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भास्कर एक्सक्लूसिवअसेंबली ब्लास्ट से पहले भगत सिंह पर बरसे थे सुखदेव:कहा- लड़की के लिए मरने से डरते हो, भगत का जवाब था- जल्द तुम्हें इसका सबूत मिलेगा

3 दिन पहलेलेखक: वैभव पलनीटकर

'इसलिए हम आजाद हैं’ सीरीज की 6वीं कड़ी में पढ़िए दिल्ली सेंट्रल असेंबली ब्लास्ट-1929 की कहानी...

सबसे पहले ये तस्वीर देखिए...

भगत सिंह, नाम सुनते ही हैट पहने हुए खड़ी मूछों वाले नौजवान की तस्वीर आखों के सामने आती है। इस तस्वीर को खींचने की कहानी भी दिलचस्प है। सेंट्रल असेंबली बम धमाके से 4 दिन पहले, यानी 4 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पुलिस की नजरों से बचते हुए दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित रामनाथ फोटोग्राफर्स पहुंचे। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मेंबर जयदेव कपूर ने फोटोग्राफर को खास हिदायत दी- ‘हमारा दोस्त हमसे दूर जा रहा है, हमें उसकी एक बहुत अच्छी तस्वीर चाहिए।’

भगत सिंह जब स्टूडियो पहुंचे तो उन्होंने खाकी रंग की कमीज और सिर पर फेल्ट हैट लगाया हुआ था। इसी पोशाक में वे बम धमाके को अंजाम देने वाले थे। उनके दिमाग में कांड को अंजाम देने के साथ उसकी अखबारों में कवरेज का भी खाका खिंच गया था। ये भगत सिंह के ही दिमाग की उपज थी। वो क्रांतिकारी गतिविधियों की जिम्मेदारी लेते हुए इसे आम आदमी तक पहुंचाना चाहते थे।

आज 93 साल बाद मैं उसी कश्मीरी गेट पर खड़ा हूं, जो क्रांतिकारी गतिविधियों का गवाह रहा है। सड़क किनारे भगत सिंह का पोस्टर बेचने वालों को अंदाजा भी नहीं है कि यह तस्वीर पहली बार यहीं खींची गई थी।

असेंबली ब्लास्ट की वो सुबह जब क्रांतिकारी आखिरी बार मिले
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त 3-4 दिन पहले से ही दिल्ली असेंबली जाकर रेकी करना शुरू कर चुके थे। असेंबली की पब्लिक गैलरी में बैठकर उन्होंने तय कर लिया था कि खाली जगह कहां है और बम कहां गिराने हैं।

तारीख 8 अप्रैल 1929। सुबह का वक्त। दिल्ली के कुदसिया पार्क में सुबह सैर करने वाले लोग आम दिनों की तरह आ-जा रहे थे। इसी पार्क में भगत सिंह से क्रांतिकारियों की आखिरी मुलाकात होने वाली थी। भगत सिंह के साथी सुखदेव को असेंबली ब्लास्ट की पूरी प्लानिंग और इसमें शामिल खतरों के बारे में पता था। इसलिए भगत सिंह ने दुर्गा भाभी और कुछ क्रांतिकारियों को किसी बहाने लाहौर से दिल्ली बुला लिया।

दिल्ली का कुदसिया पार्क। ये वही जगह है जहां भगत सिंह, बीके दत्त, सुखदेव और दुर्गा भाभी की आखिरी मुलाकात हुई थी।
दिल्ली का कुदसिया पार्क। ये वही जगह है जहां भगत सिंह, बीके दत्त, सुखदेव और दुर्गा भाभी की आखिरी मुलाकात हुई थी।

दुर्गा भाभी वही हैं जिनके साथ भगत सिंह लाहौर में सॉन्डर्स की हत्या करने के बाद वेश बदलकर भागे थे। दुर्गा भाभी भगत सिंह के लिए संतरे और रसगुल्ले लाई थीं। भगत सिंह को रसगुल्ले बहुत पसंद थे।

क्रांतिकारियों का अनुशासन देखिए कि इस मुलाकात के बाद भी दुर्गा भाभी को भनक तक नहीं लगी कि भगत सिंह आज क्या करने वाले हैं। HSRA में नियम था कि बड़ी और अहम प्लानिंग से जुड़ी बातें सिर्फ कोर ग्रुप के मेंबर्स को ही बताई जाती थीं।

आज भी कुदसिया पार्क में पुराने दरख्त क्रांतिकारियों की उस मुलाकात के गवाह हैं। बाग में बनी इमारत करीब खंडहर हो चुकी है, लेकिन यहां भगत सिंह की याद से जुड़ा एक बोर्ड तक नहीं। आलम ये कि यहां आने वालों को भी नहीं पता है कि ये क्रांतिकारियों के मिलन की ऐतिहासिक जगह है।

कुदसिया पार्क में भगत सिंह, बीके दत्त सुखदेव और दुर्गा भाभी बैठकर बातें कर रहे हैं। साथ ही रसगुल्ले और संतरे भी खा रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
कुदसिया पार्क में भगत सिंह, बीके दत्त सुखदेव और दुर्गा भाभी बैठकर बातें कर रहे हैं। साथ ही रसगुल्ले और संतरे भी खा रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

आज की संसद की तरह ही तब भी दो बिलों पर हंगामा चल रहा था
दुर्गा भाभी से आखिरी मुलाकात के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दिल्ली असेंबली हॉल में जाने की तैयारी में जुट गए। आज जो संसद भवन है, 1929 में इसे काउंसिल हाउस कहा जाता था। इसी काउंसिल हाउस में था असेंबली हॉल, जो आज का लोकसभा है। आज जब संसद में महंगाई और GST जैसे मुद्दों पर हंगामा हो रहा है, 93 साल पहले यहां ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ और ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पर चर्चा हो रही थी।

क्रांतिकारियों में इन दोनों बिलों को लेकर जबरदस्त गुस्सा था। ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ पहले ही पास हो चुका था, जिसके तहत मजदूरों की हड़तालों पर पाबंदी लगा दी गई थी। वहीं ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के जरिए ब्रिटिश हुकूमत संदिग्धों पर बिना मुकदमा चलाए हिरासत में रख सकती थी। ये बिल आजादी की आवाज बुलंद करने वालों पर नकेल कसने के लिए लाया गया था।

भगत सिंह असेंबली हॉल में ब्लास्ट करके मजदूरों, किसानों और नौजवानों को संदेश देना चाहते थे। असेंबली हॉल में घुसने के लिए पास की व्यवस्था पहले ही की जा चुकी थी।

आज का संसद भवन। 93 साल पहले भगत सिंह और बीके दत्त ने यहां बम फेंका था। तब इसे काउंसिल हाउस कहा जाता था।
आज का संसद भवन। 93 साल पहले भगत सिंह और बीके दत्त ने यहां बम फेंका था। तब इसे काउंसिल हाउस कहा जाता था।

8 अप्रैल, 1929, सुबह 11 बजे का वक्त। असेंबली की कार्यवाही शुरू होने के थोड़ी देर पहले ही भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने एंट्री ली। भगत सिंह ने खाकी रंग की शर्ट और हाफ पैंट पहनी थी। शर्ट के ऊपर स्लेटी रंग का कोट चढ़ाया हुआ था। सिर पर था अंग्रेजी फेल्ट हैट। बताया जाता है कि ये हैट उन्होंने लाहौर की एक दुकान से खरीदा था।

दोनों क्रांतिकारी पहले से ही रेकी कर चुके थे, इसलिए सब कुछ प्लानिंग के हिसाब से होना था। बिना जल्दबाजी किए दोनों सदन की कार्यवाही को सुन रहे थे और मौके का इंतजार कर रहे थे।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के पहले सदन की कार्यवाही सुनते हुए। भगत सिंह स्लेटी रंग के कोट और अंग्रेजी फेल्ट हैट में हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के पहले सदन की कार्यवाही सुनते हुए। भगत सिंह स्लेटी रंग के कोट और अंग्रेजी फेल्ट हैट में हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

दोपहर करीब साढ़े 12 बजे का वक्त। सेंट्रल असेंबली के अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल दोनों बिलों की वोटिंग का रिजल्ट बताने के लिए खड़े हुए। तभी सदन की खाली जगहों पर दो बम आकर गिरे और एक के बाद एक, दो जोरदार धमाके हुए। चारों तरफ अफरातफरी मच गई। ‘इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के नारों से असेंबली गूंज उठी। गुलाबी रंग के वो पर्चे हवा में उड़ने लगे जिसे HSRA के साथियों ने अपनी प्लानिंग के तहत तैयार किया था।

भगत सिंह की पूरी बांह वाली खाकी रंग की शर्ट, जिस पर इटालियन कॉलर है। यही शर्ट पहनकर भगत सिंह दिल्ली असेंबली में घुसे थे। (फोटो- सुप्रीम कोर्ट)
भगत सिंह की पूरी बांह वाली खाकी रंग की शर्ट, जिस पर इटालियन कॉलर है। यही शर्ट पहनकर भगत सिंह दिल्ली असेंबली में घुसे थे। (फोटो- सुप्रीम कोर्ट)

धमाके के वक्त सदन में साइमन कमीशन वाले सर जॉन साइमन, मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, आरएम जयकर और एनसी केलकर भी मौजूद थे। करीब-करीब ये तय था कि अंग्रेज कैसे भी करके दोनों बिलों को पास करा लेंगे।

इसी सदन में पत्रकार के रूप में मौजूद थे- दुर्गादास। वो धमाके की आवाज सुनते ही प्रेस रूम की तरफ दौड़े, ताकि दुनिया तक इस धमाके की खबर पहुंचाई जा सके। उन्होंने विदेशी न्यूज एजेंसियों को इस घटना की जानकारी देने के लिए मैसेज डिटेक्ट करवाया, लेकिन पुलिस ने तुरंत सख्ती दिखाते हुए असेंबली का मुख्य दरवाजा ही बंद कर दिया।

भगत सिंह ने असेंबली में खाली जगह देखकर बम फेंका और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। साथ में बटुकेश्वर दत HSRA के पर्चे उछाल रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
भगत सिंह ने असेंबली में खाली जगह देखकर बम फेंका और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। साथ में बटुकेश्वर दत HSRA के पर्चे उछाल रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

धमाके के तुरंत बाद भगत सिंह ने उसी पिस्तौल से फायरिंग की, जिससे अंग्रेज अफसर सॉन्डर्स का मर्डर हुआ था। अफरातफरी के बाद भगदड़ मच गई, इतनी भीड़ थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आसानी से भाग सकते थे, लेकिन HSRA का प्लान था कि वो गिरफ्तारी देंगे।

बम कांड से पहले जो भी क्रांतिकारी वारदातें हुई थीं, चाहे काकोरी कांड हो या फिर सॉन्डर्स की हत्या, इसकी मीडिया में निगेटिव कवरेज हुई थी। क्रांतिकारी चाहते थे कि इस बार उनके एक्शन को चेहरा मिले और वो अपने किए कामों की जिम्मेदारी लें।

इसके बाद पुलिसिया एक्शन से लेकर अदालतों की कार्रवाई में अपने विचारों को इतनी मजबूती से रखा जाए, ताकि इसकी मीडिया में कवरेज हो और आम लोगों में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति सहानुभूति पैदा हो सके।

दिल्ली असेंबली में बम फेंकने के बाद जो पर्चे उछाले गए थे उस पर लिखा था- ‘बहरों को सुनने के लिए जोरदार धमाके की जरूरत होती है।’ इस पर्चे का पहला शब्द था ‘नोटिस।’ आखिर में कमांडर इन चीफ बलराज का नाम दर्ज था।

वारदात के बाद बटुकेश्वर दत्त को नई दिल्ली थाने ले जाया गया और भगत सिंह को दरियागंज थाने लाया गया। दिल्ली पुलिस के चीफ कमिश्नर ने होम सेक्रेटरी को लिखा, ‘आज दोपहर असेंबली में धमाकों पर दिल्ली के SP से मिली रिपोर्ट के मुताबिक जिन दो लोगों ने बम फेंके, उन्होंने भागने की कोई कोशिश नहीं की। भगत सिंह ने कहा कि वो इस धमाकों का जिम्मेदार हैं।’

उर्दू में लिखी इस FIR में भगत सिंह और बटुकेश्वर के नाम हैं। ये FIR असेंबली बम केस के दौरान नई दिल्ली पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी (फोटो- सुप्रीम कोर्ट)
उर्दू में लिखी इस FIR में भगत सिंह और बटुकेश्वर के नाम हैं। ये FIR असेंबली बम केस के दौरान नई दिल्ली पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी (फोटो- सुप्रीम कोर्ट)

तारीख 9 अप्रैल 1929। धमाके के दूसरे दिन इस कांड की मीडिया में जमकर कवरेज हुई। एक अखबार ने लिखा- ‘सरकार को लाल चेतावनी। तुम लोगों को मार सकते हो विचारों को नहीं।’ हिंदुस्तान टाइम्स ने HSRA का लाल पर्चा पूरा का पूरा छाप दिया। क्रांतिकारियों की प्लानिंग के मुताबिक अब उनके विद्रोह को लोग पहचानने लगे थे। करीब 2 साल तक देशभर के अखबार भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में छापते रहे।

दिल्ली असेंबली बम केस कोर्ट में भी चला। इस दौरान भगत सिंह को तब की दिल्ली के वाइस रीगल लॉज के तहखाने में कैद किया गया था। आज ये जगह दिल्ली यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर ऑफिस है। जिस आठ बाई दस के कमरे में भगत सिंह को कैद किया गया था, आज भी वो जगह सुरक्षित है। उस कमरे में एक खाट पड़ी है और दीवार पर भगत सिंह की तस्वीर लगी है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी का VC का दफ्तर। ब्रिटिश जमाने में यही इमारत वाइस रीगल लॉज के नाम से जानी जाती थी।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का VC का दफ्तर। ब्रिटिश जमाने में यही इमारत वाइस रीगल लॉज के नाम से जानी जाती थी।

भगत सिंह पर रिसर्च करने वाले इतिहासकार एस इरफान हबीब बताते हैं कि भगत सिंह ने जिस बम का इस्तेमाल किया था, वो किसी की जान लेने के लिए नहीं था। उनका मकसद सिर्फ जोरदार धमाका करना था। इसलिए बम भी खाली जगह देखकर उन्होंने फेंका था।

कलकत्ता में सीखा बम बनाना, आगरा में तैयार किया और झांसी में टेस्टिंग
दिसंबर 1928 में सॉन्डर्स की हत्या के कुछ महीनों बाद भगत सिंह और बाकी क्रांतिकारी दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में जमा हुए। यहां भगत सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथियों को संदेश दिया- ‘हजार पैम्फलेट की जगह अकेले एक एक्शन से कहीं ज्यादा ताकतवर प्रोपेगेंडा तैयार किया जा सकता है।’ कोशिश ये थी कि आंदोलन को आम जनता के दिलो-दिमाग में पहुंचाया जाए। इसके लिए किसी बड़े धमाके की जरूरत थी।

इसके बाद बम बनाने की तकनीक सीखने क्रांतिकारी कलकत्ता (कोलकाता) पहुंचे। वहां छज्जूराम की हवेली में भगत सिंह ठहरे। उन्होंने ऐसे लोगों की तलाश की, जो बम बनाने के एक्सपर्ट हों। उसी दौरान उन्हें जतिन दास, यतीन्द्र घोष जैसे क्रांतिकारियों का साथ मिला।

अब ये क्रांतिकारी आगरा गए। आगरा आकर हींग की मंडी में इन लोगों ने एक छोटी सी जगह किराए पर ली। यहीं पर छोटा सा पुस्तकालय भी खोला। दूसरी तरफ बम बनाना भी शुरू किया। बम की टेस्टिंग झांसी के जंगलों में जाकर की गई। बम को पहले ही इसी मकसद से तैयार किया गया था कि इससे सिर्फ धमाका हो। किसी की जान का नुकसान ना हो।

असेंबली में बम फेंककर गिरफ्तारी कौन देगा?.. इस पर हुआ विवाद
बम की टेस्टिंग हो चुकी थी और अब एक्शन की प्लानिंग चल रही थी। पहले सुझाव आया कि साइमन कमीशन को निशाना बनाना चाहिए, लेकिन तब संसाधनों की कमी थी। इसके बाद दिल्ली असेंबली में बम फोड़ने पर सभी क्रांतिकारी राजी हो गए। कार्रवाई को अंजाम देने के लिए भगत सिंह ने अपना नाम आगे किया, लेकिन लाहौर कॉन्स्पिरेसी केस जिसमें सॉन्डर्स की हत्या की गई थी, वो फाइल अभी तक बंद नहीं हुई थी।

चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह को बम कांड के लिए भेजे जाने के सख्त खिलाफ थे। मीटिंग में कानपुर के क्रांतिकारी शिव वर्मा और बटुकेश्वर दत्त का नाम बम कांड के लिए फाइनल किया गया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के इस पोस्टर को लाहौर के नेशनल आर्ट प्रेस में प्रिंट किया गया था। इसे पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के इस पोस्टर को लाहौर के नेशनल आर्ट प्रेस में प्रिंट किया गया था। इसे पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था।

जब सुखदेव को इस फैसले के बारे में पता चला तो नाराज हो गए। उनका मानना था कि भगत सिंह को ही इस काम के लिए जाना चाहिए। सुखदेव ने भगत सिंह को कायर तक बोल दिया और कहा कि एक लड़की के लिए मरने से डर रहा है।

इसके बाद एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी लिखकर भगत सिंह ने सुखदेव को जवाब दिया...

‘खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों से ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।’

चलते-चलते भगत सिंह की फोटो वाली कहानी भी जान लीजिए
रामनाथ फोटोग्राफर भगत सिंह की फोटो तो पहले ही खींच चुके थे, लेकिन बम कांड के बाद भी ये फोटो तैयार नहीं हो पाए थे। गिरफ्तारी के बाद थाने में पुलिस ने भगत सिंह की फोटो खिंचवाई और सामने वही फोटो ग्राफर था जो 4 दिन पहले उनकी फोटो खींच चुका था। वो फौरन भगत सिंह को पहचान गया।

जयदेव कपूर को ये नहीं पता था कि जिस रामनाथ फोटोग्राफर्स के पास वो भगत सिंह की तस्वीर खिंचवाने गए हैं, उसका पुलिस के साथ भी फोटो खींचने का कॉन्ट्रैक्ट है।

जयदेव डर रहे थे कि अगर वो फोटो कलेक्ट करने गए और पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया तो क्या होगा। इसलिए वे अपने साथ पिस्तौल ले कर गए, ताकि कोई अनहोनी हो तो इससे निपटा जा सके, लेकिन रामनाथ फोटोग्राफर्स ने ना सिर्फ फोटो दी, बल्कि साथ में नेगेटिव भी दिए।

रामनाथ फोटोग्राफर ने पुलिस के सामने भी भगत सिंह को पहचानने से मना कर दिया था। 4 दिन बाद ये फोटो लाहौर से छपने वाले बंदे मातरम अखबार में छपी और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का चेहरा देश के सामने आया।

रेफरेंस :
1. भगत सिंह डॉक्यूमेंट्स, चमन लाल
2. इतिहासकार इरफान हबीब
3. हिस्ट्री ऑफ मॉर्डन इंडिया, बिपिन चंद्रा
4. द दिल्ली आर्काइव्स

एडिटर्स बोर्ड: निशांत कुमार, अंकित फ्रांसिस और इंद्रभूषण मिश्र

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