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बात बराबरी की:औरतें सीने को उभारदार और होंठों को स्ट्राबेरी सा बनवाने के लिए दर्द झेलती हैं ताकि मर्दों का प्रेम बना रहे

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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नब्बे की शुरुआत थी, जब राजकुमारी डायना ने पहली बार अपनी बीमारी पर बात की। पारदर्शी नीली आंखों वाली डायना ने माना- मुझे भूख लगती, लेकिन मैं कमर या बांहों पर इंचभर चर्बी से भी डरती थी। फूले गालों से मुझे वही डर लगता था, जो किसी को कैंसर से लगे। मैं डरती थी कि चार्ल्स मुझे छोड़ न दें।

डर ने मुझे बीमार बना दिया। बकिंघम पैलेस की शाही टेबल पर बैठकर मैं खाना तो खाती, लेकिन बाथरूम में जाकर मुंह में ऊंगली डाल उसे उगलने के लिए। मैं गायब होना चाहती थी- उस दवा की तरह जो पानी में डालते ही घुल जाती है।

दुनिया की सबसे हसीन राजकुमारियों में एक डायना बुलीमिया नर्वोसा नाम की बीमारी का शिकार थीं। वो मोटापे से खौफ खाती थीं, ऐसे जैसे कोई बच्चा अपना सबसे सुंदर खिलौना छिनने पर डरे। दुबला-पतला और कांच जैसा पारदर्शी शरीर ही औरतों के पास अकेली पूंजी है, मर्दानी दुनिया में जीने का अकेला हथियार। इस पूंजी को संभालने में डायना ने खुद को ही बीमार बना डाला।

साल 1993 में डबडबाई आंखों के साथ उन्होंने स्वीकारा कि उनकी हालत उस भेड़ जैसी थी, जो गिरफ्त में है, और बस काटे जाने का इंतजार कर रही है।

वक्त की सुई 30 साल आगे सरकी, लेकिन मोटापे को लेकर औरतों का खौफ वहीं ठिठका रहा। कुछ दिनों पहले कन्नड़ एक्ट्रेस चेतना राज की मौत हो गई। उनकी जान बुढ़ापे या किसी कार क्रैश से नहीं, बल्कि चर्बीदार-डर से चली गई। महज 21 साल और 56 किलो की चेतना ने ‘फैट-फ्री’ प्लास्टिक सर्जरी कराई थी, जिसके बाद उनके फेफड़ों में पानी भर गया। कॉम्प्लिकेशन बढ़ती गई और कुछ ही घंटों के भीतर कानों तक चौड़ी मुस्कान वाली ये अभिनेत्री खत्म हो गई।

अदृश्य मोटापे को लेकर औरतों का ये डर नया नहीं। 17वीं सदी की शुरुआत में यूरोपियन देशों की स्त्रियां कॉरसेट पहना करतीं। ये एक खास तरह की पोशाक होती, जो कमर को 18 इंच बनाए रखते हुए ऊपर और नीचे के हिस्सों को बेहद उभारदार बना देती। औरत लुभावनी लग सके, इसके लिए छुटपन से ही लड़कियों को कॉरसेट में ठूंस दिया जाता।

जैसे पेड़ों के शौकीन लोग बरगद को बोनसाई बनाकर बेडरूम में सजाते हैं, उसी तर्ज पर औरतों के शरीर की भी बोनसाई होने लगी। उन्हें कांटा-छांटा और तराशा जाने लगा। यहां तक कि प्रेग्नेंसी की छूट पा औरत का शरीर उजड्डों की तरह न फैल जाए, इसके लिए भी ऐसी ड्रेस बनने लगी, जो पेट के अलावा देह के बाकी सारे हिस्सों पर लगाम रख सके।

शरीर को मोहक बनाए रखने के इस जतन में औरतों की जान जाने लगी। साइंस जर्नल लैंसेट ने 1860 से लेकर 1890 तक लगातार हर साल कॉरसेट पर स्टडी की। इसमें खुलासा हुआ कि सिर्फ एक कपड़ा ही औरतों का उतना नुकसान कर रहा है, जितना कोई जानलेवा बीमारी भी न कर सके। खाना नहीं पचने और सांस लेने में परेशानी जैसी ‘मामूली’ परेशानियों से लेकर अंदरुनी ब्लीडिंग जैसी कुल 97 बीमारियां इसकी देन थीं।

उभरे पेट वाले लोग तस्वीरें खिंचाते हुए कई बार सांस रोककर पेट भीतर खींचने का करतब करते हैं। विक्टोरियन काल की इन औरतों पर चौबीसों घंटे पेट खींचकर रहने का दबाव था। सिर्फ इसलिए कि वे औरतें थीं। उन्हें बाजुओं की ताकत कमाने की छूट नहीं थी। किताबी हुनर भी उनके हिस्से नहीं था। जहाज में बैठकर दुनिया की खोज करतीं तो मारी जातीं। ले-देकर एक शरीर बाकी रहा, तो वही उनका हथियार, हुनर, दौलत सब कुछ बन गया।

तब वजन घटाने के लिए कोई सर्जरी नहीं थी। चिरैया की तरह टूंगना और दमघोंटू कपड़े पहनना ही उपाय था। कॉरसेट के अलावा कई तरह के लोहेदार ढांचे तैयार हुए, बेतरतीब शरीर वाली स्त्री को जिसमें भरने के बाद एक कमनीय कामिनी बाहर निकलती। दरियादिल मर्दों ने सालोंसाल अपनी सारी क्रिएटिविटी औरतों के कपड़े बनाने पर झोंक दी।

साल 1850 में एक खास स्कर्ट आई, जिसे क्रिनोलाइन कहते। ये कमर से तो चुस्त और नीचे की तरफ गुब्बारे की तरह फूली हुई होती। स्कर्ट के नीचे लोहे का ढांचा लगा होता, जो इसे पैरों से चिपकने से रोकता।

ऊपर रेशम और नीचे लोहे के पिंजरे में बंद स्त्रियां इसे पहनने के बाद न बस में चढ़ सकती थीं, न घोड़ागाड़ी में। हल्के-हल्के पांव उठाकर वे सिर्फ थोड़ा-बहुत चल सकती थीं। घूमरदार घेर की वजह से कई बार हादसे भी हो जाते। हालांकि, खूबसूरत दिखने की ये कीमत, मर्दों की नजर से उतरने से कहीं कम थी।

वक्त के साथ पुरुष ज्यादा उदार हुए। अब वे अपनी औरतों से कम खाने या दमघोंटू कपड़े पहनने की मांग नहीं करते, बल्कि अपनी किन्नी ऊंगली सर्जरी की तरफ उठा देते हैं।

इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी के डेटा के मुताबिक साल 2019 में दुनियाभर में जितनी भी प्लास्टिक सर्जरी हुई, उनमें 86.5 प्रतिशत ऑपरेशन महिलाओं ने करवाए। वे चर्बी छंटवा रही हैं, ब्रेस्ट को ज्यादा उभारदार बना रही हैं, तराशी हुई नाक चाहती हैं और होंठों को स्ट्राबेरी से भी ज्यादा रसीला बनवा रही हैं।

वैसे अब उन्हें हर काम की छूट है। वे घूमना चाहेंगी तो कोई रास्ता नहीं रोकेगा, बस, आवारा मानते हुए रेप कर डालेगा। ज्यादा पढ़ेंगी तो बासी मोती कहलाएंगी। आर्टिस्ट बनना चाहें तो समझौते मुंह ताकेंगे।

सिर्फ घर संभालना चाहें तो कूढ़मगज कहलाएंगी। छुटकारा इसके बाद भी नहीं। मौत के बाद ऐसी औरतें सीधे नरक जाती हैं, जो अपनी बदसूरती से अर्मठ-कर्मठ पुरुषों का दिल उचाट दें।

आजकल औरतों को साधने का ज्यादा मॉर्डन, ज्यादा महीन तरीका निकल चुका है। अमेरिकी जर्नल 'रिसर्च इन सोशल स्ट्रेटिफिकेशन एंड मोबिलिटी' में छपी स्टडी के मुताबिक कंपनियां उन महिलाओं को बेहतर तनख्वाह और पोस्ट देती हैं, जिनके होठों पर गाढ़ी लिपस्टिक हो और महंगे कपड़ों से विदेशी इत्र महमहाता हो।

ये साजिश है कि स्त्री सारी उम्र नोंक-पलक संवारते ही बिता दे। यही हो रहा है। 21 साल की एक्ट्रेस अदृश्य मोटापे से लड़ते हुए मर जाती है। करोड़ों औरतें हर साल चर्बी छंटवाते हुए भयंकर दर्द झेलती हैं। क्या ही अच्छा होता, अगर देह की बजाए वे अपने दिमागों पर जमी धुंध छंटवा सकतीं। कोई ऐसी सर्जरी होती, जिसमें ऑपरेशन थिएटर से निकली औरत बाकी सब कुछ होती- सिवाय शरीर के।