इनसाइड स्टोरी:वॉर मेमोरियल की शुरुआती डिजाइन का हिस्सा नहीं थी ज्योति; 26 जनवरी को PM कहां जाएंगे, इस सवाल के बाद इसे जोड़ा गया

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

जिस अमर जवान ज्योति को नेशनल वॉर मेमोरियल में शिफ्ट करने पर झगड़ा हो रहा है, वो मेमोरियल की शुरुआती डिजाइन का हिस्सा ही नहीं थी। यहां तक कि तब इसको लेकर कोई बात भी नहीं हुई थी। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में मेमोरियल बनाने वाली टीम के सबसे अहम व्यक्ति ने ये जानकारी दी है।

हालांकि उन्होंने अपना नाम देने से मना कर दिया, लेकिन बातें बहुत सारी बताईं। उन्होंने कहा, 'इस पर सुगबुगाहट तो पहले से ही शुरू हो गई थी। हमारे बीच ये बात होने लगी थी कि जब नेशनल वॉर मेमोरियल बन जाएगा तब प्रधानमंत्री 26 जनवरी को कहां जाएंगे? वॉर मेमोरियल पर या अमर जवान ज्योति? तब अमर जवान ज्योति को लेकर कुछ सवाल भी उठे थे, लेकिन तब इन बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई, क्योंकि हमारा फोकस डेडलाइन से पहले वॉर मेमोरियल बनाना था।'

1972 में इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति का निर्माण हुआ था। शुक्रवार को इसकी लौ को नेशनल वॉर मेमोरियल में शिफ्ट किया गया।
1972 में इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति का निर्माण हुआ था। शुक्रवार को इसकी लौ को नेशनल वॉर मेमोरियल में शिफ्ट किया गया।

'इतना ही नहीं वॉर मेमोरियल पर जो 15 मीटर का स्तंभ बना है, जिस पर कांसे का 112 किलो का अशोक स्तंभ लगा है, वह भी शुरुआती कॉन्सेप्ट में नहीं था। काम शुरू होने के 3 महीने बाद ज्योति बनाने का विचार आया।'

हमने उनसे जानना चाहा कि अमर जवान ज्योति को वॉर मेमोरियल में लाने का विचार आया कैसे और ये कॉन्सेप्ट था किसका? तो वो बोले, 'जब वॉर मेमोरियल बन रहा था, तब निर्माण समिति में बात हुई कि यहां ज्योति भी होनी चाहिए। समिति ने सोचा कि अगर अभी ज्योति नहीं बनी तो शायद आगे ये नहीं हो बन पाएगी। अगर आगे इस पर काम हुआ तो मेमोरियल में तोड़-फोड़ करनी होगी।'

नेशनल वॉर मेमोरियल दो हिस्सों में बनकर पूरा हुआ है। एक हिस्से में सभी शहीदों के नाम अंकित हैं और दूसर हिस्सा परम योद्धा स्थल जहां 21 परमवीर शहीदों की मूर्तियां लगी हैं।
नेशनल वॉर मेमोरियल दो हिस्सों में बनकर पूरा हुआ है। एक हिस्से में सभी शहीदों के नाम अंकित हैं और दूसर हिस्सा परम योद्धा स्थल जहां 21 परमवीर शहीदों की मूर्तियां लगी हैं।

'एक और बात ज्योति बनाना तो आसान है, लेकिन उसे जलाए रखना आसान काम नहीं है। इसके लिए कई किमी से गैस पाइपलाइन आती है। वहां लगातार सप्लाई की व्यवस्था की जाती है। साथ ही बैकअप प्लान भी बनाना होता है, ताकि किसी भी हालत में ज्योति न बुझे।'

सरकार का नहीं था दखल
अभी ये भी बात हो रही है कि नेशनल वॉर मेमोरियल सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था, ताकि राष्ट्रवाद की भावना को सिंबॉलाइज किया जा सके, लेकिन हमारे सूत्र बताते हैं कि नेशनल वॉर मेमोरियल सेना ने बनाया है। तो क्या सरकार का कोई दखल नहीं था? उनका कहना है, 'कभी भी सरकार की ओर से कोई दखल नहीं दिया गया और ना ही कोई बात हम पर थोपी गई थी। हम चाहते थे कि वॉर मेमोरियल में समारोह के दौरान बैठने की कोई जगह न हो। यहां खड़े रहकर ही सैनिकों को सम्मान दिया जाए। हालांकि व्हीलचेयर के साथ आने की व्यवस्था जरूर की।'

नेशनल वॉर मेमोरियल केंद्र सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी 2019 को नेशनल वॉर मेमोरियल का उद्घाटन किया था।
नेशनल वॉर मेमोरियल केंद्र सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी 2019 को नेशनल वॉर मेमोरियल का उद्घाटन किया था।

तो इसके निर्माण टीम में कौन शामिल थे?
निर्माण टीम में आर्मी, नेवी, एयरफोर्स के चुनिंदा लोग थे। ये प्रोजेक्ट जनरल बिपिन रावत की निगरानी में शुरू हुआ था। तब वो CDS नहीं थे। ट्राइ-सर्विसेज ऑर्गेनाइज़ेशन के अंतर्गत एक समिति बनी थी और इसमें हर तबके के सलाहकार शामिल थे।

उदाहरण के तौर पर फिल्म अभिनेता अमोल पालेकर भी सलाहकार थे। सुधा मूर्ति, जतिन दास, क्रिस्टोफर बेनिंगर, अनंता कृष्णनन जैसे गैर सैनिक लोग भी समिति के सलाहकार थे। ऐसे बहुत से लोगों ने डिजाइन के सिलेक्शन में मदद की।

निर्माण टीम में आर्मी, नेवी, एयरफोर्स के चुनिंदा प्रतिनिधि थे। ये प्रोजेक्ट दिवंगत जनरल विपिन रावत की निगरानी में शुरू हुआ था। तब वो CDS नहीं थे।
निर्माण टीम में आर्मी, नेवी, एयरफोर्स के चुनिंदा प्रतिनिधि थे। ये प्रोजेक्ट दिवंगत जनरल विपिन रावत की निगरानी में शुरू हुआ था। तब वो CDS नहीं थे।

समिति को कितने डिजाइन मिले थे, डिजाइन एप्रूव कैसे हुए?
देश-विदेश के 325 से अधिक आर्किटेक्ट के डिजाइन आए थे। योगेश चंद्रा ने ये कॉम्पिटिशन जीता था। वो बेंगलुरु के रहने वाले 44 साल के नौजवान हैं। इससे पहले उन्होंने कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं किया था।

सूत्र बताते हैं, 'डिजाइन अप्रूव करते हुए हमने इस बात का ध्यान रखा कि निर्माण लुटियंस जोन में हो रहा है और इससे उसके पैटर्न में खिलवाड़ न हो। पर्यावरण का भी ख्याल रखा गया। हालात को देखते हुए डिजाइन में कई बदलाव किए गए।'

वे कहते हैं कि परमवीर स्थल भी शुरुआती डिजाइन का हिस्सा नहीं था। फिर उसका विचार आया और सरकार ने उसके लिए फंड अप्रूव किया। आगे चलकर मशहूर मूर्तिकार राम सुथार ने मेमोरियल के म्यूरल बनाए। नेशनल वॉर मेमोरियल में सजावट के लिए 972 पेड़ लगाए गए। हमने इंडिया गेट के पर्यावरण में दखल दिए बिना ये प्रोजेक्ट पूरा किया है।

मेमोरियल के लिए कितना फंड और जगह मिली?

सूत्र बताते हैं कि शुरू में वॉर मेमोरियल बनाने के लिए हमें 10-12 एकड़ जगह मिल रही थी, लेकिन बाद में सरकार ने बढ़ाकर 40 एकड़ कर दिया।
सूत्र बताते हैं कि शुरू में वॉर मेमोरियल बनाने के लिए हमें 10-12 एकड़ जगह मिल रही थी, लेकिन बाद में सरकार ने बढ़ाकर 40 एकड़ कर दिया।

शुरुआत में निर्माण के लिए 50 करोड़ रुपए का बजट और इंडिया गेट के छह लॉन में से एक लॉन की जगह दी गई थी, लेकिन जब इसका डिजाइन पेश किया गया तो सरकार ने पूरा सहयोग दिया। अब नेशनल वॉर मेमोरियल छह में से साढ़े तीन लॉन में फैला है।

सूत्र बताते हैं, “इस योजना के लिए सरकार ने फंड और जमीन दोनों बढ़ा दिए। शुरू में हमें 10-12 एकड़ जगह मिल रही थी, लेकिन सरकार ने हमें 40 एकड़ जगह दी। 50 करोड़ रुपए का निर्धारित बजट 176 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।”

नेशनल वॉर मेमोरियल दो हिस्सों में बनकर पूरा हुआ है। एक नेशनल वॉर मेमोरियल जहां सभी शहीदों के नाम अंकित हैं और दूसरा परम योद्धा स्थल जहां भारत के 21 परमवीरों की मूर्तियां लगी हैं। परम योद्धा स्थल भी बाद में डिजाइन का हिस्सा बना।

मेमोरियल के निर्माण के दौरान सबसे बड़ा चैलेंज क्या था?

नेशनल वॉर मेमोरियल में 21 परमवीर चक्र विजेताओं की मूर्तियां लगी हैं। इनमें से तीन यानी सूबेदार संजय कुमार, सूबेदार मेजर योगेंद्र यादव और कैप्टन बन्ना सिंह अभी जीवित हैं।
नेशनल वॉर मेमोरियल में 21 परमवीर चक्र विजेताओं की मूर्तियां लगी हैं। इनमें से तीन यानी सूबेदार संजय कुमार, सूबेदार मेजर योगेंद्र यादव और कैप्टन बन्ना सिंह अभी जीवित हैं।

मेमोरियल के निर्माण के दौरान टीम के सामने सबसे बडी चुनौती तय समय में ये प्रोजेक्ट पूरा करने की थी। सेना को 10 महीने का समय दिया गया था और उसके भीतर ये निर्माण पूरा किया गया। ये भारत के इतिहास में एक रिकॉर्ड भी है। सरकार की तरफ से ये सवाल था कि क्या सही समय पर इसे पूरा कर पाएंगे। सेना ने तय समय के भीतर ये प्रोजेक्ट पूरा किया और देश को समर्पित किया। प्लान अप्रूव होने के बाद इसका कॉन्ट्रैक्ट नागार्जुन कंपनी लिमिटेड को मिला था। सेना की देखरेख में इस कंपनी ने निर्माण का काम पूरा किया।

शहीदों के सम्मान का प्रतीक बन गया है मेमोरियल

मेमोरियल के निर्माण के लिए सेना को 10 महीने का समय दिया गया था और सेना ने इस समय सीमा के भीतर ये निर्माण पूरा किया। ये भारत के इतिहास में एक रिकॉर्ड भी है।
मेमोरियल के निर्माण के लिए सेना को 10 महीने का समय दिया गया था और सेना ने इस समय सीमा के भीतर ये निर्माण पूरा किया। ये भारत के इतिहास में एक रिकॉर्ड भी है।

देश के दिल में स्थित ये वॉर मेमोरियल अब सेनाओं के प्रति सम्मान का केंद्र बन गया है। नेशनल वॉर मेमोरियल में हर रोज एक शहीद के परिवार को बुलाकर सम्मानित किया जाता है और उसकी कहानी बताई जाती है। यहां विभिन्न युद्धों में मारे गए 25,942 सैनिकों के नाम दर्ज हैं। इनके नाम मेमोरियल परिसर की 16 दीवारों पर दर्ज किए गए हैं। इसे महाभारत के चक्रव्यूह की तर्ज पर चार चक्र में बनाया गया है- ये चक्र हैं- अमर चक्र, वीरता चक्र, त्याग चक्र और रक्षक चक्र।

भारत आने वाले विदेशी गणमान्य और राजनयिक पहले राजघाट जाकर श्रद्धांजलि देते थे। अब विदेशी मेहमान नेशनल वॉर मेमोरियल में आकर भारतीय सैनिकों को सम्मान देते हैं।

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