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भास्कर ओरिजिनल:पंजाब-हरियाणा का करीब 85% धान और 70% गेहूं MSP पर खरीदती है सरकार, बिहार-यूपी जैसे अन्य राज्य फिसड्डी क्यों?

12 दिन पहले
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दिल्ली के सिंघु, टीकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर पिछले 88 दिनों से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें शामिल ज्यादातर किसान पंजाब और हरियाणा के हैं। इन दोनों राज्यों की धान और गेहूं की कमोबेश पूरी पैदावार सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर खरीदती है। इसलिए नए कृषि कानूनों से MSP खत्म होने का सबसे ज्यादा डर भी इन्हीं दोनों राज्यों को है।

कुछ राज्यों के लिए MSP अहम, अन्य राज्यों के लिए नहीं
उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के डेटा के मुताबिक 2014-15 से 2019-20 के बीच पंजाब में औसतन 121 लाख टन सालाना धान का उत्पादन हुआ। इसमें से 86% अनाज सरकार ने MSP पर खरीद लिया। हरियाणा में औसतन 44 लाख टन सालाना धान की पैदावार हुई जिसमें से 78% MSP पर खरीद लिया गया। इनके अलावा 15 ऐसे राज्य हैं, जहां 30 लाख टन से ज्यादा धान की पैदावार हुई, लेकिन इनमें से सिर्फ 6 राज्यों में ही 50% से ज्यादा फसल की खरीद MSP पर हुई। मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 30% से भी कम धान MSP पर खरीदा गया।

गेहूं के मामले में भी कमोबेश यही ट्रेंड है। पंजाब और हरियाणा में करीब 70% गेहूं सरकार MSP पर खरीद लेती है। 2014-15 से 2019-20 के बीच पंजाब में औसत 169 लाख टन सालाना गेहूं की पैदावार हुई। इसमें से 69% सरकार ने MSP पर खरीद लिया। हरियाणा में 66.5% और मध्य प्रदेश में 37% गेहूं की खरीद MSP पर हुई। वहीं यूपी, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र में 10% गेहूं की खरीद भी MSP पर नहीं हो सकी।

जिन राज्यों में MSP पर ज्यादा खरीद, वहां बाजार दाम भी अच्छा
MSP एक तरह का गारंटीड मूल्य है जो किसानों को उनकी फसल पर मिलता है। भले ही बाजार में उस फसल की कीमतें कम हो। इसके पीछे तर्क यह है कि बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर न पड़े। उन्हें न्यूनतम कीमत मिलती रहे। सरकार ने 23 फसलों पर MSP तय कर रखी है। MSP पर खरीद का सीधा असर किसानों की आमदनी पर होती है। यानी जिन राज्यों में MSP पर ज्यादा खरीद होती है, वहां के किसानों की औसत मासिक आय ज्यादा है।

MSP पर ज्यादा फसल की खरीद का किसानों को अप्रत्यक्ष फायदा भी मिलता है। कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेज का डेटा कहता है कि जिन राज्यों में एमएसपी पर ज्यादा खरीद होती है, वहां फसलों का बाजार मूल्य भी उचित रहता है, लेकिन जिन राज्यों में MSP पर खरीद सीमित है, वहां आम तौर पर फसलों की कीमत कम ही रहती है। उदाहरण के लिए यूपी में गेंहू का एमएसपी 1975 रुपए प्रति क्विंटल है। जबकि खुले बाजार में गेहूं 1650 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है। पंजाब में गेहूं का एमएसपी 1975 रुपए ही है, लेकिन यहां अप्रैल 2020 में खुले बाजार में गेहूं के रेट 2200 रुपए तक पहुंच गए थे।

अब ऐसे में सवाल उठता है कि पंजाब-हरियाणा में MSP की व्यवस्था इतनी अच्छी और यूपी-बिहार जैसे राज्यों में इतनी बदतर क्यों है? अन्य राज्यों के किसानों को भी MSP का पूरा फायदा देने के लिए क्या करना चाहिए? तीन नए कृषि कानूनों से MSP पर क्या असर पड़ेगा? इन्हीं सवालों को लेकर हमने कुछ कृषि एक्सपर्ट से बात की...

पंजाब-हरियाणा के किसान संगठित, इसलिए MSP पर होती है सबसे ज्यादा खरीद
वरिष्ठ पत्रकार और एग्रीकल्चर सेक्टर पर लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे पी. साईंनाथ पंजाब और हरियाणा में MSP पर सबसे ज्यादा खरीद की वजह वहां फसलों का सबसे ज्यादा उत्पादन और इन राज्यों के किसानों का सबसे ज्यादा संगठित होना बताते हैं। MSP पर खरीदारी के मामले में ओडिशा और छत्तीसगढ़ भी अच्छे हैं, लेकिन यहां सिर्फ धान ही प्रमुखता से खरीदा जाता है।

बिहार में 2006 में ही खत्म कर दिया गया APMC एक्ट, इसलिए MSP पर खरीद सबसे कम
बिहार, यूपी, एमपी और राजस्थान जैसे राज्यों में MSP पर कम खरीदारी की वजह यहां इंफ्रास्ट्रक्चर का ना होना है। कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं फिलहाल देश में कुल 7 हजार सरकारी खरीद की मंडियां हैं। इनमें से ज्यादातर पंजाब-हरियाणा में स्थित हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर ना होने की वजह से MSP पर खरीद भी कम होती है। बिहार में MSP पर कम खरीद की वजह 2006 में वहां APMC एक्ट को खत्म कर दिया जाना है।

MSP पर खरीद बढ़ाने के लिए सरकार को देनी होगी दो तरह की गारंटी
अन्य राज्यों में MSP पर खरीद कैसे बढ़ाई जा सकती है? इस पर पी. साईंनाथ कहते हैं, 'ऐसा सिर्फ MSP की गारंटी देकर किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ MSP की गारंटी से ही यह सुनिश्चित नहीं होगा। इसके अलावा सरकार को एक निश्चित मात्रा की MSP पर खरीद की गारंटी भी देनी पड़ेगी।' देविंदर शर्मा कहते हैं, 'देश में कुल उत्पादन का सिर्फ 6% ही MSP पर खरीदा जाता है। ऐसे में 94% किसानों का क्या होगा? इसके लिए 35 हजार और मंडियां बनाने और MSP की गारंटी देने की जरूरत है।'

खुले बाजार में MSP से कम कीमत पर क्यों बिकती हैं फसलें?
पी साईंनाथ कहते हैं कि कई राज्यों में MSP पर खरीदारी में देरी की जाती है और बहुत कम सेंटर खोले जाते हैं। इसलिए ज्यादातर किसान, जिन पर आर्थिक दबाव होता है, वो अपनी फसलों को MSP से कम दामों पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। नए तीन कृषि कानूनों से किसानों को जमाखोरी बढ़ने, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के दुरुपयोग और APMC मंडियां खत्म होने का डर है। हालांकि सरकार का कहना है कि इन कानूनों का MSP से कोई लेना-देना नहीं।

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