ज्यादा बिजली का उत्पादन करता है।

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