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भास्कर ओरिजिनल:5 साल बाद फिर जबर्दस्त मानसून का अनुमान, जानिए कितने सटीक होते हैं स्काईमेट और मौसम विभाग के बारिश के दावे

एक वर्ष पहले
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साल 2021 के मानसून के लिए स्काईमेट ने अपने आंकड़े जारी कर दिए हैं। इसने 5 साल बाद फिर मानसून जबर्दस्त रहने का अनुमान जताया है। एजेंसी ने कहा है कि इस साल दीर्घावधि औसत (LPA) के मुकाबले भारत में 103% बारिश होगी। देश में LPA 880 मिलीमीटर है। कम और ज्यादा बारिश का असर सीधे देश की GDP पर पड़ता है, क्योंकि मानसून की स्थिति से ही ये अंदाजा लगाया जाता है कि इस साल सूखा पड़ेगा या बाढ़ आने वाली है।

इसीलिए मौसम की जानकारी देने वाली प्राइवेट भारतीय एजेंसी स्काईमेट हर साल मानसून (जून से सितंबर) के दो महीने पहले यानी अप्रैल में ही बता देती है कि कितनी बारिश की संभावना है। स्काईमेट के जीपी शर्मा कहते हैं कि ये पूर्वानुमान लगाने के लिए उनकी मौसम वैज्ञानिकों की टीम देश के हर 9 किलोमीटर के बाद एक जांच करती है। वहां हवा के बहाव, तापमान, दबाव की स्थिति को नापती है और उसके आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करती है।

ठीक इसी तरह अप्रैल-मई में ही भारत सरकार का मौसम विभाग (IMD) भी अपने अनुमान बताता है। इन्हीं दोनों के आधार मानकर कृषि, बाढ़ और आपदाओं की तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। ऐसे में इन दोनों संस्‍थाओं के आंकड़ों में कितनी शुद्धता है, ये जानना बेहद जरूरी है। इसीलिए हमने खबर की सबसे पहली इमेज में बीते 10 सालों में स्काईमेट, मौसम विभाग के अनुमानों और वास्तविक बारिश के आंकड़ों को रखा है।

बीते 10 सालों में सबसे खराब अनुमान 2015 में लगाया गया था
आंकड़ों के अनुसार साल 2015 स्काईमेट ने LPA के मुकाबले 102% बारिश होने और मौसम विभाग ने 93% बारिश होने की संभावनाएं जताई थीं, जबकि वास्तविक बारिश LPA के मुकाबले 86% ही हुई। ये बीते 10 सालों में सबसे खराब अनुमान लगाया गया था। तब के अनुमान से 16% कम बारिश हुई। जीपी शर्मा कहते हैं कि केरल और कर्नाटक में 16% बारिश के कम या ज्यादा होने से अधिक प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन राजस्‍थान और गुजरात के किसानों के लिए ये बड़ी बात होती है। इसलिए मानसून को लेकर सटीक अंदाजा लगाना बेहद जरूरी है।

उनका कहना है, 'गलतियों के आसार हमेशा बने रहते हैं, क्योंकि भारत संस्कृति में ही नहीं, वायुमंडल के लिहाज से भी काफी विविधता से भरा है। यहां जंगल, पर्वत और सपाट तीनों का भरपूर मिश्रण है। इसलिए एकदम सही अंदाजा लगा पाना बेहद कठिन है।'

पहले हर 27 किमी के बाद जांच करता था स्काईमेट, टारगेट हर 3 किमी का
इंडियन एयरफोर्स में एयरमार्शल रहे जीपी शर्मा कहते हैं कि पहले स्काईमेट हर 27 किलोमीटर की दूरी के बाद जांच कर के अनुमान लगाता था, लेकिन अब तकनीकी विकास के चलते हर 9 किलोमीटर के बाद जांच तक पहुंच गए हैं, लेकिन ये आखिरी पड़ाव नहीं है। संस्‍था का लक्ष्य है कि हर तीन किमी की जांच तक पहुंचा जाए, तब जाकर और ज्यादा सटीक जानकारी दी जा सकेगी।

पश्चिमी विक्षोभ का असर जून से सितंबर वाले साउथ-वेस्ट मानसून पर बेहद कम
भारत में बरसात के लिए एक बड़ी वजह पश्चिमी देशों से चलने वाली हवाएं भी हैं। स्काईमेट के महेश पलावत के अनुसार हमारे देश में लगातार पश्चिम से पूर्व की ओर हवा चलती है। ये हवाएं यूरोपीय देशों से शुरू होती हैं। चूंकि रास्ते में इराक, ईरान और पाकिस्तान में कोई ऐसा पहाड़ नहीं है, जो उनका रास्ता मोड़ दे, इसलिए वो जम्मू के पर्वतों से टकराने के बाद उत्तर भारत में अच्छी-खासी बरसात का कारण बनती हैं। इसके चलते पंजाब, हरियाणा और यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक में बारिश होती है, लेकिन अक्टूबर से लेकर मार्च के बीच। यानी सर्दियों में होनी वाली बारिश इसके कारण होती है।

जीपी शर्मा कहते हैं कि भारत में जिसे वाकई वर्षा ऋतु माना गया है, उस दौरान जून से लेकर सितंबर तक बारिश गर्मी के दौरान बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बने वाष्प के चलते होती है। इसमें पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका अधिक प्रभावशाली नहीं होती।

जब सरकार अनुमान जाहिर करती है तो प्राइवेट एजेंसी के पूर्वानुमान की जरूरत क्यों?
स्काईमेट के जीपी शर्मा कहते हैं कि पहले मौसम विभाग के आंकड़ों में और असल में बारिश के आंकड़ों में काफी फर्क नजर आता था। जबसे स्काईमेट ने भारत में काम शुरू किया है, तब से मौसम विभाग ने भी काफी सतर्कता के साथ काम शुरू कर दिया है। प्राइवेट एजेंसी की जरूरत का सीधा कोई मतलब नहीं है, लेकिन प्रतियोगिता बढ़ने से देश के किसानों और लोगों को सही जानकारी मिलती है तो इसमें कोई नुकसान भी नहीं है।

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