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ब्लैकबोर्डकश्मीर गया था पैसा कमाने, ठेकेदार ने बंदी बना लिया:पैसे मांगने पर पिटाई करता, कहता था- तुम्हारी बीवी को उठवा लेंगे

छत्तीसगढ़ के जांजगीर से9 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा

बुखार में तपती 9 महीने की बेटी को लिए मैं गिड़गिड़ा रहा था कि मुझे घर जाने दें। बदले में उन्होंने मुझे 10 का नोट देकर सरकारी अस्पताल जाने को कह दिया। साथ में उनका एक आदमी था, जो चौबीसों घंटे नजर रखे था। कोई हमें गरदन उड़ाने की धमकियां देता। कोई पीटता। औरों के लिए कश्मीर भले जन्नत हो, हमारे लिए जहन्नुम था।

छत्तीसगढ़ी-मिली हिंदी में बात करते भोजराम बंजारे ये बताते हुए बेटी को गोद में उठा लेते हैं। उसे थामे उन हाथों में जितनी नरमी है, उतनी ही सख्ती आंखों में है। वे बार-बार कहते हैं- अब कश्मीर नहीं जाएंगे, चाहे भूखे मर जाएं।

इसी महीने की 17 तारीख को वे बडगाम से छत्तीसगढ़ लौटे। वही बडगाम, जहां सुखनाग नदी बहती है। सुखनाग यानी खुशियां देने वाली नदी। कहते हैं, कभी इसका पानी इतना पारदर्शी था कि लोग आइना नहीं खरीदते थे। भोजराम को पारदर्शी नदी की झलक नहीं मिली।

उन्होंने घाटियों में कलकलाता झरना या बर्फ नहीं देखी। वे ईंट भट्टी के पास फूस की झोपड़ी में रहते, जहां बिना सांकल वाले दरवाजे को हवा भी छुए, तो 24 साल के इस युवक की छाती धड़-धड़ करती। वे बंधक थे, जिन्हें आने वाले कई महीनों तक बिना पैसे काम करना था।

हफ्तेभर पहले कश्मीर से एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें छत्तीसगढ़ के मजदूर घर-वापसी की गुहार लगा रहे थे। बात बढ़ने पर दोनों राज्यों ने दखल दिया और उन्हें कैद से छुड़ाकर घर भेजने का सिलसिला शुरू हो गया।

लौटे हुए इन्हीं लोगों से मिलने मैं सक्ती पहुंची। रायपुर से तकरीबन 250 किलोमीटर दूर ये जिला इसी महीने जांजगीर से अलग हुआ है। नई गृहस्थी में जैसे जीरा-हल्दी मसालदानी की बजाय कागज की पुड़िया में बंधी होती है, कुछ वैसी ही अस्त-व्यस्त चीजें यहां भी बिखरी पड़ी दिखीं।

चोरभट्टी गांव काफी पिछड़ा हुआ है। एक दफा बारिश हो जाए, तो फिर कीचड़ से सने रास्ते मिलेंगे।
चोरभट्टी गांव काफी पिछड़ा हुआ है। एक दफा बारिश हो जाए, तो फिर कीचड़ से सने रास्ते मिलेंगे।

सड़क के नाम पर छोटे-बड़े गड्ढे और घरों की जगह कच्ची ईंट के मकान। पता पूछते-पुछाते चोरभट्टी गांव आया। सामने ही एक दुकान पर कुछ लोग ताश खेल रहे थे। ‘कश्मीर से लौटे मजदूर’ कहने पर एक ने तुरंत कुछ कच्चे मकानों की तरफ इशारा कर दिया।

मैं आगे बढ़ती, इससे पहले दूसरे ने टोका- ‘पैदल झन जा, गज्जब चिखला हवे!’ पैदल मत जाओ, बहुत कीचड़ है। ताश खेलते चेहरों पर अजनबियों के लिए चिंता थी। मैं सिर्फ अंदाजा लगा सकी कि ऐसे भोले-भाले लोगों की परेशानी तब कैसी रही होगी, जब उनके अपने कश्मीर में फंसे थे।

कच्ची बस्ती के उन घरों के आगे भीड़ लगी थी। स्त्री सुंदर साड़ी और आदमी अपने सबसे अच्छे (शायद) कपड़ों में हंस-बोल रहे थे। मेरे पहुंचते ही सन्नाटा छा गया। आने का मकसद सुनकर एक ने कहा- ‘लौट गए, बस, काफी है। बताएंगे तो क्या हमारी चोट भर जाएगी!’

थोड़ा समय देने पर कुछ लोग बात करने के लिए राजी हो जाते हैं। भोजराम इन्हीं में से एक थे।

बीमार बेटी की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं- इसे बुखार था। देह तपती, लेकिन हम ईंट बनाते रहते। मिसेस (पत्नी) रोती थी। कई बार हादसा होते-होते बचा। जैसे-तैसे बेटी ठीक हुई, तो गांव में पिताजी को लकवा मार गया।

वापस लौटने की तैयारी करने लगे, तभी ठेकेदार ने बंधक बना लिया। ये कहते हुए वे बगल की चारपाई को देखते हैं, जहां सिलवटों के बीच एक जर्जर शरीर पड़ा है। ये उनके पिता हैं, जो चल-फिर भी नहीं सकते।

घर के ज्यादातर हिस्से में अंधेरा भरा हुआ है। पलंग से दवाओं की महक और कराहने की आवाज आ रही है। इसे अनसुना करते हुए सवाल दागती हूं- मैंने तो सुना कि आप लोग एडवांस लेकर काम से बचने के बहाने करते हैं?

सवाल शक में डूबा हुआ था, लेकिन तिलमिलाने की बजाय आवाज आती है- आप तो खुद देख रही हैं, पिताजी किस हाल में हैं। रही एडवांस की बात, तो हम जानते थे कि पेशगी (एडवांस) लेने के बाद गुलाम बन जाते, तो एक रुपया भी पहले नहीं लिया।

बात हुई थी कि वहां रोज दो हजार ईंटें बनाने के बदले हर हफ्ते पैसे मिलेंगे, लेकिन जून से सितंबर आ गया, हाथ में एक पैसा नहीं आया। मांगने पर पिटाई होने लगी। वो हमारी औरतों को गाली देते और उठा लेने की धमकी देते।

ये बताते हुए भोजराम कई वीडियोज दिखाते हैं, जिसमें उनके साथी मजदूर बुरी तरह से घायल हैं।

हालांकि वीडियो शेयर नहीं किए जा सकते, क्योंकि पिटाई के निशान शरीर के निजी हिस्सों पर हैं। कुछ ‘नॉर्मल’ वीडियो देने की बात कहने पर बताते हैं- कश्मीर से लेबर अफसर आए थे, उन्होंने लाइन में खड़ा करके एक-एक के मोबाइल से सारी वीडियो हटा दी। छिप-छिपाकर यही बचा।

लोग शहर से लौटते हैं, तो वहां के यादगार लम्हे लाते हैं। हम भी पहले कहीं जाते थे, तो बढ़िया-बढ़िया कपड़े लाते। शहरी रंग-ढंग होता। बाल संवरे रहते। इस बार लौटे तो मुंह छिपाकर बैठना पड़ा। शर्म आ रही थी कि बगैर पैसों के लौटे हैं, वो भी पिटकर। रिश्तेदारों से मिलने दूसरे गांव तक नहीं जा सके।

नई उम्र के भोजराम खुले मन से सब बता जाते हैं, अपनी शर्मिंदगी तक।

पास में ही उनकी पत्नी हैं। नकली सिल्क की जरीदार गुलाबी साड़ी पहने सजनी हाथ-हाथभर चूड़ियां पहनी हुई हैं। माहौल को हल्का करने के लिए हंसते हुए पूछती हूं- आपके पास इतनी सुंदर साड़ी है, फिर गरीब कैसे हुईं! तुरंत जवाब आता है- अभी पितर (पितृ पक्ष) चल रहा है। घर में पूजा थी, तो दीदी ने अपनी साड़ी पहना दी।

सजनी बंजारे बताती हैं कि बच्चों को वहां जमीन पर सुलाकर वे काम करती थीं। उनके लिए न तो सुरक्षित कमरा था, न ही अच्छा माहौल।
सजनी बंजारे बताती हैं कि बच्चों को वहां जमीन पर सुलाकर वे काम करती थीं। उनके लिए न तो सुरक्षित कमरा था, न ही अच्छा माहौल।

बीसेक साल की इस मां के चेहरे पर खोया हुआ भाव है। वे कश्मीर से बचकर तो आ गईं, लेकिन बेटी की बीमारी और बीते वक्त का डर अब भी उनके चेहरे पर है।

दीवार पर बनी अलमारी में दवाइयों की शीशियां रखी हैं। वही एक बंद घड़ी लटकी हुई है, जो शादी के समय खरीदी गई थी। साथ में दो चारपाइयां। यही इस परिवार की पूंजी है। नजर घुमाते हुए मैं पूछ लेती हूं- अब क्या करेंगे?

किसी दूसरे राज्य चले जाएंगे, क्योंकि कमाएंगे नहीं, तो खाएंगे क्या! सजनी पूछते हुए-सी कहती हैं।

इसी गांव के अनुज भारद्वाज भी परिवार-समेत कश्मीर गए थे। वे बताते हैं- दूर गांव के लोग (मजदूर इन्हें जमादार कहते हैं) हमें झांसा देकर ले जाते और वहां पहुंचने के बाद लोकल ठेकेदार के पास छोड़ देते हैं। फिर वो हमें मारे-पीटे, या खाना न दे, कोई सुनवाई नहीं। चाहे कितनी ही बड़ी जरूरत पड़ जाए, पैसे मांगने पर 10 रुपए ही मिलते हैं।

10 रुपए क्यों?

ज्यादा देंगे, तो टिकट लेकर हम वापस भाग जाएंगे!

अनुज चार महीने की गर्भवती पत्नी को लेकर बडगाम गए थे, क्योंकि ईंट बनाने का काम एक आदमी से नहीं होता। वे कहते हैं- हल्का काम और बच्चों की देखभाल वो करती, बाकी मैं संभालता। सोचा था, लौटेंगे तो हाथ में पैसे होंगे। फिर आराम से डिलीवरी हो सकेगी। लौटे तो, लेकिन पिटकर और खाली हाथ।

चोरभट्टी के इस तालाब और शिव-प्रतीक की गांव वालों में काफी मान्यता है। दूसरे राज्य जाते हुए सभी यहां सिर झुकाकर सही-सलामत लौटने की प्रार्थना करते हैं।
चोरभट्टी के इस तालाब और शिव-प्रतीक की गांव वालों में काफी मान्यता है। दूसरे राज्य जाते हुए सभी यहां सिर झुकाकर सही-सलामत लौटने की प्रार्थना करते हैं।

लोकल पुलिस के पास क्यों नहीं गए?

पुलिस क्या, हम तो फौज (आर्मी) के पास भी गए थे। उन्होंने कहा कि सरपंच कहे तो हम आपकी बात मान लेंगे। सरपंच ने ठेकेदार के पक्ष में कहा और फौजी लौट गए।

क्या आप लोगों को किसी बिल्डिंग में कैद करके रखा गया था?

बिल्डिंग नहीं, ईंट भट्टी में। हम उस एरिया से कहीं बाहर नहीं निकल सकते थे। चार लोग मिलकर बात नहीं कर सकते थे। मुंह पर कपड़ा बांधे लोग लगातार पहरा देते। किसी पर शक हो, तो पहले पिटाई होती, फिर वो गायब हो जाता।

बकौल अनुज, लौटने से एक दिन पहले ही बलौदा बाजार की एक लड़की गायब हो गई। उसका परिवार अब भी अपनी गुमशुदा बेटी को घाटी में तलाश रहा है। रिपोर्ट अब तक दर्ज नहीं हो सकी। चारों तरफ CCTV लगा था। ठेकेदार से जब उसके घरवालों ने चेक करने को कहा, तो उन्होंने इनकार कर दिया।

बता दें कि गुलमर्ग में बर्फ में खिलखिलाते और फूलदार कपड़े पहन डल झील की सैर करते सैलानियों से अलग एक कश्मीर ये भी है। ईंट-भट्टियों और नाइंसाफियों का कश्मीर। कश्मीर ब्रिक क्लिन्ज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के मुताबिक राज्य में तकरीबन 350 भट्टियां हैं, जिनमें से 200 के करीब बडगाम जिले में हैं।

तस्वीर 19 सितंबर की है। कश्मीर से मजदूर अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ लौटे हैं।
तस्वीर 19 सितंबर की है। कश्मीर से मजदूर अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ लौटे हैं।

यहां आए-दिन मजदूरों पर आतंकी हमले होते हैं। इसी साल जून में दो लोग मारे गए, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। गरीब राज्यों के अनाम गांवों में बसते ये चेहरे घाटी में कीड़े-मकोड़ों से भी कम हैसियत रखते हैं।

दक्षिण की फिल्मों के अभिनेता जैसी शक्ल-सूरत वाले अनुज का दर्द हालांकि कश्मीर तक सीमित नहीं। वे अपने 8 साल के बेटे का स्कूल में एडमिशन तो करा चुके, लेकिन स्कूल भेज नहीं सके। कहते हैं- कमाए बर जाबो तो ओला काखर भरोसा छोड़बो!

बेटा वहीं खड़ा है। माइक की तरफ गौर से देखता हुआ। छत्तीसगढ़ी में बोलते पिता को बीच-बीच में टोककर वो हिंदी भी करता है। देश के बाकी स्कूलों में अभी इम्तेहान चल रहे हैं, लेकिन इस बच्चे के लिए स्कूल तक पहुंचना ही सबसे बड़ा इम्तेहान है।

बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए मैं जांजगीर के श्रम विभाग पहुंची, जहां लेबर ऑफिसर घनश्याम पाणिग्रही से मुलाकात हुई। वे बताते हैं कि साल 2001 से लेकर 2022 तक कुल 977 लोग फोर्स्ड लेबर का शिकार हुए। यानी उन्हें जबरन पकड़कर काम करवाया गया।

उनके ही आंकड़े पर जब मैं बंधक शब्द इस्तेमाल करती हूं, तो बात एकदम से बदल जाती है। काली चाय का घूंट भरने के बाद आवाज आती है- ज्यादातर केस तो फर्जी रहते हैं। मजदूर एडवांस लेकर जाते हैं और फिर भागने के लिए ‘ये सब’ करते हैं। काफी कोशिश के बाद भी ज्यादा जानकारी नहीं निकलती।

वहीं फोन पर निर्मल गोराना से बात होती है, जो नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर के कन्वेयर हैं। वे सवाल करते हैं- उनसे पूछिए कि अगर मजदूर बंधुआ नहीं थे, तो उन्हें छुड़ाकर, ट्रेन की टिकट कटवाकर क्यों भेजा गया! दुनिया में करोड़ों मजदूर हैं। क्या वे सबको छुड़ाकर घर भेजते हैं!

मजदूरों की गरीबी जितने ही ठोस इस सवाल के बीच हम जांजगीर स्टेशन पहुंचे, जहां बाकी बचे बंधक भी आने वाले थे। स्टेशन सूना था। पता चला कि कुछ पैसे देकर वे बड़े स्टेशन (बिलासपुर) पर ही छोड़ दिए गए कि वहां से जहां चाहें, चले जाएं।

अब इस पोल से होकर भी गुजर जाइए

(इंटरव्यू कोऑर्डिनेशन- दुर्गेश यादव, जांजगीर)

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