कोई अजनबी यूं 35 टुकड़े नहीं करता:गलती श्रद्धा की पसंद की होती तो अरेंज मैरिज वाली लड़कियां क्यों बलि चढ़तीं?

20 दिन पहले
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वो 27 साल की लड़की थी। सुंदर, शहरी, पढ़ी-लिखी। आजादख्‍याल लड़की, अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने वाली। दुनिया के नियमों को, माता-पिता के बंधनों को, दुनियादारी के पहरों को न मानने वाली। सपने देखने वाली, खुश रहने वाली, प्‍यार करने वाली।

एक ऐसी लड़की, जैसा बहुत सारी लड़कियां होने का सिर्फ सपना देखती हैं, लेकिन हो नहीं पातीं।

किसने सोचा था कि एक दिन वो लड़की अपने ही घर के फ्रिज में 35 टुकड़ों में मिलेगी। एक दिन वो दुनिया से यूं चली जाएगी। एक दिन वही लड़का चाकू से उसके शरीर के 35 टुकड़े कर देगा, जिससे उसने सबसे ज्‍यादा प्‍यार किया, जिस पर सबसे ज्‍यादा भरोसा किया, जिसके लिए दुनिया से लड़ गई, परिवार से बगावत की।

27 साल की चमकीली और खिलखिलाती आंखों वाली श्रद्धा वालकर अब इस दुनिया में नहीं है। उसके ब्वॉयफ्रेंड और लिव इन पार्टनर आफताब पूनावाला ने उसे मारकर उसकी लाश के 35 टुकड़े कर उसे महरौली के जंगलों में फेंक दिया। वो 18 दिनों तक उसी कमरे में सोया, जिस कमरे के फ्रिज में श्रद्धा की लाश के टुकड़े थे। वो लगातार श्रद्धा का सोशल मीडिया पेज अपडेट करता रहा ताकि लोगों को लगे कि वो जिंदा है।

ये वो लड़का था, जिससे वो लड़की प्रेम करती थी। हम सोच भी नहीं सकते कि एक दिन अपने प्रेम के हाथों से इस तरह दफन कर दिए जाएंगे। श्रद्धा तो अब दुनिया में नहीं है, लेकिन ऐसी ढेर सारी श्रद्धाएं हैं, जो उसी लड़की की तरह बिंदास, बेलौस और आजाद रहना चाहती हैं।

अपने जीवन के फैसले खुद लेना चाहती हैं, अपनी मर्जी से प्रेम करना और अपना साथी चुनना चाहती हैं, हां और ना कहने का हक चाहती हैं। उन लड़कियों के लिए श्रद्धा की जिंदगी से सीखे जाने वाले सबक से जरूरी सबक क्‍या है।

इस दुखद कहानी की पारंपरिक, दुनियावी व्‍याख्‍याओं में दुनिया और परंपरा सिर्फ अपना मुंह बचा रही है और असली दोषी व्‍याख्‍याओं में सिरे से नदारद है।

आप इस घटना पर लिखे जा रहे सोशल मीडिया पोस्‍ट, संपादकीय और अपने आसपास के लोगों के विचार सुनिए। उनके हिसाब से कौन दोषी है?

उनकी नजरों में दोषी लड़का है। उनकी नजरों में दोषी लिव-इन रिलेशनशिप है। उनकी नजरों में दोषी है प्‍यार और प्‍यार करने की आजादी। उनकी नजरों में लड़का-लड़की का यूं बेखौफ साथ होना, मिलना-जुलना दोषी है। उनकी नजरों में लड़के का एक खास धर्म दोषी है।

माता-पिता अपनी बेटियों को प्‍यार के खिलाफ, अपनी मर्जी के रिश्‍ते के खिलाफ, लिव-इन के खिलाफ, अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक रिश्‍तों के खिलाफ डरा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग पूरी बेशर्मी से लिख रहे हैं कि लिव-इन में रहने वाली, प्‍यार करने वाली लड़कियों का यही हश्र होता है।

लोगों की सलाह है कि इन सारी तकलीफों से निजात का रास्‍ता है पुरानी पारंपरिक शादियों की तरफ लौट जाना। माता-पिता का कहना मानना। शादी तक अनछुई, कुंवारी रहकर उनकी मर्जी से, उनके खोजे वर से शादी करना।

वो दोबारा पूरी बेशर्मी से परंपरा के सामने अदब से सिर झुकाने वाली उन सारी लड़कियों को अनदेखा कर देते हैं, जो मायके से ससुराल जीती-जागती गई थीं और लाश बनकर लौटीं। जो माता-पिता के चुने संस्‍कारी पतियों के हाथों मारी गईं। जो दहेज के लिए जिंदा जला दी गईं।

वो उन कहानियों को भी अनदेखा कर देते हैं, जहां प्रेम करने पर लड़की को खुद उसके माता-पिता, भाइयों ने काटकर अपने ही घर के आंगन में गाड़ दिया और उस पर तुलसी उगा रहे हैं।

मर्द के हाथों औरत की हत्‍या कोई नई बात नहीं है। यूएन विमेन का डेटा कहता है कि पूरी दुनिया में औरतों के साथ होने वाले 70% क्राइम में क्रिमिनल परिवार और पहचान के लोग होते हैं।

माता-पिता, भाई, पति, इंटीमेट पार्टनर। कोई अनजबी आकर यूं ही एक दिन लड़की को 35 टुकड़ों में नहीं काट देता। वही करता है ये काम, जिस पर वो भरोसा कर रही होती है।

इन सबके माथे दोष मढ़ने वालों ने सिर्फ एक ही पार्टी को इस दोष से मुक्‍त कर रखा है और वो है खुद श्रद्धा के माता-पिता और उसका परिवार। श्रद्धा ने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ ये रिश्‍ता चुना था। लड़की ने अपने मन का किया तो माता-पिता ने क्‍या किया। उन्‍होंने रिश्‍ता खत्‍म कर लिया। अपना सपोर्ट वापस ले लिया।

लड़की ससुराल में हो या लिव-इन पार्टनर के साथ। वो मार खाती है, हिंसा सहती है, अब्‍यूज बर्दाश्‍त करती है, लेकिन लौटकर घर नहीं जाती। किसी से मदद नहीं मांगती। वो मुंह खोलकर कहती नहीं कि वो खुश नहीं। उसे बचा लो। कोई मदद कब नहीं मांगता?

जब उसे पता होता है कि उसके पास मदद करने वाला कोई नहीं है। जब उसे पता हो कि उसे कोई नहीं बचाएगा। वो दुनिया में अकेली पड़ गई है।

यह इंसान का स्‍वभाव है कि असुरक्षा महसूस होते ही वह किसी सुरक्षित जगह की तलाश करता है। आग से हाथ जलते ही पानी ढूंढता है। बारिश होते ही छांव। बच्‍चा चोट खाते ही मां की ओर भागता है। लेकिन ये औरतें ही हैं, जो जहां मार खा रही हों, दुख सह रही हों, रोज मर रही हों, वहीं मरती रहती हैं।

इस हद तक कि एक दिन मार डाली जाती हैं। लेकिन वो सुरक्षा की तलाश में नहीं जातीं। वो मदद नहीं मांगतीं। वो खुलकर कहती नहीं कि मैं खतरे में हूं। मुझे बचाओ।

क्‍योंकि आपकी इस महान, संस्‍कारी दुनिया में सुरक्षा और मदद नहीं है। ये असफलता, ये दोष, ये आपका है। इस समाज का, परिवार का, संस्‍कारों के कुटिल, स्‍वार्थी और मक्‍कार जाल का।

हर वो लड़की जो ससुराल में जिंदा जला दी जाती है, जो पति से मार खाती है, जो चुप रहकर सारे दुख सहती है, जिसका सिर फोड़ दिया जाता है, हड्डी तोड़ दी जाती है।

जिसके सिर और कमर पर चोटों के निशान हैं, उसका दोष उसे मारने वाले लड़के से कहीं ज्‍यादा उसके माता-पिता का, परिवार का, समाज का और इस दुनिया का है, जिसने इस लड़कियों को इतना अकेला छोड़ दिया। जो कभी मदद को आगे नहीं आए।

इन घटिया, दोहरे, सामंती और मर्दवादी मूल्‍यों का, जिसने मर्द के द्वारा की जाने वाली हिंसा को इतना नॉर्मलाइज कर रखा है। लड़कियां अपने घरों में पिता की हिंसा देखते हुए, मां को पिता के सामने अपमानित होता देखते हुए, भाई का रौब सहते हुए, सड़कों पर उसकी छातियां ताड़ रही मर्द की गंदी नजर और सिनेमा में कबीर सिंह को अपनी गर्लफ्रेंड को थप्‍पड़ लगाते हुए देखते बड़ी होती हैं।

हमारा समाज हर कदम पर मर्दों की हिंसा को नॉर्मलाइज करता है। उसे स्‍वीकार करता है, उसके लिए जगह बनाता है। वो लड़कियों को सिखाता है कि पिता के घर से डोली और पति के घर से अर्थी उठती है। वो हजारों खुले-ढंके तरीकों से औरतों को मर्दों के अहंकार, क्रोध और हिंसा को सहने और चुप रहने का पाठ पढ़ाता है। वो मदद का हर हाथ खींच लेता है। वो अपनी बेटियों को सहने और मरने के लिए अकेला छोड़ देता है।

एक श्रद्धा की कहानी आज इतनी बड़ी हो गई है कि मीडिया की सुर्खियों में है। लेकिन ऐसी हजारों श्रद्धाएं रोज मर रही हैं क्‍योंकि मर जाने के अलावा उनके पास कोई दूसरी राह नहीं। कोई मदद नहीं, भरोसा नहीं, प्‍यार नहीं, सुरक्षा नहीं। उनके अपने परिवार, माता-पिता उनके साथ नहीं। कोई नहीं कि जिसे डर लगने पर वो आवाज लगा सकें, बुला सकें।

इसलिए दोष न उस लड़की को दीजिए, न लिव इन को, न प्‍यार को, न आजादी को, न अपने फैसले लेने की इच्‍छा को। दोष दीजिए खुद को कि आपने बेटियों को अपना सम्‍मान करना, अपना आदर करना, अपने लिए खड़े होना, कोई गलत बात बर्दाश्‍त न करना नहीं सिखाया।

आपने उसे टॉक्सिक मर्दानगी की पहचान करना, सिर न झुकाना, न सहना नहीं सिखाया। आपने उससे नहीं कहा कि कोई एक थप्‍पड़ भी नहीं लगा सकता, कोई आवाज ऊंची नहीं कर सकता, कोई रौब नहीं जमा सकता, कोई तुम पर शासन नहीं कर सकता।

आपने उसे चुप रहना सिखाया। तो वो चुप रही और मर गई। आप कहां थे तब, जब आपकी बेटियां मार खा रही थीं। जिंदा लाशों में तब्‍दील हो रही थीं, दफनाई जा रही थीं। अपने ही घर के आंगन में गाड़ी जा रही थीं।

आप संस्‍कृति बचा रहे थे। वही संस्‍कृति, जिसकी महान भव्‍य इमारत आपकी बेटियों की कब्रों पर खड़ी है।

अब बात बराबरी सीरीज की ये 3 स्टोरीज पढ़ लीजिए

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