स्टार राइटरआनंद कुमार मिलवा रहे हैं अपने गुरु से:15 किमी. साइकिल से जाता, मगर शहाबुद्दीन सर नहीं मिलते...उनका गर्व बनना मेरी उपलब्धि

7 दिन पहले
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आनंद कुमार का नाम भारत में शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है, फिर चाहे वह शिक्षक हो या छात्र। गरीब बच्चों के लिए शुरू किए गए सुपर-30 प्रोग्राम के जरिए मिसाल कायम करने वाले आनंद कुमार के पढ़ाए 510 बच्चों में से 422 का 2018 तक IIT में सलेक्शन हो चुका था। उनके काम पर डिस्कवरी चैनल डॉक्युमेंट्री बना चुका है। उनके जीवन पर फिल्म ‘सुपर-30’ बन चुकी है, जिसमें अभिनेता ऋतिक रोशन ने उनका किरदार निभाया था। आज वह बता रहे हैं कि कैसे प्रोफेसर शहाबुद्दीन ने उनके जीवन में बदलाव ला दिया...

बचपन से सुनता और पढ़ता आया हूं कि दिल से किया हुआ प्रयास कभी निरर्थक नहीं जाता। अगर पूरी ताकत लगा दी जाए तो कायनात भी आपका साथ देने लगती है और एक न एक दिन प्रयास परिणाम में जरूर बदल जाता है। मैंने एक बार नहीं, न जाने कितनी दफा अपने जीवन में इसे घटित होते हुए भी देखा है। विद्यार्थी जीवन से ही जब मेरे पास कुछ भी नहीं होता था…सिवाय हौसले के। एक दृढ़ संकल्प के।

फिर भी जब मैंने कोई असंभव दिखने वाला कार्य शुरू किया तो रास्ते खुद-ब-खुद बनने लगे। ऐसे लोगों ने मदद की जिसकी कभी कल्पना तक मैंने नहीं की थी। और फिर मैंने जितना भी सोचा था उससे कई गुनी बड़ी सफलता मिली। ऐसी एक बार भी मिलने वाली सफलता आपको आत्मविश्वास से भर देती है। फिर आप बार-बार स्वयं कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित होते रहते हैं। आज मैं अपने जीवन में घटी कुछ अभूतपूर्व घटनाओं में से एक की चर्चा आपसे करने जा रहा हूं। आज जिस घटना के बारे में आपसे बात करने जा रहा हूं, उसे सोचकर काफी मन रोमांचित हो रहा है। कभी आखें भी नम हो रहीं हैं तो मन विश्वास से भर भी रहा है।

बात एक साल पहले की है। पटना सचिवालय के आस-पास की जगह बड़ी खुली हुई है और काफी हरी-भरी भी है। अक्सर शाम को जब भी थोड़ा समय मिलता है मैं वहां टहलने चला जाता हूं। उस दिन मैं अपने एक शिष्य मंटू के साथ टहल रहा था। कुछ बातें हो रही थीं। अचानक मोबाइल फोन बजने लगा। मैंने देखा कि प्रोफेसर शहाबुद्दीन सर की छोटी बेटी का फोन आ रहा है। काफी दिनों से कोई बात नहीं हुई थी।

2008 की इस तस्वीर में आनंद कुमार और प्रोफेसर शहाबुद्दीन साथ खड़े हैं।
2008 की इस तस्वीर में आनंद कुमार और प्रोफेसर शहाबुद्दीन साथ खड़े हैं।

मैंने फोन रिसीव किया तो उधर से आवाज आई कि अब्बा की तबियत ठीक नहीं, आप जल्दी से घर पर आ जाएं। मैंने जैसे ही कहा कि मैं आ रहा हूं, शहाबुद्दीन सर ने अपनी बेटी से फोन छीनते हुए कहा- अरे आनंद तुम इन बच्चियों को जानते ही हो कुछ तो खास नहीं है। गलती मुझसे ही हो गई कि मैंने इन्हें बता दिया। आज दोनों मेरे घर आईं हुई थीं। बस सीने में थोड़ी सी जलन महसूस हो रही है। अभी आने की कोई जरूरत नहीं है। कल आराम से आओ। बहुत दिन हो गए हैं। मैंने कहा- जी सर कल पक्का आता हूं। लगभग 1 मिनट के बाद उनकी बेटी ने तुरंत फिर से फोन किया कि अब्बा अब कुछ भी नहीं बोल रहे हैं जल्दी से आप घर आ जाएं। फोन पर रोने की आवाज आने लगी। मैं और मंटू दोनों दौड़ते हुए गाड़ी तक गए और शहाबुद्दीन सर के घर की ओर चल दिए।

मैं बहुत ही तेजी से गाड़ी चला रहा था। मन बड़ा घबरा रहा था। सोच रहा था कि पता नहीं क्या हो गया है। मैं दिमाग लगा रहा था कि ऐसी हालत में किस डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं। बावजूद इसके कि मैं अपनी कार में था, थोड़ी ही देर में ही सांसें भी तेज चलने लगीं। मैं उस समय लगभग 30 साल पहले के जमाने में चला गया। पुरानी स्मृतियां एक के बाद एक मेरे दिमाग में तैरने लगीं। मुझे याद आ रहा था कि मैं कैसे कड़ी धूप में कई किलोमीटर अपनी पुरानी साइकिल के हैंडल के दोनों तरफ केरोसिन तेल के गैलन टांगे हुए शहाबुद्दीन सर के घर जाया करता था।

मेरे जीवन में शहाबुद्दीन सर की कहानी उस समय शुरू होती है जब कॉलेज में पढ़ना शुरू किया। मैं तो बिहार नेशनल कॉलेज में पढ़ता था, लेकिन मेरे स्कूल के दो अच्छे मित्र बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ते थे। और वहीं पढ़ाते थे शहाबुद्दीन सर। दीन-दुनिया से एकदम अलग-थलग। एक ही शर्ट और पैन्ट में दो-तीन साल लगातार दिखते थे। मोटे फ्रेम में हाई पावर का चश्मा। कोई दोस्त भी नहीं था उनका। कभी किसी ने उन्हें क्लास के अलावा किसी से बात करते नहीं देखा।

ईमानदारी की पराकाष्ठा थी। एक बार बहुत बड़े नेताजी के बेटे को जब उन्होंने चीटिंग करते देखकर परीक्षा से बाहर निकाल दिया तब उन पर हमला भी हुआ था। पुलिस आ गई और उन्हें प्रोटेक्शन मिला। लेकिन पुलिस वालों को उस समय बड़ा आश्चर्य हुआ जब उन्होंने बताया कि मैं कैसे आप लोगों को साथ लेकर चल सकता हूं। मैं तो खुद ऑटो-रिक्शा से सफर करता हूं, वह भी शेयरिंग वाला।

लेकिन अपने जमाने के गोल्ड मेडलिस्ट थे। मैथमेटिक्स के विद्वान। कठिन से कठिन सवाल तुरंत हल कर देना उनके लिए आम बात थी। एक बात के लिए पूरे शहर में गणित प्रेमियों के बीच चर्चा होती थी कि हर शनिवार को अपने स्टूडेंट्स को एक ऐसा चैलेंजिंग सवाल हल करके सोमवार को लाने को कहते थे जिसे शायद ही कभी कोई हल कर पाता था। फिर सोमवार को सर उसका बड़ा इंटरेस्टिंग सॉल्यूशन बताते थे। शहाबुद्दीन सर द्वारा दिए हुए सवालों को मैं रात-रात भर जागकर सॉल्व करता था। धीरे-धीरे मेरी श्रद्धा सर के प्रति बहुत बढ़ने लगी। उस वक्त इंटरनेट का जमाना तो था नहीं। मेरे दोस्त जो बताते थे उसके ही आधार पर सर की तस्वीर मेरे दिमाग में बन गई थी। अब मेरी तीव्र इच्छा उनसे मिलने की होने लगी।

1992 में जब आनंद कुमार ने शौकिया तौर पर पढ़ाना शुरू किया था तब भी प्रोफेसर शहाबुद्दीन वहां आए थे।
1992 में जब आनंद कुमार ने शौकिया तौर पर पढ़ाना शुरू किया था तब भी प्रोफेसर शहाबुद्दीन वहां आए थे।

मैंने अपने दोस्तों से रिक्वेस्ट किया कि यार मिलवा दो इस महान शख्सियत से। दोनों दोस्तों ने तुरंत हाथ खड़े कर दिए और कहा कि कौन जाता है उनसे बात करके झंझट में पड़ने। कहीं कोई सवाल न दे दें हल करने को।

मुझसे नहीं रहा गया। मैंने उठाई साइकिल और चल दिया इंजीनियरिंग कॉलेज बिना किसी के रेफरेंस के उनसे मिलने। मैथमेटिक्स डिपार्टमेंट में जाने पर पता चला कि वह अगले 10 दिनों के लिए छुट्टी पर हैं। उत्सुकता इतनी थी कि मेरे लिए अब 10 दिन काटना बड़ा मुश्किल था। मैंने सोचा चाहे जो हो जाए मुझे आज ही मिलना है शहाबुद्दीन सर से। मैंने बहुत लोगों से उनके घर का पता पूछा। सबका एक ही जवाब था कि पता नहीं। बड़ी ही मुश्किल से बस इतना पता चला कि वे फुलवारी-शरीफ मुहल्ले में रहते हैं। आज तक कोई उनके घर नहीं गया था। न कोई प्रोफेसर, स्टूडेंट, न कोई क्लर्क या चपरासी।

मैंने सोचा कि चलो आज ही पता करते हैं शहाबुद्दीन सर का घर। गर्मीं के दिनों में चिलचिलाती धूप में लगभग 15 किलोमीटर साइकिल चलते हुए मैं फुलवारी-शरीफ मोहल्ले में पहुंच गया। बहुत बड़ा मोहल्ला है फुलवारी। कई किलोमीटर में फैला हुआ। बहुत लोगों से पूछा, सर का पूरा परिचय बताया लेकिन किसी से कोई जानकारी नहीं मिली। घंटों बीत गए। प्यास लगी थी पर जेब खाली थी। सड़क के किनारे सरकारी नलके से अपनी प्यास बुझाई। लग रहा था कि अब निराश होकर घर लौटना पड़ेगा। लेकिन बार-बार दिमाग में यही बात घूम रही थी कि रहते तो हैं इसी मोहल्ले में, तब मैं हार कैसे मान लूं। अचानक मेरे दिमाग में एक आइडिया आया।

मैंने अनुभव किया है कि बिना मेहनत जिंदगी में कुछ भी नहीं मिलता है। यहां तक कि दिमाग भी उसी वक्त काम करता है जब आप इस पर जोर डालते हैं। मेरे दिमाग में बात आई कि सर जरूर कॉपी-पेन और किताब खरीदते होंगे। और फिर मैं स्टेशनरी की एक दुकान पर गया। दूकानदार से उनका हुलिया बताते हुए पूछा कि क्या आप किसी ऐसे आदमी को जानते हैं। दुकानदार ने कहा- हां, जानता हूं। नाम से भी जानता हूं। अब तो मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं था। लगा जैसे मैंने आसमान के सारे तारे ही तोड़ लिए हों। लेकिन दुकानदार सिर्फ इतना ही बता पाया कि वह रोज शाम को इसी रास्ते से आगे जाते हैं। इसके आगे वह कुछ भी नहीं जानता था।

मैं अब हाथ से साइकिल पकड़े हुए उस रास्ते आगे बढ़ रहा था। खासकर जो भी स्टूडेंट्स दिखाई पड़ते मैं उससे उनका पता पूछता था। लेकिन निराशा ही हाथ लगती थी। तब मैंने और दिमाग पर जोर डाला और फिर मैंने वहां पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की खोज शुरू की। मुझे पता था एक सरकारी बस फुलवारी से पटना यूनिवर्सिटी आती-जाती है। शायद सर कभी-कभी बस से कॉलेज जाते हों। कई लोगों से पता करने के बाद एक स्टूडेंट ने एक छोटी सी गली की ओर इशारा करते हुए आखिर बता ही दिया कि शहाबुद्दीन सर कहां रहते हैं।

गली में कोई 10 ही मकान थे सो अब खोजना कोई इतना मुश्किल नहीं था। मैं सर के मकान के नीचे खड़ा था। फर्स्ट फ्लोर पर किराये के मकान में उस वक्त रहते थे सर। मैंने बेल दबाया और शहाबुद्दीन सर ने ऊपर से ही झांकते हुए बड़े गुस्से में कहा कि जाते हो कि नहीं अब मैं और चंदा नहीं देने वाला हूं। मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा कि सर मैं चंदा नहीं मांगने आया हूं। बस आपसे मिलने और कुछ बातें करने आया हूं। उन्होंने फिर कहा कि क्या बात है, बताओ। मुझे बड़ा अजीब लग रहा था मैंने बता दिया कि बहुत दूर से आ रहा हूं। पसीने से लथपथ चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी। फिर भी उन्होंने न तो ऊपर बुलाया और न ही खुद ही नीचे आए। मैंने कहा कि सर मुझे कुछ सवाल आपसे पूछना है, कुछ सीखना है। बड़ी उम्मीद के साथ आपके पास आया हूं। तब वह बड़े तपाक से बोले कि मैं ट्यूशन नहीं पढाता हूं, और अंदर चले गए। मैं निराश होकर अपने घर वापस लौट रहा था। सोच रहा था कि कभी उनसे बात होगी भी कि नहीं।

तीन-चार दिनों बाद मैंने फिर से हिम्मत जुटाई और फिर मैं कॉपी-पेन लिए साइकिल चलाते हुए उनके घर पहुंच गया। उन्होंने फिर से मिलने के लिए मना कर दिया। अब मैं हर हफ्ते किसी न किसी दिन उनके घर जाता था और सर रेलिंग से झांकते हुए मिलने से मना कर देते थे। यह सिलसिला लगभग 8 महीने तक चलता रहा लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी।

मुझे पता था कि भक्ति में, श्रद्धा में बड़ी ताकत होती है। अगर मन सच्चा हो तब सब कुछ मिल जाता है। और आखिर एक दिन आ ही गया जब सर नीचे उतरकर आ गए। मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं था। जैसे लग रहा था कि मेरे मन की वीणा झंकृत हो गई है। मन में संगीत चल रहा था। मैंने उनके चरण स्पर्श करते हुए अपना परिचय बताया और वह जो भी सवाल अपने स्टूडेंट्स को हल करने देते थे उन तमाम सवालों का सॉल्यूशन उन्हें दिखाया। फिर क्या, सर प्रभावित हो गए। उन्होंने कहा कि पूछो जो पूछना है। मैंने मैथमेटिक्स पर उनके साथ डिस्कशन शुरू कर दिया। और फिर यह सिलसिला शुरू हो गया। हफ्ते में एक दिन डिस्कशन जरूर होता था।

आज भी मुझे याद है। सर तो अपने घर में मुझे नहीं ले जाते थे। कुछ सीखने के लिए घर के नीचे गली में दमघोंटू बदबूदार नाली के पास खड़े रहने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था। एक साल, दो साल और जब तीन साल से भी ज्यादा हो गए तब सर ने पहली बार कहा कि आ जाओ। ऊपर ही आ जाओ। उस दिन मैं उनके घर में पहली बार गया था। ढेरों सारी किताबें। सब के सब बिखरी हुईं। लगा कि जैसे किसी कहानी वाले मैथमेटिशियन के घर में आ गया हूं। बैठने की जगह नहीं थी। चौकी पर ही हम दोनों बैठे थे। उन्होंने शरमाते हुए कहा था कि आनंद मैं तुम्हें ऊपर इसलिए नहीं बुलाता हूं कि मेरा घर अच्छा नहीं है। अब तो मैं अक्सर उनके घर चला जाता था और पढ़ाई के दरम्यान प्रत्येक बार उनकी दोनों बेटियां रस्क, बिस्कुट और चाय पिलाना नहीं भूलती थीं।

गुरु-शिष्य का प्रेम बढ़ता चला गया। कभी केरोसिन तेल आउट ऑफ मार्केट हो जाता तब मैं अपनी साइकिल के हैंडल पर दो गैलन तेल उनके घर पहुंचाता था। कभी जब उनकी तबियत खराब हो जाती थी तब मैं उनको डॉक्टर के पास ले जाया करता था। धीरे-धीरे मैं उनके परिवार के बहुत करीब हो गया था। वह भी मुझे बेटा कह कर संबोधित करने लगे। और दोनों बेटियां मेरी बहन बन गईं थीं।

मुझे याद है कि सर बहुत खुश हुए थे जब मेरा पेपर विदेशी जर्नल में पब्लिश हुआ था। और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में मेरे सलेक्शन की जानकारी के बाद तो उन्होंने मुझे मिठाई भी खिलाई थी। बहुत कम बोलने वाले सर जब मुझे कहते थे कि बेटा मुझे तुम पर गर्व है तब मैं बहुत ही खुश हो जाता था। मेरे घर आने लगा था उनका पूरा परिवार।

समय बदला। मेरी शादी हुई और बच्चे भी। मैं अपने दोनों बच्चों और पत्नी के साथ भी उनके घर आता-जाता था। उनका पूरा मोहल्ला मुझे पहचानता है। भले कुछ भाषण न देते हों लेकिन सुपर-30 के हर कार्यक्रम में वो जरूर आते थे। सुपर-30 फिल्म के समय तो उन्हें बधाई देने उनके ही मोहल्ले के लोग गए थे। उन्होंने फोन किया था उस दिन कि बेटा आज मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।

ये तस्वीर 2008 की है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुपर-30 के बच्चों को सम्मानित करने पहुंचे थे। उन्हें पता चला कि आनंद कुमार के गुरु प्रोफेसर शहाबुद्दीन भी वहीं हैं। प्रोफेसर शहाबुद्दीन जिस कॉलेज में प्रोफेसर थे, नीतीश कुमार भी वहीं से पढ़े थे। मुख्यमंत्री ने प्रोफेसर शहाबुद्दीन को भी मंच पर बुलाकर सम्मानित किया।
ये तस्वीर 2008 की है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुपर-30 के बच्चों को सम्मानित करने पहुंचे थे। उन्हें पता चला कि आनंद कुमार के गुरु प्रोफेसर शहाबुद्दीन भी वहीं हैं। प्रोफेसर शहाबुद्दीन जिस कॉलेज में प्रोफेसर थे, नीतीश कुमार भी वहीं से पढ़े थे। मुख्यमंत्री ने प्रोफेसर शहाबुद्दीन को भी मंच पर बुलाकर सम्मानित किया।

मैं मंटू के साथ उनके घर पहुंच चुका था। मेरी तन्द्रा टूट गई। घर से रोने की आवाज आ रही थी। सर चुपचाप लेटे हुए थे। कुछ हरकत नहीं हो रही थी उनके शरीर में। मोहल्ले वाले भी तब तक जुट गए थे। हम लोग बगल के हॉस्पिटल में सर को ले गए। पता चला कि सर अब इस दुनिया में नहीं हैं।

सर ने मेरे लिए जो किया उसे मैं कभी नहीं भूल सकता हूं। आज भी मैं दोनों बहनों के संपर्क में हूं। जब भी किसी बहन से बात होती है तब वह जरूर कहती है कि अब्बा आपसे कितनी मुहब्बत करते थे, बहुत दिनों से आपसे बात नहीं हुई थी पर आखिरी बार आपसे ही बात करके इस दुनिया से गए। शहाबुद्दीन सर जो किसी से बात नहीं करते थे, मुझसे भी इतनी मुहब्बत करने लगे थे…यही मेरे जीवन की उपलब्धि है।

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