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इंडिया की स्ट्रैट‌जी:चीन को मात देने के लिए ही भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बनाया है क्वॉड, जंग के हालात बने तो चारों देश आ सकते हैं साथ

नई दिल्ली2 वर्ष पहले
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  • क्वॉड को द क्वॉड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग भी कहा जाता है, इस ग्रुप का गठन 2007 में हुआ था
  • मार्च में कोरोना पर भी क्वॉड की मीटिंग हुई थी, पहली बार न्यूजीलैंड, द. कोरिया और वियतनाम शामिल हुए थे

भारत और चीन की सेनाओं के बीच 45 साल में पहली बार सीमा पर हिंसक झड़प हुई। इसके बाद सीमा पर तनाव और बढ़ गया। ऐसे में 58 साल बाद एक बार फिर भारत-चीन के बीच जंग जैसे हालात बनते दिख रहे हैं। लेकिन यदि ऐसा होता है तो दुनिया के कौन से देश भारत का साथ दे सकते हैं? और कौन से देश चीन का? दुनियाभर के स्ट्रैटजिक एक्सपर्ट्स भारत का पलड़ा भारी बता रहे हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने ट्वीट कर भारतीय शहीदों के परिवारों के साथ संवेदना जताई है। भारत में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत बैरी ओ फ्रेल ने भी भारत के संयम की सराहना की है।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, दोनों ही देश क्वॉड ग्रुप का हिस्सा हैं। भारत और जापान भी ग्रुप का हिस्सा हैं। दुनियाभर के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन के साथ युद्ध के हालात बनते हैं, तो क्वॉड देश सबसे पहले भारत की मदद के लिए आगे आ सकते हैं।

क्या है क्वॉड ग्रुप?

  • 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इस ग्रुप को बनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन दिया था। हालांकि, 10 साल तक तो ये निष्क्रिय ही रहा, लेकिन 2017 के बाद से चारों देशों की लगातार बैठकें हो रही हैं।
  • क्वॉड ग्रुप में शामिल सभी चारों देशों की एक ही चिंता है और वो है चीन का बढ़ता दबदबा। खासकर, उसकी विस्तारवादी नीति। यहां ये भी ध्यान रखना होगा कि क्वॉड कोई मिलिट्री अलायंस नहीं है। इसके बावजूद अगर चीन किसी को नुकसान पहुंचाता है, तो चारों देश साथ आ सकते हैं।
  • 2017 से लेकर 2019 के बीच क्वॉड ग्रुप के बीच 5 मीटिंग हो चुकी हैं। इसी साल मार्च में कोरोनावायरस को लेकर क्वॉड ग्रुप की मीटिंग हुई थी। इस मीटिंग में पहली बार न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को भी शामिल किया गया था।

क्वॉड ग्रुप के देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी-
1. अमेरिका : चीन को काउंटर करने के लिए डिफेंस पार्टनर का दर्जा दिया

  • भारत-अमेरिका के बीच 2002 में जनरल सिक्युरिटी ऑफ मिलिट्री इन्फोर्मेशन एग्रीमेंट हुआ था। इसमें तय हुआ था कि जरूरत पड़ने पर दोनों देश एक-दूसरे से मिलिट्री इंटेलिजेंस साझा करेंगे। पिछले 12 साल में ही भारत ने अमेरिका से 18 अरब डॉलर (1.36 लाख करोड़ रुपए) के हथियार खरीदे हैं।
  • फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दौरे से पहले ही भारत ने 2.6 अरब डॉलर (19 हजार 760 करोड़ रुपए) की लागत से 24 एमएच 60आर मल्टीरोल हेलीकॉप्टर खरीदने की डील को मंजूरी दी है। इतना ही नहीं, चीन को काउंटर करने के लिए ही ट्रम्प ने 2016 में भारत को 'डिफेंस पार्टनर' का दर्जा दिया था।

2. ऑस्ट्रेलिया : 1962 की जंग में भी हमारी मदद की थी

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच डिफेंस रिलेशन सालों पुराने हैं। आजादी से पहले भी दोनों विश्व युद्ध में भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई सैनिक साथ लड़े थे। आजादी के बाद 1962 में जब भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ, उस समय भी ऑस्ट्रेलिया ने भारत को सैन्य सहायता दी थी।
  • इतना ही नहीं, हर दो साल में दोनों देशों की नौसेनाएं हिंद महासागर में एक्सरसाइज करती हैं, जिसे ऑसइंडेक्स (AUSINDEX) कहते हैं। इन सबके अलावा भारत-चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया खुलकर अरुणाचल को भारत का हिस्सा मानता है।

3. जापान : दोनों देशों के बीच 2008 में सुरक्षा समझौता भी हुआ

  • भारत और जापान के बीच भी काफी करीबी डिफेंस रिलेशन हैं। दोनों देशों के बीच अक्टूबर 2008 में एक सुरक्षा समझौता भी हुआ था। इस समझौते के तहत दोनों देश एशिया-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री डकैती जैसी घटनाओं को रोकने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।
  • दोनों देशों की बीच इस तरह संबंध हैं कि दुनिया में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे को 'इंडोफाइल' भी कहा जाता है। यानी ऐसा व्यक्ति, जो भारत के साथ हमेशा खड़ा है। भारत, जापान और अमेरिका की नौसेनाएं मालाबार में एक साथ एक्सरसाइज भी करती हैं।

ये दो देश भी खुलकर भारत के साथ आ सकते हैं
इजरायल : 1971 की लड़ाई और कारगिल युद्ध में भी मदद की

  • सितंबर 1968 में जब भारत में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ का गठन हुआ, तब इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने काफी सहयोग किया था। उसके बाद 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भी इजरायल ने भारत को आधुनिक हथियार दिए थे।
  • पिछले साल पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने जिन स्पाइस-2000 बमों से मुजफ्फराबाद, चकोटी और बालाकोट में एयर स्ट्राइक की थी, वो स्पाइस-2000 बम इजरायल से ही आए थे।

फ्रांस : 1998 में न्यूक्लियर टेस्ट किया, तो फ्रांस ने इसे जरूरी बताया

  • 1998 में भारत ने पोखरण में जब न्यूक्लियर टेस्ट किया, तो कई देशों ने इसकी आलोचना की, लेकिन फ्रांस ने इसे भारत की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था। उसके बाद 1998 से दोनों देशों के बीच न्यूक्लियर, स्पेस, काउंटर-टेररिज्म, साइबर सिक्योरिटी जैसे मुद्दों पर बातचीत होने लगी।
  • 2001 से दोनों देशों की नौसेनाएं, 2004 से वायुसेनाएं और 2011 से थल सेनाएं एक्सरसाइज कर रही हैं। 2016 में भारत ने फ्रांस की सरकार और डसॉल्ट एविएशन के साथ 6 खरब रुपए की लागत से 36 राफेल खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जल्द ही भारत को राफेल विमानों की पहली खेप मिलने भी वाली है।

चीन का साथ कौन से देश दे सकते हैं?
1. पाकिस्तान : 2008 से 2017 के बीच चीन से 6 अरब डॉलर के हथियार खरीदे

  • भारत के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान, चीन का साथ जरूर देगा। इस बात को खुद चीन भी बोल चुका है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि अगर एलएसी पर तनाव बढ़ा, तो भारत को चीन के अलावा पाकिस्तान और नेपाल की सेनाओं का दबाव भी झेलना पड़ेगा। पाकिस्तान इसलिए भी चीन का साथ देगा, क्योंकि अब वो पूरी तरह से उस पर निर्भर है।
  • थिंक टैंक सीएसआईएस के मुताबिक, 2008 से 2017 के बीच पाकिस्तान ने चीन से 6 अरब डॉलर (आज के हिसाब से 45 हजार 600 करोड़ रुपए) के रक्षा उपकरण और हथियार खरीदे हैं। इतना ही नहीं, पाकिस्तान में चीन ने निवेश भी कर रखा है।

2. उत्तर कोरिया : दोनों देशों में समझौता, हमला हुआ तो साथ देंगे

  • चीन और उत्तर कोरिया के बीच 1961 में एक संधि हुई थी। इसमें तय हुआ कि अगर दोनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो दोनों एक-दूसरे की मदद करेंगे। इसमें सैन्य सहयोग भी शामिल है।
  • इसके अलावा 1950 में कोरियाई वॉर में चीन ने उत्तर कोरिया का साथ दिया था। चीन उत्तर कोरिया में किम जोंग-उन का समर्थन भी करता है।

चीन के अपने पड़ोसियों से भी संबंध खराब
चीन एशिया में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरना चाहता है और इसमें वो अभी तक कामयाब भी हुआ है। लेकिन, इस वजह से उसके पड़ोसियों से उसके संबंध खराब भी हुए हैं। भारत के अलावा उसका रूस के साथ भी सीमा विवाद था। हालांकि, उसे 2000 में सुलझा लिया गया था और अब दोनों काफी अच्छे दोस्त भी हैं। लेकिन, ताइवान और हॉन्गकॉन्ग में चीन को चुनौती मिल ही रही है। भारत ने भी इनका समर्थन किया है।

इनके अलावा दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते दबदबे से भी सब परेशान हैं। यहां के नटूना आइलैंड को लेकर सालों से चीन और इंडोनेशिया के बीच विवाद है। पार्सेल और स्पार्टी आइलैंड को लेकर चीन-वियतनाम आमने-सामने हैं। दक्षिणी चीन सागर में ही जेम्स शेल पर चीन और मलेशिया दोनों दावा करते हैं।

दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावे को लेकर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत शिपिंग का मुद्दा उठाकर चीन को चेतावनी दी है। हो सकता है कि इन सब बातों का भी भारत को फायदा मिले।

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