ब्लैकबोर्ड:हम देख नहीं सकते, इसलिए कबूतर की तरह आंखें बंद कर ली हैं, जब आंखवाले ही काट-कपट करेंगे तो हम कहां जाएंगे

दिल्ली के बुराड़ी से6 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा

रंगों और रवानगी का शहर दिल्ली! चौड़ी सड़कों पर फर्राटे से दौड़ती गाड़ियां। बत्ती का रंग बदलते ही एक से दूसरे पार दौड़ते लोग। इस तेजी के बीच एक चेहरा ऐसा है, जो सड़क किनारे ठिठका रहता है। इस इंतजार में कि कोई हाथ थामे तो सड़क पार हो सके। शहर-ए-दिल्ली के रंग और रौनक से अलग इनकी दुनिया में अंधेरा है। सिर्फ अंधेरा! वे सब कुछ कर सकते हैं, सिवाय देखने के।

यशवंत यादव ऐसा ही एक चेहरा हैं। 26 साल के यशवंत से जब मैं मिलने पहुंची, जो पहली बात नोटिस की, वो था उनका घर। उत्तर-पूर्व दिल्ली की बेहद घनी बस्ती बुराड़ी में दो कमरों के फ्लैट में दीवारों से या तो पलस्तर उखड़ रहा था, या फिर जहां साबुत था, वहां दीवार एकदम खाली। कहीं भी कोई पोस्टर, वॉलपेपर या सजावट का सामान नहीं। यहां तक कि घड़ी भी नहीं।

मैं अचकचा जाती हूं, लेकिन ये न देख सकने वालों की दुनिया है। उनकी आंखों की ही तरह सूनी और स्याह। हम जैसों की नजरें यहां फिट नहीं बैठतीं।

इस गली में भले ही आपको रोशनी दिखाई दे रही हो, लेकिन यहां रहने वालों की दुनिया में अंधेरे के सिवा कुछ नहीं है।
इस गली में भले ही आपको रोशनी दिखाई दे रही हो, लेकिन यहां रहने वालों की दुनिया में अंधेरे के सिवा कुछ नहीं है।

बेरंग दीवारों के बीच बैठे यशवंत खुद कहते हैं- जब भी बाहर से कोई दोस्त आता है, मैं सोचता हूं कि घर को थोड़ा सजाया जाए। कई बार अपनी पढ़ने की टेबल पर कुछ तस्वीरें लगाने की सोची, लेकिन अब तक कुछ हो नहीं सका। मैं सिर्फ ये समझ पाता हूं कि नल ठीक चल रहा हो, दरवाजा अच्छी तरह बंद होता हो और कपड़ों-किताबों के लिए अलमारियां हों। इसके अलावा दिख सकने वाली चीजों पर हमारा खास ध्यान नहीं जाता।

ये एक अधूरापन तो है। देखिए, अगर आप दोबारा आएं तो शायद घर कुछ बदला हुआ दिखे- वे हंसते हुए कह जाते हैं।

ग्रे पैंट पर धूसर रंग की ही शर्ट पहने यशवंत बचपन की बात पूछने पर तपाक से कहते हैं- जो देख नहीं पाते, उनके बचपन के खेल भी अलग होते हैं।

दिवाली पर बच्चे पटाखे फोड़ते, मैं दूर से सुनता। वो भागते-दौड़ते, मैं किनारे खड़ा रहता कि धक्के से कहीं गिर न जाऊं। फिर मैंने अपना खेल खोजा। एक हाथ में कंकड़ लेकर दूसरे हाथ से लकड़ी लेकर उसे उछालने लगा। इसी एक खेल को मैं घंटों, दिनों और महीनों तक खेलता रहा। फिर कोई नया खेल बना लिया। ऐसे ही बचपन बीत गया।

और माता-पिता! उनके साथ आपकी बचपन की कैसी यादें हैं?

हर बात का संभलकर जवाब देते यशवंत इस बात पर देर तक चुप रहते हैं, फिर बोलते हैं- उम्मीदें तो टूटी थीं उनकी। मैं घर का बड़ा बेटा हूं। पिता के ढेरों सपने। चाहते थे कि बेटा पहलवान बने, लेकिन जो देख नहीं सकता था, वो पहलवानी क्या करता! वे नाराज रहने लगे। ये नाराजगी और खीझ, उनकी कई बातों में दिख जाती।

मैं हॉस्टल में रहता था। वहां से जब भी घर लौटता, रास्ते में पिताजी पान या दूसरी चीजें खाते-पीते। मैं उनके बगल में रहता, लेकिन मुझे कभी चाय या नाश्ते के लिए नहीं पूछा। शायद वो डरते थे कि दूसरों के सामने मैं कैसे खाऊंगा। चम्मच से खाऊंगा और गिरेगा तो अच्छा नहीं लगेगा। तब मुझे भी तकलीफ होती थी, लेकिन बड़ा होते-होते शिकायत कम होने लगी। अब उनका भी नजरिया बदला है। वे मुझे लेकर छिपते नहीं, बल्कि लोगों से मिलवाते हैं कि ये मेरा बड़ा बेटा है।

बीते 12 सालों से दिल्ली में रहकर पढ़ाई और अब स्पेशल एजुकेटर का काम कर रहे यशवंत के लिए ये सफर आसान नहीं था। लोग पहली बार ट्रेन में बैठते हैं तो विंडो सीट चाहते हैं। खिड़की से बाहर हरियाली-नदियों को गुजरता देखते हैं। सुरंग आए और अंधेरा हो जाए तो ट्रेन में हल्ला मच जाता है।

वे कहते हैं- मैंने ये सब नहीं देखा। पहली बार ट्रेन में बैठा तो घरवालों ने खाने के साथ शक भी पैक करके रख दिया। किसी से बात मत करना। किसी पर यकीन मत करना। बैठते ही मैं शक करने लगा। किसी ने सरकने को भी कहा तो अड़ गया। डरा रहा कि कोई कहीं कुछ लेकर भाग तो नहीं जाएगा। अपर बर्थ पर पैर लटकाकर बैठा था और जूते उतारने को भी तैयार नहीं था कि जूते खुलते ही गायब हो जाएंगे।

सारे लोग लूटते नहीं, लेकिन सारे लोग भले भी नहीं होते हैं। अभी पिछले दिनों की बात है, मैं सड़क पार कराने के लिए मदद मांग रहा था। दो लोग वहां से गुजरे। उन्होंने हाथ पकड़कर रास्ता पार तो कराया, लेकिन जाते हुए मेरा पर्स ले गए। उसमें सिर्फ पैसे और एटीएम कार्ड ही नहीं था, बल्कि मेरे सारे डॉक्युमेंट्स भी थे। वो सारी चीजें मुझे दोबारा बनवानी पड़ीं।

ऐसा कई बार हुआ होगा, लेकिन ज्यादातर बार भले लोग ही मिले। हमें यकीन करना ही पड़ता है। इसके अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं!

जब कोई दरवाजे पर दस्तक देता है या यशवंत को कहीं बाहर जाना हो तो, वे पहले लड़खड़ाते हैं। फिर अपनी छड़ी के सहारे संभलने की कोशिश करते हैं और पास रखी चप्पल को पहनकर बाहर निकलते हैं।
जब कोई दरवाजे पर दस्तक देता है या यशवंत को कहीं बाहर जाना हो तो, वे पहले लड़खड़ाते हैं। फिर अपनी छड़ी के सहारे संभलने की कोशिश करते हैं और पास रखी चप्पल को पहनकर बाहर निकलते हैं।

यशवंत के साथ रहते दोस्त सुरजीत कुमार राम जोड़ते हैं- जैसे ही हम घर से बाहर निकलते हैं, लोगों पर डिपेंड करने लगते हैं। सड़क पार करनी है तो मदद चाहिए। सीढ़ियां चढ़नी हैं तो साथ चाहिए। नई जगह जाना है, तब तो बार-बार मदद चाहिए। दिनभर में पचास या उससे भी ज्यादा लोगों का हाथ पकड़ना होता है, चाहे कितना ही बुरा लगे।

अब हमारे सवाल सुरजीत की तरफ मुड़ जाते हैं। बनारस के ही सुरजीत यशवंत के साथ ही साथ दिल्ली आए और दोनों एक फ्लैट में रहने लगे। मैं उनसे फ्लैट को लेकर बात करने लगती हूं। सामने दरवाजे के नाम पर लकड़ी का पट्टा लगा है, जिस पर कोई रंगाई-पुताई नहीं। वे कहते हैं- मकान मालिक तो भला आदमी है। कहता है कि रिपेयरिंग करवा देगा, लेकिन जब मजूदर काम करें तो देखने, सामान हटाने के लिए कोई चाहिए। हम वो कहां से लाएंगे! तो घर जैसा था, वैसा ही पड़ा है।

सुरजीत अपने 'न देख सकने' को लेकर ज्यादा सहज लगे। उनके कपड़ों का रंग भी अपने दोस्त की ही तरह भूरा-काला था। इस बात पर इशारा करते ही हंसते हुए कहते हैं- मैंने आज तक अपने लिए कपड़े खुद नहीं खरीदे। या तो देख सकने वाले दोस्तों को लेकर जाता हूं, या फिर अपने भाई या पापा की मदद लेता हूं।

वे जिन भी कपड़ों का सेट बनाकर देते हैं, वही यहां ले आता हूं और वैसे ही पहनने लगता हूं। सारे कपड़े लगभग इसी रंग के हैं, तो मिसमैच का डर नहीं रहता। हां, सफेद कपड़े कभी नहीं पहने। हम गिरते हैं, यहां-वहां टकराते हैं, ऐसे में हल्के रंग जल्दी गंदे हो जाते हैं।

सुरजीत ये सारी बातें बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में बता रहे हैं, लेकिन मैं घबराहट से भर जाती हूं। यहां तक कि उनकी हंसी का साथ भी नहीं दे पाती।

जिन छोटी-छोटी नेमतों को हम जैसे लोग नजरअंदाज किए रहते हैं, उनका इन्हें कोई तजुर्बा ही नहीं। मिसाल के तौर पर अपनी मर्जी का खाना पका सकना। बेरंग दीवारों वाले इस मकान में कुकिंग के लिए एक हेल्पर रखी हुई है। वो आती है, दो वक्त कच्चा-पक्का बनाकर रख जाती है। न शिकायत कर सकते हैं, न झल्लाकर खुद पका सकते हैं।

यशवंत कहते हैं- स्वाद तो हमारा कब का खत्म हो गया। अब दूसरी बातें ज्यादा सोचते हैं। तेल खत्म हो जाए तो लगता है कि अरे, अभी कल ही तो लेकर आए थे, इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गया! कुछ भी कम पड़े, मन शक से घिर जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कामवाली मैडम अपनी जगह किसी और को भेज दें, तब पूरे समय खुटका लगा रहता है कि जाते हुए घर खाली तो नहीं हो जाएगा। या कोई हादसा तो नहीं हो जाएगा।

देख नहीं सकते! तो अब हमने कबूतर की तरह आंख बंद कर ली है। जब आंखवाले ही काट-कपट करेंगे तो हम कहां जाएंगे- यशवंत जैसे अपने-आप ही बुदबुदा रहे हों।

मैं देख पा रही हूं कि देख न पाना क्या होता है।

बाहर निकलती हूं तो यशवंत भी साथ हैं। सफेद छड़ी से टटोलते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने एक जोड़ा चप्पल रखी है, वे लड़खड़ा जाते हैं। फिर संभलते हुए खुद की लिखी एक कविता सुनाते हैं- ‘न जाने क्यों रोने का जी कर रहा है, अनायास आंसुओं से मन भर रहा है। क्या ये किसी दुर्घटना का पूर्वाभास है, या मन में बैठा कोई अनजाना अहसास है।’