हिजाब पर हार नहीं स्वीकार:सुप्रीम कोर्ट में कल दाखिल होगी याचिका, हिजाब की वकालत कर रहे वकील देवदत्त कामत की टीम ने कहा- अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने के खिलाफ आए कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से निराश मुस्लिम पक्षकारों ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला किया है। हाईकोर्ट में हिजाब के पैरोकारों की तरफ से दलील रखने वाले सीनियर लॉयर देवदत्त कामत की टीम ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में केस फाइल करने की तैयारी पूरी कर ली है।

गौरतलब है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को हिजाब के पक्ष में फैसला नहीं दिया। कोर्ट में फैसले का आधार दो बातें बनी, पहली- यह इस्लाम का हिस्सा नहीं है और दूसरी- स्टूडेंट स्कूल या कॉलेज की तयशुदा यूनिफॉर्म पहनने से इनकार नहीं कर सकते। एडवोकेट कामत की टीम के सदस्य एडवोकेट साहुल ने बताया कि हम इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं।

वहीं वकील देवदत्त कामत ने कोर्ट के फैसले पर किसी भी तरह की टिप्पणी से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना ही कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करना हमारा अधिकार है।’

पेशागत बाध्यता का हवाला देकर उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। लेकिन साफ है हिजाब की वकालत करने वाली लड़कियों के लिए अभी उम्मीद बाकी है।

आइए बताते हैं कि हिजाब के पक्ष में मुस्लिम लड़कियों के वकील देवदत्त कामत की अब तक सबसे ठोस दलीलें क्या रहीं…

एडवोकेट देवदत्त कामत ने शिक्षा के अधिकार का हवाला दिया और धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षा प्रदान करने का एक जरिया भी बताया।

शिक्षा और हिजाब में एक चुनने का निर्देश देने जैसा

एडवोकेट कामत ने हिजाब प्रतिबंध और शिक्षा के मौलिक अधिकार को जोड़कर दलील दी थी।

24 फरवरी को हुई सुनवाई में उन्होंने यह तर्क दिया था कि हिजाब मामले को तूल देकर लड़कियों के लिए सर्वोपरि शिक्षा के अधिकार को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है। जबकि राज्य को शिक्षा को बढ़ावा देने का माहौल बनाना चाहिए।

धार्मिक प्रतीक सुरक्षा प्रदान करते हैं

याचिकाकर्ता मुस्लिम छात्राओं की ओर से ह‍िजाब के पक्ष में दलील देते हुए कामत ने 15 फरवरी को कोर्ट में अपना उदाहरण दिया था। उन्होंने कहा था कि जब मैं स्कूल और कॉलेज में था, तो रुद्राक्ष पहनता था। यह मेरी धार्मिक पहचान नहीं बल्कि विश्वास का अभ्यास था। इससे मुझे सुरक्षा महसूस होती थी। कई जज और वरिष्ठ वकील भी यह सब पहनते हैं।

साउथ अफ्रीका के नोज पिन केस का उदाहरण

देवदत्त कामत ने हाईकोर्ट के सामने दक्षिण अफ्रीका में 2004 में एक हिंदू लड़की सुनाली पिल्लई बनाम डरबन गर्ल्स हाई स्कूल केस का हवाला दिया। इस केस में सुनाली पिल्लई नाम की लड़की को स्कूल में नोज पिन पहनने से रोका गया था। स्कूल का तर्क था कि यह स्कूल के कोड ऑफ कंडक्ट के खिलाफ है। लेकिन अदालत ने लड़की पक्ष में फैसला सुनाया था।

हम तुर्की नहीं हैं

मुस्लिम छात्राओं के वकील देवदत्त कामत ने कोर्ट के सामने तर्क रखा था कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं, तुर्की नहीं हैं। हमारा संविधान सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का पालन करता है और सभी की आस्थाओं को पहचानना होगा।

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