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तिरंगा बनाने वाले की कहानी उन्हीं के गांव से:गांधीजी ने तिरंगे का फाइनल डिजाइन मांगा, पिंगली वेंकैया ने 3 घंटे में दे दिया

6 महीने पहलेलेखक: आशीष राय

आज देश में आजादी की 75वीं सालगिरह का जश्न है। हर तरफ तिरंगा फहराता दिख रहा है। इस स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे की ही सबसे ज्यादा चर्चा है। इस मौके पर तिरंगा बनाने वाले के गांव चलते हैं। ये गांव आंध्र प्रदेश का भाटलापेनुमरु है और तिरंगा बनाने वाले शख्स का नाम पिंगली वेंकैया। पिंगली ने सिर्फ तीन घंटे में तिरंगे का डिजाइन तैयार किया था।

हरियाली से घिरा भाटलापेनुमरु गांव ऐतिहासिक होने के बावजूद दूसरे सामान्य गांवों की तरह है। यहां ज्यादातर गलियां कच्ची हैं। गांव में हमें संगशेट्टी संबाशिव राव मिले। उन्होंने बताया कि पिंगली जिस गली में रहते थे, अब वह उन्हीं के नाम से जानी जाती है।

लोगों की शिकायत है कि पिंगली का गांव होने के बावजूद सरकार ने यहां ज्यादा ध्यान नहीं दिया। हालांकि, वे उनकी विरासत बचाने में जुटे हैं। लोगों ने खुद से गांव के चौक में तिरंगे के साथ वेंकैया की मूर्ति लगवाई है। हर साल उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। गांव वालों ने अपने पैसों से पिंगली वेंकैया स्मारक भवन भी बनवाया है।

जापानी इतनी अच्छी बोलते थे कि लोग जापानी वेंकैया कहने लगे
पिंगली वेंकैया के घर हमारी मुलाकात उनके पोते पिंगली दशरधरम की पत्नी सुशीला से हुई। हमने सुशीला से पिंगली वेंकैया के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने कोलंबो से राजनीति और अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल ली। बाद में डीएवी लाहौर में पढ़ने चले गए। उन्होंने संस्कृत, उर्दू और जापानी सीखी। जापानी भाषा तो वे इतनी अच्छी बोलते थे कि लोग उन्हें ‘जापानी वेंकैया’ बुलाते थे। पिंगली जियोलॉजिस्ट भी थे।

महात्मा गांधी से प्रभावित होकर ब्रिटिश फौज छोड़ी

महात्मा गांधी के साथ पिंगली वेंकैया (बाईं तरफ सबसे आखिर में)
महात्मा गांधी के साथ पिंगली वेंकैया (बाईं तरफ सबसे आखिर में)

सुशीला के मुताबिक, पिंगली ने 19 साल की उम्र में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में बतौर सिपाही दक्षिण अफ्रीका में काम किया था। यहीं वे गांधीजी के विचारों से प्रभावित हुए और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। यहीं उन्हें देश के लिए ध्वज बनाने का आइडिया आया। साउथ बोअर युद्ध के दौरान पिंगली ने देखा कि झंडे की शपथ लेकर सैनिक हर कुर्बानी के लिए तैयार हो जाता है। उनके मन में आया कि वे ऐसा झंडा बनाएंगे, जो पूरे देश में मान्य होगा।

30 देशों के झंडे की स्टडी, 25 सैंपल तैयार किए
वेंकैया ने 1906 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की सभा में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज डिजाइन करने की मंशा जताई। इसका जिम्मा उन्हें मिल भी गया। पिंगली ने 1916 से 1921 तक 30 देशों के राष्ट्रीय ध्वज की स्टडी की और 25 से ज्यादा सैंपल तैयार किए।

आखिर में गांधीजी ने बेजवाड़ा में कांग्रेस की सभा में वेंकैया को फाइनल डिजाइन दिखाने के लिए कहा। उन्होंने 3 घंटे में खादी पर डिजाइन तैयार कर दे दिया।

बापू के कहने पर झंडे में सफेद रंग शामिल किया

वेंकैया पिंगली का बनाया झंडा 1931 तक कांग्रेस के अधिवेशनों में नजर आता रहा।
वेंकैया पिंगली का बनाया झंडा 1931 तक कांग्रेस के अधिवेशनों में नजर आता रहा।

सुशीला ने बताया कि फाइनल डिजाइन में लाल और हरे रंग की पट्टी थी। इसके बीचों-बीच चरखा था। झंडे के दोनों रंग भारत की बहुसंख्यक आबादी यानी हिंदू और मुसलमान के प्रतीक थे। महात्मा गांधी के सुझाव पर ध्वज में शांति के प्रतीक सफेद रंग को शामिल किया गया। 1919 से 1921 तक वेंकैया लगातार कांग्रेस के अधिवेशनों में भारत के राष्ट्रीय ध्वज का विचार रखते रहे। 1931 तक उनके बनाए झंडे को कांग्रेस की सभी बैठकों में लगाया जाता रहा।

पिंगली वेंकैया के पोते पिंगली दशरधरम की पत्नी सुशीला।
पिंगली वेंकैया के पोते पिंगली दशरधरम की पत्नी सुशीला।

आजादी के 20 दिन पहले पिंगली का झंडा कांग्रेस की पहचान बना
सुशीला के मुताबिक झंडे के वर्तमान स्वरूप में आगे चलकर चरखे को हटाकर अशोक चक्र जोड़ा गया। आजादी मिलने के 23 दिन पहले 22 जुलाई, 1947 को यह कांग्रेस की आधिकारिक पहचान बन गया। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ तो तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज बनाया गया।

उन्होंने बताया कि पिंगली वेंकैया का राष्ट्र ध्वज बनाने का मकसद देश के सभी लोगों को जोड़ने का था। 1916 में अपनी किताब 'भारत देशनिकी ओका जातीय पटाकम' (भारत का राष्ट्रीय ध्वज) के अलावा वेंकैया ने कभी तिरंगे के निर्माण का श्रेय नहीं लिया।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथ में दिख रहा तिरंगा आजादी के कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय ध्वज माना गया।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथ में दिख रहा तिरंगा आजादी के कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय ध्वज माना गया।

गरीबी में बीता जीवन, इलाज न मिलने से बेटे की जान चली गई
जीवन के आखिरी पड़ाव में पिंगली के घर में इतनी गरीबी थी कि उनके छोटे बेटे चलपति राव की बिना इलाज के मौत हो गई थी। पिंगली का निधन भी एक झोपड़ी में हुआ। पिंगली वेंकैया ने 4 जुलाई 1963 को चित्तनगर में अंतिम सांस ली थी। उनके निधन के बाद उनकी झोपड़ी में या उनके पास एक रुपया भी नहीं मिला। यह झोपड़ी ब्रिटिश सेना में उनकी सेवा के लिए दी गई जमीन पर बनी थी।

गांव वालों के मुताबिक, देश आजाद होने के कई साल बाद भी पिंगली और उनका परिवार गुमनामी में जीता रहा। उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनका शरीर तिरंगे में लपेटकर लाया जाए और अंतिम संस्कार पूरा होने तक झंडा एक पेड़ से बंधा रहे।

मंदिर में भीख मांगते मिली थीं पिंगली की भतीजी
2015 में पिंगली के भतीजी घंटाशाला जयलक्ष्मी अपने बेटे भार्गव राव के साथ एलुरु के एक मंदिर में भीख मांगते मिली थीं। तब के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने पश्चिम गोदावरी जिला कलेक्टर को परिवार की मदद करने के लिए कहा था।

निधन के 46 साल बाद पिंगली की याद में डाक टिकट
वेंकैया के निधन के 46 साल बाद 2009 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया था। पिछले साल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने भारत रत्न के लिए उनके नाम का प्रस्ताव दिया था। इस पर सरकार ने फैसला नहीं लिया है। संसद में उनकी प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव भी आगे नहीं बढ़ पाया।

राष्ट्रीय ध्वज बनने की पूरी कहानी यहां पढ़िए: