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मोदी के दौरे से पहले भास्कर की 5 रिपोर्ट्स:जानिए इन दिनों क्या हैं लेह में हालात, उनकी कहानी भी पढ़ें जिनके अपने गलवान में तैनात हैं

लेह से लाइव रिपोर्टएक वर्ष पहलेलेखक: उपमिता वाजपेयी
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पीएम मोदी आज लेह पहुंचे। उन्होंने नीमू में 11 हजार फीट ऊंची फॉरवर्ड लोकेशन पर आर्मी, एयरफोर्स और आईटीबीपी के जवानों से बात की। - Dainik Bhaskar
पीएम मोदी आज लेह पहुंचे। उन्होंने नीमू में 11 हजार फीट ऊंची फॉरवर्ड लोकेशन पर आर्मी, एयरफोर्स और आईटीबीपी के जवानों से बात की।
  • उस 900 साल पुराने गोम्पा से रिपोर्ट जो गलवान के घायलों के लिए पूजा कर रहे हैं और उस रसूल गलवान की कहानी जिसके दादा के नाम पर गलवान घाटी का नाम पड़ा
  • करगिल में शहीद हुए और वीरता पदक जीतनेवाले योद्धा लेह की वॉर हीरो कॉलोनी में रहते हैं, यहीं वे भी रहते हैं जिनके अपने इन दिनों गलवान में तैनात हैं

शुक्रवार को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेह पहुंच गए। वहां तैनात जवानों से मिलकर मोदी ने स्थिति का जायजा लिया। इस बीच, लेह में क्या हालात हैं, लोग क्या कुछ बातें कर रहे हैं उसे समझने के लिए ये 5 लाइव रिपोर्ट्स...

कहानी उनकी, जिनके अपने गलवान में पोस्टेड हैं

सेरिंग के पति को करगिल में गोली लगी, वीरचक्र मिला, अभी गलवान में तैनात हैं; डिस्किट के पति करगिल में शहीद हुए, अब बेटा चीन सरहद पर ड्यूटी कर रहा है
सेरिंग के पति सूबेदार दोरजे करगिल युद्ध के दौरान नुब्रा सेक्टर में तैनात थे। पिछले एक महीने से वे गलवान इलाके में हैं, लेकिन सेरिंग के चेहरे पर इसकी जरा भी शिकन नहीं है। सेरिंग कहती हैं, ‘मैंने टीवी पर देखा कि गलवान में कुछ हो रहा है। मेरे पति वहीं पोस्टेड हैं। लेकिन टेंशन नहीं है, खुशी है कि वो देश के लिए काम करने गए हैं।’

सेरिंग के पति गलवान में पोस्टेड हैं। वह बताती हैं कि एक महीने पहले जब वो घर से निकले थे, उसके बाद से फोन पर भी बात नहीं हुई।
सेरिंग के पति गलवान में पोस्टेड हैं। वह बताती हैं कि एक महीने पहले जब वो घर से निकले थे, उसके बाद से फोन पर भी बात नहीं हुई।

गलवान के घायल सैनिकों के लिए 900 साल पुराने गोम्पा में पूजा हो रही है, लामा कहते हैं- हमारी दुआओं से वो जल्दी ठीक होंगे
लेह एयरबेस के ठीक सामने बना है स्पीतुक गोम्पा। वहां पहुंचते ही जिस पर सबसे पहले नजर गई वो था वहां चस्पा किया एक पर्चा। इस पर लिखा था- फोटोग्राफी एंड वीडियोग्राफी ऑफ एयरबेस इज स्ट्रिक्ली प्रोहिबिटेड।

कुछ पहले यानी 20 जून को यहां 25 लामाओं ने एक साथ गलवान में शहीद हुए सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए खास पूजा की। इस पूजा में उन सैनिकों के भी जल्दी ठीक होने क लिए प्रार्थना की गई, जो फिलहाल अस्पताल में हैं। इसके लिए बाकायदा 2 घंटे तक गोम्पा में गलवान के भारतीय सैनिकों के लिए बौद्ध मंत्रोच्चार किए गए।

21 तारादेवियां लामाओं को शक्ति देती हैं। लामाओं का कहना है कि इस शक्ति को वो घायल सैनिकों तक भिजवाएंगे और उनके जख्म जल्दी ठीक हो जाएंगे।
21 तारादेवियां लामाओं को शक्ति देती हैं। लामाओं का कहना है कि इस शक्ति को वो घायल सैनिकों तक भिजवाएंगे और उनके जख्म जल्दी ठीक हो जाएंगे।

गलवान में चीनी लाउडस्पीकर पर ‘तन डोले मेरा मन डोले’ गाना सुनाते, फिर कहते- सर्दी आने वाली है, पोस्ट छोड़ दो, ये जमीन न हमारी है, न तुम्हारी
लेह से 15 किमी दूर बसे स्टोक गांव में रहते हैं ऑनररी कैप्टन फुन्शुक ताशी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वह गलवान घाटी में तैनात थे। कैप्टन ताशी की उम्र 84 साल है। वे बताते हैं कि एक दिन उन्हें ऑर्डर मिला की पूरी यूनिट के साथ उन्हें दौलत बेग ओल्डी और गलवान के लिए निकलना है। वो अपनी यूनिट के साथ लेह से पैदल चलकर दौलत बेग ओल्डी सेक्टर और फिर गलवान घाटी तक गए थे। ये रास्ता लगभग 250 किमी का था। कैप्टन ताशी कहते हैं, ‘राशन-पानी के लिए घोड़े और याक होते थे, लेकिन हथियार हम खुद पीठ पर लेकर चलते थे।’

कैप्टन फुन्शुक ताशी1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान गलवान घाटी में तैनात थे।
कैप्टन फुन्शुक ताशी1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान गलवान घाटी में तैनात थे।

अचानक मशहूर हुए रसूल गलवान, चौथी पीढ़ी को पिछले हफ्ते ही मालूम हुई अपने दादा के अब्बा की कहानी
ये कहानी उस रसूल गलवान की है, जिसके नाम पर गलवान वैली का नाम पड़ा। वो गलवान वैली जहां पिछले दिनों भारत ने अपने 20 सैनिकों को खोया। लेह बाजार से लेकर देशभर के मीडिया में पिछले एक हफ्ते में जो सबसे ज्यादा मशहूर हुआ है वो है लद्दाख का रहने वाला ये परिवार। चीन और भारतीय सेना के बीच जिस गलवान नाले पर झड़प हुई वो गलवान नाला इसी परिवार के पूर्वज रसूल गलवान के नाम पर है।

रसूल गलवान की चौथी पीढ़ी ने उनके दादा के नाम पर रखा गलवान नाला देखा नहीं है। वे उसे देखने जाना चाहते हैं।
रसूल गलवान की चौथी पीढ़ी ने उनके दादा के नाम पर रखा गलवान नाला देखा नहीं है। वे उसे देखने जाना चाहते हैं।

आसमान में घूमते फाइटर प्लेन उन्हें करगिल युद्ध की याद दिलाते हैं, कहती हैं- घर के बेटे सरहद पर तैनात हों तो मांओं को नींद कैसे आएगी

कर्नल सोनम वांगचुक की मां लद्दाख के मशहूर बौद्ध गुरु कुशोक बकुला रिम्पोचे की रिश्तेदार हैं। ये वही रिम्पोचे हैं जिनके नाम पर लेह का एयरपोर्ट है। घर की चौखट पर खड़ी वो बाहर से आने-जाने वालों को देखकर मुस्कुराती हैं। तभी अचानक एक फाइटर जेट उड़ान-भरता है और उनके सिलवटों वाले चेहरे पर चिंता की लकीरें गाढ़ी हो जाती हैं। पूछने पर बताती हैं- करगिल युद्ध जैसा महसूस हो रहा है। बहुत चिंता होती है। वो वक्त याद आने लगता है जब 20 साल पहले बेटा ऐसी ही पहाड़ी चोटियों पर युद्ध लड़ रहा था।

सोनम वांगचुक बताते हैं कि 30 साल मैं फौज में रहा, 2007 में रिटायर हुआ, लेकिन पहली बार सुना कि हमने वहां 20 सैनिक खो दिए हैं।
सोनम वांगचुक बताते हैं कि 30 साल मैं फौज में रहा, 2007 में रिटायर हुआ, लेकिन पहली बार सुना कि हमने वहां 20 सैनिक खो दिए हैं।
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