भास्कर इंडेप्थ:रूस पर बैन लगाकर भारत के रास्ते सस्ता रूसी तेल खरीदना चाहता है यूरोप; इस हिपोक्रेसी से भारत की मोटी कमाई

2 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

24 फरवरी 2022 को जब रूसी टैंकों ने यूक्रेन को रौंदना शुरू किया, तो पूरे यूरोप में अफरा-तफरी मच गई। यूरोपियन यूनियन रूसी हमले के विरोध में खड़ा हो गया। इसके बावजूद इन देशों ने रूस से तेल और गैस का आयात जारी रखा। अब ये स्थिति बदलने वाली है।

यूरोपियन यूनियन अपने सभी 27 देशों में रूसी तेल के आयात पर बैन लगाने जा रहा है, जिससे रूसी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी जा सके। यूरोप के इस फैसले से भारत के लिए एक बड़ी इकोनॉमिक अपॉर्चुनिटी तैयार हो गई है। दरअसल, यूरोप के देश रूस से तेल खरीदने पर तो रोक लगा रहे हैं, लेकिन वही तेल भारत के जरिए खरीदना चाहते हैं।

भास्कर इंडेप्थ में आज हम भारत की इस इकोनॉमिक अपॉर्चुनिटी के हर पहलू को आसान भाषा में जानेंगे।

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रूस कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक

अमेरिका और सऊदी अरब के बाद रूस दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यहां से रोजाना करीब 50 लाख बैरल क्रूड ऑयल का निर्यात किया जाता है। निर्यात का 50% से ज्यादा हिस्सा यूरोप को सप्लाई होता है।

अब सवाल उठता है कि अगर यूरोपियन यूनियन ने रूस से तेल खरीदने पर बैन लगा दिया, तो इन देशों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? यही भारत के लिए बड़ा मौका बन रहा है।

भारत के लिए बड़ी इकोनॉमिक अपॉर्चुनिटी

दिसंबर और जनवरी में रूस से भारत ने न के बराबर क्रूड ऑयल खरीदा। फरवरी में जंग शुरू होने के बाद भारत की खरीद बढ़नी शुरू हुई। भारत ने रूस से मार्च 2022 में 3 लाख बैरल प्रतिदिन और अप्रैल में 7 लाख बैरल प्रतिदिन क्रूड ऑयल खरीदा। 2021 में ये औसत महज 33 हजार बैरल प्रतिदिन का था। रूसी हमले से पहले भारत अपने कुल इंपोर्ट का 1% रूस से खरीदता था, जो अब बढ़कर 17% हो गया है।

रूस से सस्ती दर पर क्रूड ऑयल इंपोर्ट करके भारत सबसे पहले अपनी अपनी घरेलू जरूरतें पूरी कर रहा है। इसके अलावा ये क्रूड ऑयल भारतीय रिफाइनर्स में जाता है, जहां इससे डीजल, पेट्रोल और जेट फ्यूल जैसे प्रोडक्ट बनते हैं। इन प्रोडक्ट्स को भारत मुनाफे के साथ विदेशों को निर्यात कर रहा है। मार्च 2022 में यूरोप को भारत ने रिकॉर्ड 2.19 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल और अन्य रिफाइंड प्रोडक्ट्स का निर्यात किया है।

यूरोपीय देशों के पास एशिया पैसेफिक रिफाइनर्स से भी तेल खरीदने का एक विकल्प है, लेकिन कम दूरी की वजह से भारत को एटवांटेज मिल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत के जामनगर से नीदरलैंड्स के रॉटरडैम पहुंचने में एक शिप को 22 दिन लगेंगे। साउथ कोरिया के उल्सान से रॉटरडैम का रास्ता 38 दिनों का है।

6 महीने की डील करना चाहती हैं भारतीय कंपनियां

रॉयटर्स के मुताबिक भारत की टॉप तेल रिफाइनिंग कंपनियां रूस से 6 महीने की डील करना चाहती हैं, जिसमें हर महीने लाखों बैरल तेल आयात किया जाएगा। रूसी रिफाइनरी कंपनी रोजनेफ्ट भारत की टॉप रिफाइनरी कंपनियों से मोल-भाव कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इंडियन ऑयल 60 लाख बैरल तेल हर महीने, भारत पेट्रोलियम 40 लाख बैरल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम हर महीने 30 लाख बैरल इंपोर्ट करने की डील करना चाहती हैं। कंपनियों को जून से सप्लाई शुरू होने की उम्मीद है।

हालांकि ऐसी किसी डील पर कंपनियों का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि अगर तेल सस्ती दर पर उपलब्ध है तो हम क्यों नहीं खरीदेंगे?

भारत के रूस से तेल खरीदने के पीछे सिर्फ मुनाफा ही वजह नहीं

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं, जबकि भारत को रूस इसमें 30 डॉलर का डिस्काउंट दे रहा है। रूस से तेल खरीदने के पीछे ये मुनाफा एक बड़ी वजह है, लेकिन इकलौती नहीं। भारत और रूस के कारोबार की जड़ें आजादी के वक्त से जुड़ी हुई हैं।

जब भारत के कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं थी और करेंसी भी कमजोर थी, उस वक्त रूस उन गिने चुने देशों में था जो भारत को सामान बेचकर रुपए में पेमेंट स्वीकार करता था। डिफेंस सेक्टर में भी रूस भारत का सबसे बड़ा साझीदार है। यूनाइटेड नेशंस में भी रूस भारत को पॉलिटिकल सपोर्ट देता रहा है।

अभी तक अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने के लिए कोई सख्त प्रतिबंध नहीं लगाए हैं। माना जा रहा है कि अगर भारत पर ऐसे प्रतिबंध लगते हैं तो अमेरिका में तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। यूरोपीय देश भी अभी तक रूस से तेल का आयात कर रहे हैं, इसलिए वो भी भारत को ऐसा न करने के लिए नहीं कह सकते।