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बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद मामला:अर्जी लगाने वाले हरिहर पांडे कहते हैं कि कानून कुछ भी हो, अगर लोगों ने ठान लिया कि मस्जिद वहां नहीं रहेगी तो कोई रोक नहीं पाएगा

वाराणसी2 वर्ष पहलेलेखक: पूनम कौशल
  • आठ अप्रैल को वाराणसी की एक अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश दिया है
  • याचिका में दावा किया गया है कि ज्ञानवापी मस्जिद औरंगजेब के शासन काल में मंदिर तोड़कर बनाई गई है

बनारस में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इस कॉरिडोर के तहत ही मंदिर के आसपास के मकान हटाए जा चुके हैं। इन मकानों के हटने के बाद खुली जमीन में काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में खड़ी विशाल ज्ञानवापी मस्जिद अब ज्यादा साफ और बड़ी दिखने लगी है। इसकी ऊंची मीनार से होते हुए नजर जब नीचे दीवार तक जाती है तो ये मस्जिद मंदिर सी लगने लगती है। 8 अप्रैल को वाराणसी की अदालत ने एक याचिका पर आदेश दिया है कि इसका पुरातात्विक सर्वे कराया जाए।

यह फैसला देश भर में सुर्खियों में है तो बनारस की पेचीदा गलियों में भी इस बात की चर्चा है कि क्या अब काशी भी अयोध्या की राह पर बढ़ रहा है। विश्वनाथ मंदिर पर चढ़ी सोने की परत धूप में सुनहरी हो रही है तो उधर, ज्ञानवापी मस्जिद के सफेद गुंबद नीले आसमान से मिल रहे हैं। मस्जिद के इर्द-गिर्द लोहे के मजबूत जाल का ऊंचा घेरा है। जगह-जगह CRPF के जवान तैनात हैं। अंदर जाने की मनाही तो है ही। ठहरकर मस्जिद को देर तक देखने पर भी जवान आगे बढ़ने के लिए कह देते हैं।

ज्ञानवापी कुएं के नाम पर ही मस्जिद का नाम पड़ा

इतिहासकारों का मानना है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर विश्वेश्वरा मंदिर को ध्वस्त कर ये मस्जिद बनाई गई थी। स्थानीय लोग मस्जिद की पिछली दीवार में नजर आ रहे खंडहरों को दिखाते हैं जो मंदिर के ढांचे जैसे नजर आते हैं। ज्ञानवापी मस्जिद की पिछली दीवार दो संस्कृतियों के टकराव और मिलन की एक साथ गवाही देती है। नीचे पुराने मंदिर के खंडहर इसकी भव्यता बताते हैं, तो ऊपर मस्जिद के सादे-सफेद चूने के प्लास्तर लगे गुंबद मुगल काल में ले जाते हैं। मस्जिद और मौजूदा विश्वनाथ मंदिर के बीच एक दस फीट का गहरा कुआं है, जिसे ज्ञानवापी कुआं कहा जाता है। इसी कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम पड़ा है। किवदंतियों, आम जनमानस की मान्यताओं में यह कुआं सीधे पौराणिक काल से जुड़ता है।

ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग को लेकर अदालत में याचिका डालने वाले 74 साल के हरिहर पांडे स्कंद पुराण का हवाला देते हुए कहते हैं कि 'जब धरती पर गंगा नहीं थी, मानव पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसता था तब भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था और यहीं अपनी पत्नी पार्वती को ज्ञान दिया था। इसलिए ही इस जगह का नाम ज्ञानवापी या ज्ञान का कुआं पड़ा।'

बनारस में गंगा आरती का सुंदर दृश्य। हर दिन गंगा किनारे यहां आरती होती है, जिसे देखने के लिए देश और दुनियाभर से लोग आते हैं।
बनारस में गंगा आरती का सुंदर दृश्य। हर दिन गंगा किनारे यहां आरती होती है, जिसे देखने के लिए देश और दुनियाभर से लोग आते हैं।

अब इस कुएं पर लोहे का जंगला बिछा है। पुजारियों के मुताबिक मोक्ष की चाह में बनारस आने वाले लोग इसमें छलांग लगा देते थे। इसलिए यहां जाल डाला गया था। अमेरिका की मशहूर इतिहासकार डियाना एल ऐक की किताब 'बनारस द सिटी ऑफ लाइट्स' के मुताबिक भी 1828 में इस कुएं के इर्द-गिर्द एक आर्केड बनाया गया था। बनारस आने वाले श्रद्धालु इसी कुएं का जल हाथों में लेकर प्रतिज्ञा लेते थे और जब घूमकर थक जाते तो इसी का शीतल पानी पीकर प्यास बुझाते। डियाना एल भी इस बात का जिक्र करती हैं कि इस कुएं का जिक्र स्कंद पुराण में है।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर और धरोहर प्रबंधन केंद्र के समन्वयक राकेश पांडे बताते हैं कि 'ज्ञानवापी काशी का केंद्रीय स्थल है, जहां प्राचीन काल से शिव मंदिर है। वहां वापी स्थान है, जिसे ज्ञान का तालाब भी कह सकते हैं। कभी वहां बड़ा तालाब रहा होगा।' ज्ञानवापी मस्जिद और मंदिर के विवाद पर प्रोफेसर पांडे कहते हैं कि 'तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ से इस्लामी शासकों ने कई बार ज्ञानवापी परिसर पर हमले किए। विश्वनाथ मंदिर से लेकर कई और प्राचीन मंदिरों पर भी कई बार हमले हुए।'

पुरातत्व विभाग की जांच से सबकुछ साफ हो जाएगा

प्रोफेसर पांडे बताते हैं, 'जो विश्वैश्वरा मंदिर औरंगजेब के आदेश पर तोड़ा गया था, वो उसी के परदादा मुगल सम्राट अकबर के आदेश पर बनवाया गया था। अकबर ने वहीं मंदिर बनाने का आदेश दिया था जहां प्राचीनकाल से मंदिर चला आ रहा था। अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल और काशी के ब्राह्मण नारायण भट्ट ने मंदिर बनवाया और औरंगजेब के आदेश पर तोड़े जाने तक ये मंदिर ही था। पूरा मंदिर नहीं तोड़ा जा सका था, मंदिर के आधार के ऊपर ही गुंबद बनाकर उसे मस्जिद का रूप दे दिया गया था। पुरातत्व विभाग की जांच से पता चल जाएगा कि आधार मंदिर ही है।'

गुरुवार को वाराणसी के सिविल जज फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी की अदालत द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश देने के बाद जब हमने याचिका दाखिल करने वाले हरिहर पांडे से बात की तो उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गई। वे कहते हैं, 'साल 1991 में हम तीन लोगों ने ये मुकदमा दाखिल किया था। सोमनाथ व्यास की अब मौत हो चुकी है। संस्कृत यूनिवर्सिटी के डीन रहे रामरंग शर्मा भी अब नहीं रहे हैं। तीसरा वादी मैं ही बचा हूं। हमने इस मुकदमे के लिए अनवरत संघर्ष किया है।'

ये 74 साल के हरिहर पांडे हैं। इन्होंने ही याचिका लगाई है। ये कहते हैं कि हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक वहां मस्जिद रहेगी।
ये 74 साल के हरिहर पांडे हैं। इन्होंने ही याचिका लगाई है। ये कहते हैं कि हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक वहां मस्जिद रहेगी।

1991 में कांग्रेस सरकार ने जब रामजन्मभूमि विवाद को छोड़कर बाकी सभी मंदिर-मस्जिद विवादों में 1947 के बाद की यथास्थिति बनाए रखने का कानून पारित किया, तब भी हरिहर पांडे और उनके साथियों ने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया था। पांडे कहते हैं, 'ज्ञानवापी परिसर के भौतिक परीक्षण की आवश्यकता तो नहीं है। सब कुछ साफ दिखता है, लेकिन कानूनी दांवपेच के लिए ये जरूरी है। ये बात सुनिश्चित है कि लड़ाई चलेगी, विजय हमारी होगी और वहां से मस्जिद हटेगी।'

अदालत में इंसाफ नहीं हुआ तो हमें जो करना है, वो करेंगे

क्या उनके पास समझौते का कोई फॉर्मूला है? इस सवाल पर पांडे कहते हैं, 'सिर्फ एक ही फॉर्मूला है कि वहां से मस्जिद हटा ली जाए। इसके अलावा समझौते का और कोई रास्ता नहीं है। मुझे विश्वास है कि मेरे जीवनकाल में ही मस्जिद हटेगी और मंदिर का निर्माण होगा। हम मंदिर निर्माण के लिए अपने प्राण त्यागने के लिए भी तैयार हैं।'

क्या इसका मतलब ये माना जाए कि अयोध्या की तरह यहां भी मस्जिद को जबर्दस्ती हटाया जा सकता है? इस पर हरिहर पांडे कहते हैं, 'अगर जन समुदाय मस्जिद को तोड़ने पर उतारू हो जाएगा तो उसे कौन रोक पाएगा। ये अलग बात है कि हम न्यायालय के फैसले का इंतजार करेंगे, लेकिन यदि न्यायालय में खोट आया, न्यायालय ने अपना चरित्र बदला, न्यायालय में इंसाफ नहीं हुआ तो फिर हमें जो करना है, हम करेंगे ही करेंगे।'

सरकारों की जिम्मेदारी भारत के कानून को लागू करने की है और साल 1991 के कानून के मुताबिक ज्ञानवापी परिसर पर मुसलमानों का हक है। इस पर हरिहर पांडे कहते हैं, 'यदि जनसमूह ने ये ठान लिया कि मस्जिद वहां नहीं रहेगी तो कोई सरकार उस जन समूह को रोक नहीं पाएगी। चाहे वो मोदी की सरकार हो या योगी की सरकार हो। ऐसी कोई सरकार नहीं, जो जन समूह के जोश को रोक पाए।'

काशी विश्वनाथ मुक्ति आंदोलन के अध्यक्ष सुधीर सिंह कहते हैं कि अगर मुसलमान चाहें तो हम अपने फंड से कहीं और मस्जिद बनवाने के लिए तैयार हैं।
काशी विश्वनाथ मुक्ति आंदोलन के अध्यक्ष सुधीर सिंह कहते हैं कि अगर मुसलमान चाहें तो हम अपने फंड से कहीं और मस्जिद बनवाने के लिए तैयार हैं।

वाराणसी में पांडे अकेले नहीं हैं, जो ज्ञानवापी मस्जिद हटाने के लिए लड़ रहे हों। हिंदूवादी नेता सुधीर सिंह ने भी मस्जिद की जगह मंदिर के निर्माण को लेकर आंदोलन छेड़ रखा है। कोरोना महामारी की वजह से इन दिनों उनका आंदोलन सोशल मीडिया तक ही सीमित है। सुधीर सिंह ने भी वाराणसी सिविल कोर्ट में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर को मंदिर घोषित कराने के लिए मुकदमा दायर कर रखा है। अपनी याचिका में सिंह ने कहा है कि बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग अभी भी मस्जिद परिसर में ही है। उन्होंने मस्जिद परिसर में पूजन और परिक्रमा की अनुमति मांगी है।

काशी विश्वनाथ मुक्ति आंदोलन के अध्यक्ष सुधीर सिंह कहते हैं, 'उस मस्जिद का कोई मतलब नहीं है, वहां पांच वक्त की नमाज नहीं होती है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही यहां सिर्फ शुक्रवार को ही नमाज पढ़ी जाती है। हमने मुसलमानों से इस मस्जिद परिसर को हिंदुओं को सौंपने की अपील की है। मुसलमानों ने हमारी बात नहीं मानी, तब ही हम अदालत गए हैं। हम मस्जिद को अपने फंड से कहीं और बनवाने के लिए भी तैयार हैं।'

सुधीर कहते हैं, 'यदि अदालत से भी इस मामले का हल नहीं निकला तो हम आंदोलन से हल निकालेंगे और उसके दुष्परिणाम सिर्फ हिंदुओं को ही नहीं, मुसलमानों को भी भोगने पड़ेंगे। हम हर मोहल्ले में अपने कार्यकर्ता बना रहे हैं। हमने कार्यकर्ताओं से कहा है कि आंदोलन में हिंसा नहीं करनी है।' वे आगे कहते हैं, 'जब हम ज्ञानवापी मस्जिद को देखते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे हमारे पिता की हत्या कर लाश दरवाजे पर टांग दी गई है और हम रोज उस लाश को देखें ताकि हमारा खून खौले। जो हिंदू बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आते हैं उन्हें भी ऐसा ही लगता है।'

ज्ञानवापी मस्जिद को मंदिर घोषित करने वाले अपनी लड़ाई की बात कहते हैं तो मस्जिद की इंतेजामिया समिति भी लंबी लड़ाई के लिए अपनी कमर कस रही है। सैयद एम यासीन अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, वाराणसी के संयुक्त सचिव हैं। ये समिति वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के अलावा दूसरी मस्जिदों का प्रबंधन भी करती है। वकालत की पढ़ाई करने वाले यासीन ने भी लंबी तैयारी की है। लोहाटिया इलाके में अपनी लकड़ी की दुकान में बैठे यासीन के पास दस्तावेजों का पुलिंदा है। वो ब्रितानी काल के भूलेख निकालकर दिखाते हैं, जिनमें ज्ञानवापी परिसर मस्जिद के तौर पर दर्ज है।

सैयद एम यासीन अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, वाराणसी के संयुक्त सचिव हैं। वो अंग्रेजों के जमाने के भूलेख निकालकर दिखाते हैं, जिनमें ज्ञानवापी परिसर मस्जिद के तौर पर दर्ज है।
सैयद एम यासीन अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, वाराणसी के संयुक्त सचिव हैं। वो अंग्रेजों के जमाने के भूलेख निकालकर दिखाते हैं, जिनमें ज्ञानवापी परिसर मस्जिद के तौर पर दर्ज है।

यासीन कहते हैं, '1991 के प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट के आने के बाद उसी साल ये मुकदमा दायर हुआ था। उस एक्ट के बावजूद ये मुकदमा दायर हुआ है। जब कानून में ये साफ हो गया है कि 15 अगस्त 1947 के बाद मंदिर-मस्जिद विवाद का कोई मुकदमा नहीं चल सकता तो ये मुकदमा क्यों चल रहा है? इस तरह के मुकदमों से सिर्फ बनारस ही नहीं बल्कि पूरे UP में सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा। मुसलमान अब चुप नहीं बैठेंगे।'

यासीन कहते हैं, 'उनकी आंखों में सिर्फ ज्ञानवापी मस्जिद ही नहीं बल्कि सारे मुसलमान चुभ रहे हैं। यदि उनकी चले तो मुसलमानों को जहाज में भरकर समंदर में छोड़ दें। लेकिन उनकी चल नहीं रही है।'

क्या वो ज्योतिर्लिंग नकली है?

मस्जिद परिसर में ज्योतिर्लिंग होने और वहां नमाज न होने के आरोपों को खारिज करते हुए यासीन कहते हैं, 'वहां रोजाना पांच वक्त की नमाज होती है। समिति के दो मुअज्जिन वहां मुकर्रर हैं। जुमे के दिन पूरे बनारस से लोग वहां आकर नमाज पढ़ते हैं। यदि मस्जिद परिसर में शिवलिंग है तो वो बताएं कि कितना लंबा शिवलिंग है और अगर ज्योतिर्लिंग मस्जिद परिसर में है तो फिर अहल्या बाई के जमाने से जिस मंदिर में पूजा होती आ रही है, क्या वो ज्योतिर्लिंग नकली है? तो क्या वो हजारों हिंदुओं से गलत शिवलिंग की पूजा करा रहे हैं?'

यासीन कहते हैं, 'जब बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो लगा था कि अब हम चैन से रह सकेंगे। हमने बुझे मन से बाबरी मस्जिद के फैसले को मान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद परिसर को हिंदुओं को दिया तो हमने स्वीकार कर लिया कि शायद अब चैन की सांस लें। लेकिन ये सांस नहीं लेने दे रहे हैं। 1991 के मुकदमे के बाद से चार और मुकदमे दायर किए गए हैं।'

ज्ञानवापी को लेकर वाराणसी के मुसलमानों ने भी हाल ही में बैठक की है, जिसमें कानूनी स्तर पर मस्जिद के लिए लड़ाई मजबूत करने का फैसला लिया गया है। यासीन कहते हैं कि 'मस्जिद के खिलाफ किसी साजिश पर चुप नहीं रहा जाएगा। बनारस में साढ़े पांच लाख मुसलमान रहते हैं, वो हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहेंगे। यदि इनकी तरफ से कोई हरकत हुई तो उसका जवाब भी दिया जाएगा। फिर क्या होगा? जिस रास्ते पर ये देश को ले जाना चाह रहे हैं, उस रास्ते पर सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं हैं। इस देश में बीस-बाइस करोड़ मुसलमान क्या यूं हीं बैठे रहेंगे?'

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर राकेश पांडे कहते हैं कि 13वीं सदी में मुसलमान शासकों ने ज्ञानवापी पर हमला किया था।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर राकेश पांडे कहते हैं कि 13वीं सदी में मुसलमान शासकों ने ज्ञानवापी पर हमला किया था।

जब उनसे ज्ञानवापी के इतिहास पर सवाल किया गया तो उनका कहना था, 'इतिहास में मत जाइये, 15 अगस्त 1947 के बाद की जो स्थिति है, वही मानी जाएगी। उस जमाने के शासक ने क्या किया, क्या नहीं किया, वो रहने दीजिए।'

ज्ञानवापी को लेकर पहले भी हो चुका है संघर्ष

ज्ञानवापी को लेकर बनारस में कई बार संघर्ष भी हो चुका है। डियाना एल ऐक की किताब के मुताबिक साल 1809 में जब हिंदुओं ने विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के बीच एक छोटा स्थल बनाने की कोशिश की थी, तब भीषण दंगे हुए थे। तब से कई बार ज्ञानवापी को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो चुका है।

एक तरफ वाराणसी में ज्ञानवापी का इतिहास कुरेदा जा रहा है तो दूसरी तरफ आम लोग वर्तमान से संघर्ष कर रहे हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर को जाने वाली एक गली में बच्चों के खिलौने बेच रहे एक छोटे कारोबारी कहते हैं, 'ज्ञानवापी का जो होना होगा होगा, हमें अपने कारोबार की ज्यादा फिक्र है।'

महामारी की वजह से पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। विदेश से पर्यटन पूरी तरह बंद है। दुकानों में अब पहले जैसी भीड़ नहीं हैं। दोबारा लॉकडाउन की संभावनाओं ने दुकानदारों के मन में नई आशंकाएं पैदा की हैं ।

गंगा में नाव चलाने वाले रंजीत मांझी कहते हैं कि 'किसने क्या बिठाया है, मंदिर को तोड़ा है, ये सब राजनीतिक चीजें हैं। भगवान धर्म नहीं देखते हैं, वो लोगों को जोड़ते हैं। जहां मंदिर है वहां मस्जिद भी है। यदि मस्जिद को तोड़ देंगे तो इससे झगड़ा ही बढ़ेगा। यहां सब यही चाहते हैं कि अमन चैन रहे। बाबा चाहते हैं तब ही तो मस्जिद वहां हैं। मस्जिद हटने से बाबा का नाम और ऊंचा नहीं होगा। मंदिर-मस्जिद साथ रहेंगे तो सुंदर रहेगा, सदियों से दोनों का जोड़ है, ये जोड़ बना रहे।'

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