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ब्लैकबोर्डदूसरा बच्चा ठहरा तो जबरन गिरा देते हैं गर्भ:पति लड़ता है और बीवी गोद में बच्चा लिए जंगल-जंगल घूमती रहती है

4 महीने पहलेलेखक: रांची से मृदुलिका झा

घर-घर घूमकर भात जमा किया। किसी ने भाजी दे दी, तो किसी ने प्याज। दो दिन के भूखे थे। झपट्टा मारकर खाना शुरू ही किया था कि पुलिस आ गई। मुंह का निवाला छोड़कर भागना पड़ा। बाद के कई दिन जंगली पत्ते और महुआ खाकर बीते।

भूख से अंतड़ी कुलबुलाती, लेकिन खाना नसीब नहीं था। प्यास लगे तो कीड़ों से बिलबिलाते हुए नाले का पानी पीते। कोई मलेरिया से मरता, कोई पुलिस की गोली से, लेकिन ज्यादातर साथी वो थे, जो अपनेपन की कमी से मर रहे थे।

नए जोड़ों को साथ रहने की मनाही थी। यहां तक कि दूसरी औलाद पैदा करने की मनाही। फिर चाहे अबॉर्शन की गोली खाओ, या नसबंदी कराओ।

संथाली मिली हिंदी में बात करते रामपोदो लोहरा झारखंड से हैं। उस सूबे से, जहां कुल जमीन के लगभग 30% हिस्से में घना जंगल पसरा हुआ है। सूरज की रोशनी को ढांप देने वाले इन्हीं जंगलों में रामपोदो ने 10 से भी ज्यादा साल बिताए। वे एक हथियारबंद नक्सली दस्ते के लीडर हुआ करते और झारखंड से लेकर उड़ीसा, छत्तीसगढ़ के जंगलों में मारे फिरते।

हाथों में बंदूक और कंधे पर आठ-नौ किलो वजन संभाले रामपोदो अपने साथियों के साथ पुलिस की टोह लेते। उन्हें निशाना बनाते। फिर मन बदलने लगा और साल 2013 में उन्होंने औपचारिक रूप से समर्पण कर दिया। वैसे इसकी शुरुआत साल 2009 में ही हो चुकी थी, जब वे पुलिस के लिए मुखबिरी करने लगे।

अब रांची की पुलिस लाइन में बैठकर जवानों की वर्दियां सीते हुए रामपोदो कहते हैं- चोर चाहे लाख सुधर जाए, लेकिन माथे का कलंक नहीं धुलता। हमारे माथे पर भी उग्रवादी का धब्बा लग चुका है। रगड़कर माथा छिल जाए, लेकिन धब्बा नहीं जाएगा।

नक्सलवाद झारखंड का वो सच है, जिससे लगातार कई सरकारें जूझती रहीं। तख्त बदले, लेकिन जंगल का खतरा खत्म नहीं हो सका। केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, देश के नक्सलवाद प्रभावित 25 जिलों में से 8 झारखंड के हैं।

वैसे राज्य के कुल 16 जिलों में नक्सली एक्टिव हैं। फिर चाहे वो बंदूक लेकर जंगलों में हों, सड़क के नीचे बारूद बिछा रहे हों या फिर खेतिहर किसान का चेहरा लगाए पुलिस या CRPF की घात में हों।

एक वक्त पर इन्हीं का हिस्सा रहे रामपोदो अब रांची शहर के बीचोंबीच दर्जी हैं, लेकिन कोई आम दर्जी नहीं। दिवाली-ईद पर रंगीन-चमकीली पोशाकें सीने का सुख उन्हें नहीं मिला। किसी बच्चे के मासूम सीने का नाप भी इन्होंने कभी नहीं लिया।

ये सिर्फ और सिर्फ सख्त पुलिसिया सीने नापते हैं। काम खत्म होने के बाद पुलिस लाइन में ही बित्ता-बित्ताभर के कमरे में जाकर भरपेट खाते और पूरी नींद सोते हैं। हालांकि पार्टी छोड़ देने के बाद भी खतरा टला नहीं। पहले पुलिस दुश्मन थी। अब नक्सली। वे जानते हैं कि ज्यों ही उन पर से पुलिस का साया हटेगा, नक्सली उनकी जान ले लेंगे।

ये पुरानी ट्रेनिंग ही है, जो खतरे के बावजूद वे बेखौफ बोलते हैं। पहले फोन पर, फिर आमने-सामने। जब हमने उनकी तस्वीर और पता छिपाने की बात पूछी तो सीधे कहा- पुलिस के बीच रहने से बड़ी सुरक्षा क्या होगी! कभी 'इमरजेंसी' में कहीं जाना भी हुआ तो पुलिस के जवान साथ रहते हैं। और अगर फिर भी मौत लिखी होगी तो मरेंगे ही।

फॉर्मल शर्ट के साथ काले फ्रेम का चश्मा लगाए ये शख्स कहीं बाहर मिलता, तो किसी दफ्तर का स्टाफ लगता। तने हुए कंधे में सालों की सख्ती की झलक। लंबे-लंबे डग भरते पांव, तेजी इतनी कि आपको साथ दौड़ना पड़े।

रांची के पुलिस लाइन के पास स्थित रामपोदो का कच्चा-पक्का घर। यहां वे अपने परिवार के साथ रहते हैं।
रांची के पुलिस लाइन के पास स्थित रामपोदो का कच्चा-पक्का घर। यहां वे अपने परिवार के साथ रहते हैं।

उम्र पूछने पर कहते हैं- 65 के आसपास। बाल हालांकि एकदम काले और दांत अपनी जगह पर जमे हुए हैं।

15 अगस्त करीब है, तो रामपोदो के पास खाली बैठकर बात करने की छूट नहीं। वर्दियां सिलते हुए ही वे गांव घर को याद करते हैं, जो रांची से लगभग घंटेभर की दूरी पर है। तमाड़ थाने में आने वाला उनका गांव गूगल सर्च पर नहीं दिखता। NH-43 से होते हुए जब रास्ता पगडंडी और फिर जंगलों में बदल जाता है, वहीं से शुरू होता है रामपोदो का गांव।

वे कहते हैं- छोटी-सी जमीन थी हमारी, वो भी जमींदारों ने छीन ली। बाल-बुतरू भूख से रोते, घरवाली दुख में जागती। तब नक्सली गांव आया करते थे। हाथों में बंदूक। आते तो सब के सब सहम जाते। तभी हमने फैसला कर लिया कि हम भी बंदूक उठाएंगे। लड़ेंगे। अपनी जमीन वापस लेंगे।

तो जमीन वापस मिली? मेरे छोटे-से सवाल का जवाब लंबी चुप्पी देती है। दोहराने पर बताते हैं- मिली, लेकिन किसी काम की नहीं। अब हम गांव जा नहीं सकते। कभी किसी मातम-मौके पर जाते भी हैं तो घंटे-दो घंटे में लौटना होता है। साथ में हथियारबंद पुलिस रहती है। अकेले गांव जाएंगे, तो मार दिए जाएंगे।

तब हथियार ही क्यों छोड़ा?

क्योंकि हथियार सिर्फ जान लेता है, मैडम, कभी जीवन नहीं देता।

आवाज में गहरी टीस के साथ रामपोदो याद करते हैं, पार्टी से जुड़ा तो सब बदल गया। पीठ पर कपड़े-लत्ते, खाना, सांप काटने की दवा और हथियारों से भरा बैग होता। रातभर चलते और दिनभर यहां से वहां भागते। कई बार पड़ाव डालते भी थे, तो सोना नसीब नहीं था। दो-दो घंटे जागने की ड्यूटी रहती, ताकि पुलिस की आहट लग सके। कुत्तों की नींद सोते, कुत्तों की ही तरह जीते थे!

सबसे खराब हाल नए जोड़ों का था। कमांडर शादी तो करवा देता, लेकिन साथ रहना ‘अलाऊ’ नहीं था। साथ रहेंगे तो प्यार बढ़ेगा, फिर पार्टी का काम ढीला होता जाएगा। तो शादी के बाद भी पति-पत्नी को अलग-अलग ग्रुप में रहना होता। आबादी बढ़ाने के लिए एक बच्चा जरूरी था, लेकिन उसके बाद नहीं। गलती से भी अगर पेट ठहर जाए, तो बच्चा गिराने के लिए गोली खानी पड़ेगी। या फिर नसबंदी करा दी जाएगी।

औरतें अपने छुटकुन बच्चे को साथ लिए जंगल फिरतीं। मां-बाप को पुलिस से लड़ता-भिड़ता देखते बच्चा बड़ा हो जाता और वो भी उग्रवादी बन जाता। कईयों ने अपनी आंखों के सामने माई-बाप को मरते देखा। पार्टी में जन्मे ये बच्चे लोरी नहीं, बंदूक की गोलियां और बारूद की महक के साथ बड़े होते।

वर्दी की कांटछांट करते हुए रामपोदो एकाएक रुक जाते हैं, जैसे उन्हें कोई बच्चा याद आ गया हो। मशीन चलाते हुए दोबारा कह पड़ते हैं- सालों चलते-चलते थक गया था। जो लोग पहले काका-ताऊ कहते, गांव जाने पर उनकी आंखों में दहशत दिखने लगी। वे डरते थे कि मुझसे बात करेंगे, तो पुलिस शक करेगी। आखिरकार मैंने पार्टी छोड़ दी।

अब सब ठीक है! मेरी बात का छोटा-सा जवाब आता है- कलंक तो लग ही चुका। इतने साल ‘सलेंडर’ किए बीते, लेकिन अब भी दबी जबान में लोग उग्रवादी कहते हैं!

रामपोदो के घर से निकलते हुए दरवाजे पर धान की बालियों से बना झूमर दिखता है। ये आदिवासी परंपरा है, जो नई फसल का उत्सव मनाती है। झूमर इसलिए भी है कि उड़ते हुए थक जाने पर थमकर चिरई-चुनमुन (पक्षी) इसे खा सकें।

वहां से आगे निकलकर दिनेश से मिलती हूं। ये भी पूर्व नक्सली हैं और अब शहर के बीचोंबीच परिवार समेत रहते हैं। गांव जाना इनका भी बंद है, क्योंकि कई बार धमकियां मिल चुकी हैं। किसी आम आदमी की तरह ही घर पहुंचते ही फैमिली की चर्चा करते हैं। इनकी पत्नी बीमार हैं और बच्चे अंग्रेजी स्कूल गए हुए हैं।

दिनेश याद करते हैं- जवानी का जोश था। दूर से देखने पर लगता कि पार्टी में जाना बढ़िया रहेगा। AK-47 लेकर घूमेंगे और सब लोग डरेंगे। उम्र 14 साल रही होगी, जब पढ़ाई छोड़कर नक्सली बन गया। ये साल 2000 की बात है। शुरू-शुरू में लगता, जैसे बिना पढ़े ही नौकरी मिल गई हो, लेकिन जोश ज्यादा दिन टिका नहीं।

पुलिस की दबिश पड़ती, तो ऐसे भागते कि कोई नाले में बहता, किसी का पैर टूट जाता। भागो वरना मार दिए जाओगे- हमें बस इतना पता था।

जंगल में जितने पेड़ नहीं थे, उससे ज्यादा खतरे थे। कहीं सांप फिरता, कहीं बिच्छू, और ये भी न हो तो जंगली हाथी घात लगाए होते। जैसे ही आपसे रास्ते टकराएंगे, वो आपको खत्म कर देंगे।

दिनेश से बातचीत जैसे किसी एडवेंचरस किताब को पढ़ना है। किस्से ही किस्से। एक रात पड़ाव डालकर हम सो रहे थे कि तभी सर्रर्र की आवाज से नींद खुली। बगल में कटहल के पेड़ थे। मैंने थोड़ी-सी आंख खोली तो देखा कि एक हाथी कटहल तोड़-तोड़कर खा रहा है। फटाक से आंखें बंद कर लीं और मुर्दा होने का नाटक करने लगा। हाथी को अगर भनक भी लगती कि हम जिंदा लोग पड़े हुए हैं, तो वो शायद हमला कर देता।

उस रात जान तो बच गई, लेकिन दिल में कसक बैठ गई। ये भी कोई जिंदगी है! नरक है नरक! कितनी ही बार जोंकों से भरा पानी चादर से छानकर पीना पड़ा। महीने में एकाध दिन ही भरपेट खाना मिलता, वरना ज्यादातर तो खाता हुआ कौर निगलकर भागना होता था। सूखा भात मिले, चाहे खस्सी-भात- हमारे पास चैन से बैठकर खाने का सुख नहीं था।

सरेंडर करने के बाद की जिंदगी! वो कैसी है?

अब हम इंसान हो गए हैं। शहर में रहते हैं। बीमारी में दवा-दारू करवा पाते हैं। मैं पढ़ नहीं सका, लेकिन बच्चे बढ़िया स्कूल जाते हैं। बस, जान का खतरा बना रहता है।

पास में ही पत्नी खड़ी थी। मैं इशारा करते हुए पूछती हूं- आपको डर नहीं लगता?

लगेगा क्यों नहीं! जानती होती तो शादी भी क्यों करती। हंसते हुए उधर से जवाब आता है।

इंटरव्यू देने या फोटो खींचने की बात पर वो मना कर देती है। घर का भी कोई वीडियो नहीं बना सकती, क्योंकि रहन-बसन जाहिर होने का खतरा है।

मलाल से भरकर दिनेश कहते हैं- लोग बाल-बुतरू को अपनी जवानी के किस्से सुनाते हैं। मैं डरता हूं कि मेरी कहानी सुनकर वे भी भटक न जाएं। जैसे एक वक्त पर मैं बहका था। डरता हूं कि कहीं वो हमारा पता न जान जाएं। बंदूक छूट गई, लेकिन डर रह गया।

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