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खुद्दार कहानी:अहमदाबाद की काव्या चल-फिर नहीं सकतीं, लेकिन खूबसूरत दीये बनाकर फैला रही हैं उजाला, 7 दिन के भीतर 30 हजार की कमाई

अहमदाबादएक वर्ष पहले

अहमदाबाद में रहने वाली 17 साल की काव्या भट्ट, सेरेब्रल पॉल्सी बीमारी से पीड़ित हैं। उनके पैर काम नहीं करते हैं। वे चल-फिर नहीं सकती हैं, लेकिन अपने हौसले के दम पर उड़ान भर रही हैं। अपने हाथ से खूबसूरत दीये बनाकर वे लोगों के घरों में रोशनी फैलाने का काम कर रही हैं। लोग उनकी इस कलाकारी के दीवाने हैं। दिन-पर-दिन उनके बनाए प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ती जा रही है। पिछले एक हफ्ते के दौरान उन्होंने दीये बेचकर 30 हजार रुपए से ज्यादा की कमाई की है।

दरअसल सेरेब्रल पाल्सी एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर होता है। यह बच्चों की शारीरिक गति, चलने-फिरने की क्षमता को प्रभावित करता है। यह शरीर के जिस अंग में होता है, वह निष्क्रिय हो जाता है। काव्या को पैरों में दिक्कत है। कम उम्र में ही उन्हें यह बीमारी हो गई थी। हालांकि घर-परिवार के लोगों ने पूरी कोशिश की, कई बड़े डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन कहीं कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

बचपन से ही रहा है पेंटिंग का हुनर

सेरेब्रल पाल्सी में शारीरिक गति, चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। उसके बाद भी काव्या की कुछ करने की जिद जारी है।
सेरेब्रल पाल्सी में शारीरिक गति, चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। उसके बाद भी काव्या की कुछ करने की जिद जारी है।

अहमदाबाद के जवाहरनगर में रहने वालीं काव्या ने भास्कर से हुई बातचीत में बताया कि इसी साल उन्होंने न्यू वेद स्पेशल स्कूल से 10वीं क्लास पास की है। पढ़ाई के अलावा उन्हें बचपन से ही पेंटिंग का शौक रहा है। इसी के चलते उन्होंने स्कूल में भी पेंटिंग सीखी। खाली समय में वे अक्सर घर पर तरह-तरह की पेंटिंग्स बनाती रहती हैं। इस बार दिवाली को देखते हुए उन्होंने तय किया कि मैं भले शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हूं, लेकिन अपनी कलाकारी के दम पर दूसरों की जिंदगी में रोशनी तो भर ही सकती हूं।

इसके बाद उन्होंने अलग-अलग तरह के खूबसूरत दीये डिजाइन करना शुरू किए। उनके बनाए दीये इतने खूबसूरत थे कि देखने वालों को एक ही बार में पसंद आ जाते थे।

काव्या की मां प्रज्ञाबेन कहती हैं कि काव्या के दीये काफी खूबसूरत हैं। हाल ही में हमने इसे एक एग्जीबिशन में रखा। वहां सभी लोगों ने काव्या के आर्ट की बहुत तारीफ की। 101 रुपए से लेकर 150 रुपए में एक-एक दीये बिक गए। अभी काव्या को 7 दिनों में 30 हजार रुपए मिल चुके हैं। जबकि 150 से ज्यादा दीयों की डिमांड है। काव्या अपनी पूरी ताकत से काम में जुटी हुई हैं, क्योंकि दीयों की डिमांड लगातार बढ़ रही है। काव्या को इसी बात की ज्यादा खुशी है कि उनके हुनर को सराहा जा रहा है। काव्या के पिता मयंकभाई भट्ट यूनाइटेड को-ऑपरेटिव बैंक के ब्रांच मैनेजर हैं।

हाल ही में काव्या ने अपने बनाई दीयों की मार्केटिंग के लिए एग्जीबिशन में स्टॉल लगाना शुरू किया है।
हाल ही में काव्या ने अपने बनाई दीयों की मार्केटिंग के लिए एग्जीबिशन में स्टॉल लगाना शुरू किया है।

प्रज्ञाबेन ने बताया कि काव्या को बचपन से ही पेंटिंग का शौक है। वह हर फेस्टिवल पर कुछ न कुछ चीज डिजाइन करती है। जिसे बहुत पसंद किया जाता है। फ्रेंडशिप-डे पर काव्या ने अपने फिजियोथेरेपिस्ट को एक पेंटिंग गिफ्ट की थी, जो उन्हें बहुत पसंद आई थी। इसी के चलते दिवाली पर ही काव्या ने अपनी चित्रकारी को घर-घर तक पहुंचाने का सोचा और यहीं से उसे मिट्टी के दीये डिजाइन करने का आइडिया मिला।

बच्चों को पूरा सपोर्ट करना चाहिए
सेरेब्रल पाल्सी जैसी बीमारियों से पीड़ित बच्चों के माता-पिता को सलाह देते हुए काव्या की मां प्रज्ञाबेन कहती हैं कि यह बीमारी बच्चों को शारीरिक और बाद में मानसिक रूप से भी तोड़ देती है। ऐसे में परिवार को बच्चों का सपोर्ट करना चाहिए। उन्हें यह बिल्कुल भी महसूस नहीं होने देना चाहिए कि वे किसी तरह अशक्त हो गए हैं। लगातार उन्हें प्रोत्साहित करते रहना चाहिए, जिससे कि उनका उनकी परेशानी पर ज्यादा ध्यान न जाए। बच्चा मानसिक रूप से मजबूत रहेगा तो निश्चित रूप से समय आने पर बीमारी को भी हरा देगा।

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एग्जीबिशन में काव्या की कलाकारी की खूब तारीफ हो रही है। उनके दीयों की खूब डिमांड है।
एग्जीबिशन में काव्या की कलाकारी की खूब तारीफ हो रही है। उनके दीयों की खूब डिमांड है।

1. बिहार के बक्सर जिले की रहने वाली विनीता राय न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं। बचपन से ही हैंडीकैप्ड हैं, लेकिन उनका हुनर बोलता है, जमकर बोलता है। उनकी कलाकारी की गूंज देशभर में है। कई बड़े मंच पर वे सम्मानित भी हो चुकी हैं। विनीता हर तरह की पेंटिंग्स, फोटोज, मास्क और हैंडीक्राफ्ट आइटम्स बनाती हैं। वे एक नॉर्मल अखबार की मदद से ऐसी कलाकारी करती हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। अगर आप सामने खड़े हैं तो मिनटों में वे हूबहू आपकी तस्वीर उकेर देंगी। जिसे देखकर शायद आपको यकीन नहीं होगा कि हाथ से इस तरह की चीजें भी बन सकती हैं। (पढ़िए पूरी खबर)

2. उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वालीं उषा गुप्ता के लिए कोविड की दूसरी लहर कहर बनकर टूटी। वे अपने पति के साथ कोरोना की चपेट में आ गईं। दोनों करीब एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे। उषा तो ठीक हो गईं, लेकिन कोरोना ने उनके पति की जान ले ली। 87 साल की उम्र में उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक महीने बाद तय किया कि अब वे अपना बाकी जीवन जरूरतमंदों की सेवा में खपाएंगी।

इसी साल जुलाई में उन्होंने होममेड पिकल्स और चटनी का काम शुरू किया। वे सोशल मीडिया के जरिए देशभर में लोगों तक अपना प्रोडक्ट भेज रही हैं। एक महीने के भीतर 200 से ज्यादा बॉटल्स बिक गए हैं। इससे जो भी कमाई होती है, उसे वे कोविड मरीजों के लिए डोनेट कर देती हैं। (पढ़िए पूरी खबर)

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