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विज्ञापन वाले विकास का सच:लखीमपुर कांड के गांव में राजनीति है, लेकिन शौचालय नहीं; गाड़ियां रुकते ही भागने को मजबूर महिलाएं

लखीमपुर खीरी8 दिन पहलेलेखक: पूनम कौशल

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले के तिकुनिया में हुए किसान हत्याकांड पर रिपोर्ट करने के लिए मैं सड़क मार्ग से लखीमपुर खीरी जा रही थी। सुबह के धुंधलके में कुछ औरतें सड़क किनारे बैठी शौच करती दिखीं। दिल्ली-NCR में उत्तर प्रदेश सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापन लगे हैं जिनमें विकास का उत्सव मनाते हुए UP के खुले में शौच मुक्त होने के दावे किए गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार जनवरी 2019 में ही समूचे उत्तर प्रदेश को खुले में शौच मुक्त घोषित कर चुकी है। ऐसे में जब बड़ी संख्या में महिलाएं सड़क किनारे बैठीं शौच करती दिखीं तो उनसे बात करने की जिज्ञासा पैदा हुई।

गांव में बने सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि इन पर सरकारी ताले पड़े हैं।
गांव में बने सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि इन पर सरकारी ताले पड़े हैं।

गाड़ी से उतरकर मैं जैसे ही महिलाओं की तरफ बड़ी वो अपने लोटे चप्पल वहीं छोड़ बचाओ-बचाओ कहती बस्ती की तरफ भागीं। मेरे मन में सवाल कौंधा कि ऐसा क्या हो गया है जो ये महिलाएं इस तरह घबरा रही हैं? उनके चप्पल और लोटे वहीं पड़े थे और वो बदहवास कुछ दूर जाकर रुक गईं। मैं उनके करीब गई, कुछ लोग इकट्ठा हो गए थे। खुले में शौच करने आई बारहवीं में पढ़ने वाली पल्लवी कहती हैं, "जैसे ही गाड़ी रुकी हमें डर लगा कि कहीं हमें उठा ना ले जाएं। पहले कई बार बाहर शौच करने आई लड़कियों के साथ गाड़ीवालों ने छेड़खानी की है।"

गूढ़ा भी महिलाओं के इस समूह में शामिल थीं। वो सिसकते हुए कहती हैं, "हमें डर लगा कि हमें उठा ले जाएंगे, हम लोटा चप्पल छोड़ चिल्लाते हुए भागे।" लखीमपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर कोठिया गांव की रहने वाली ये महिलाएं और लड़कियां रोज सुबह खुले में शौच करने सड़क किनारे आती हैं।

लखीमपुर से नेपाल सीमा की तरफ बढ़ते हुए सड़क पर हर जगह खुले में शौच करती महिलाएं दिखाई देती हैं। हाथ में टॉर्च और डिब्बा लिए पुरुष भी खेतों की तरफ जाते दिखते हैं। गूढ़ा कहती हैं, "हमारा घर यहां से करीब आधा-एक किलोमीटर है। अगर घर में शौचालय होता तो हम इतना खतरा उठाकर क्यों आती?"

गूढ़ा कहती हैं, "इतना पानी भरा है, अगर घर में शौचालय होता तो हम जवान औरतें बच्चियों को लेकर जंगल क्यों आतीं? जितने देर बैठते हैं सांस अटकी रहती है कि कहीं कोई देख ना ले, कोई आ ना जाए। जब आपकी गाड़ी रुकी तो हम बता नहीं सकती हैं कि हमें कैसा लगा।"

गूढ़ा और उनके साथ मौजूद लड़कियां और महिलाएं मुझसे जिद करती हैं कि मैं उनके घर चलकर वहां की हालत देखूं। गूढ़ा कहती हैं, "दीदी, आप घर चलकर देखिए, आपको हकीकत पता चल जाएगी। पड़ोसी के घर में टॉयलेट बने हैं, कभी-कभी उनके में बैठ जाते हैं, लेकिन रोज-रोज उनका भी दरवाजा नहीं खुलवा सकते हैं।"

गांव की ज्यादातर महिलाएं और लड़कियां भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
गांव की ज्यादातर महिलाएं और लड़कियां भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं।

खुले में शौच करने आई गायत्री दबी-सहमी आवाज में कहती हैं, "डर लगता है कि कहीं कोई उठा ना ले जाए। कल एक जीप रुकी तो हमारी सांस अटक गई।" ज्योति के घर में भी शौचालय नहीं है। ज्योति कहती हैं, "डरते-डरते बाहर आते हैं। सूरज निकलने से पहले आते हैं कि किसी को मुंह ना दिखाई दे। शौचालय बना नहीं है, तो मजबूरी है। लड़की को लेकर आते हैं, पचास तरह के डर हैं।"

जिनके घर में शौचालय नहीं है वो सुबह के समय तो समूह बनाकर सड़क किनारे शौच कर लेती हैं, लेकिन तबीयत खराब होने या दिन में जरूरत होने पर उन्हें बहुत दिक्कत होती है। महिलाओं को सबसे ज्यादा दिक्कत पीरियड्स के समय होती है। ज्योति कहती हैं, "अब बार-बार किसी दूसरे के घर में नहीं जा सकते। रोक के रखना पड़ता है, दिन छुपने का इंतजार करते हैं कि कुछ अंधेरा हो जाए।"

गूढ़ा कहती हैं, "हम महिलाओं के साथ हादसे होते रहते हैं। कुछ दिन पहले एक जीप रुकी थी उसमें सवार लोगों ने छेड़खानी और बदतमीजी की। हमारे लिए भागना मुश्किल हो गया।"

कोठिया जिस ग्राम पंचायत का हिस्सा है, उसमें सात हजार के करीब लोग रहते हैं। गांव के बाहर एक बड़ा मंदिर और सरकारी स्कूल है। गांव में घुसते ही एक बोर्ड लगा है जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर है। इस पर गांव में हुए विकास कार्यों का ब्योरा है, लेकिन सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में जमीन आसमान का फर्क है। सरकारी रिकॉर्ड में कोठिया गांव ODF (Open Defecation Free) यानी खुले में शौच मुक्त है, लेकिन हकीकत में 70% आबादी के पास टॉयलेट नहीं है।

पूरे गांव में तकरीबन हर घर का हाल एक जैसा

यहां सभी जाति के लोग हैं, लेकिन ज्यादातर पासी समुदाय के हैं, जो एक अनुसूचित जाति हैं। गूढ़ा और ज्योति पासी समुदाय से ही हैं। उनके घर की तरफ जा रही सड़क पर पानी भरा है। गूढ़ा संयुक्त परिवार में रहती हैं। ये एक अधबना पक्का मकान है जो बारिश में टपकता है। गूढ़ा के हिस्से में एक झोपड़ी आई है जो किसी भी समय गिर सकती हैं। गूढ़ा का आधार कार्ड तो है लेकिन राशन कार्ड नहीं बन सका है। उनके घर में शौचालय नहीं हैं। जब मैं इस दलित मोहल्ले में पहुंची तो भीड़ लग गई। यहां महिलाओं को जब पता चला कि मैं एक पत्रकार हूं और शौचालयों के बारे में जानकारी ले रही हूं तो सब मुझसे अपने घर चलने की जिद करने लगीं।

यहां अधिकतर घरों में शौचालय नहीं बने थे। इस गांव की अधिकतर महिलाएं खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। पुरुषों को भी बाहर खेत में ही जाना पड़ता है, लेकिन उनका कहना था कि उन्हें कोई खास दिक्कत नहीं होती। असल मसला महिलाओं का है जिन्हें सिर्फ शर्म ही नहीं आती, बल्कि घर से बाहर खुले में शौच जाने के दौरान उनकी सुरक्षा को भी खतरा होता है।

हाथ में बोतल लिए अपनी मां के साथ खेत से आ रही एक युवती ने कहा, "खुले में शौच जाते हुए कैसा लगता है ये एक महिला ही बता सकती है। यदि घर में शौचालय हो तो कोई भी महिला बाहर नहीं जाएगी।"

जो गिने-चुने शौचालय बने हैं उनकी हालत भी खराब

गांववालों के घरों पर बने ज्यादातर शौचालय इतने टूट-फूट चुके हैं कि वो इस्तेमाल करने लायक ही नहीं।
गांववालों के घरों पर बने ज्यादातर शौचालय इतने टूट-फूट चुके हैं कि वो इस्तेमाल करने लायक ही नहीं।

उत्तर प्रदेश सरकार स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रत्येक परिवार को शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपए का अनुदान देती है। ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय ग्राम पंचायत के जरिए बनाए जाते हैं। ग्राम कोठिया में भी कई घरों में पंचायत के फंड से शौचालय बने हैं। लेकिन इनकी हालत ऐसी है कि बनना या ना बनना एक जैसा है। हमने जो शौचालय देखे वो एक साल के भीतर ही जर्जर हो गए थे। अधिकतर की सीट बैठ गई थी और प्लास्टर झड़ गया था। इनका सेप्टिक टैंक भी नहीं बनाया गया था, एक गड्ढा खोदकर ही खानापूर्ती कर दी गई थी।

बावजूद बेहद खराब निर्माण के, जिन परिवारों के शौचालय बने हैं वो उनका बहुत ध्यान रखते हैं। कई लोगों ने अपने शौचालयों पर ताले भी लगा रखे थे। इनमें से कुछ इस्तेमाल होने लायक थे। गांव के ही शिवकुमार कहते हैं, "हमने तीन बार अपने दस्तावेज पंचायत सचिव को दिए लेकिन हमारा शौचालय नहीं बना। सूची में नाम के बदले हमसे कुछ पैसे मांगे गए थे। हमारे पैसे थे ही नहीं तो कहां से देते।" दलित मोहल्ले में जिससे भी बात करो उसकी शिकायत एक जैसी ही थी। अधिकतर लोगों का कहना था कि बार-बार गुजारिश करने के बावजूद उनके शौचालय नहीं बने हैं। हाथ में बोतल लिए जंगल से लौट रही एक बुजुर्ग महिला कहती हैं, "हमारी तो पूरी जिंदगी बेशर्मी में कट गई। हमारी बच्चियों के लिए शौचालय बन जाएं तो उन्हें थोड़ा सम्मान मिल जाएगा।"

सरकार का दावा खुले में शौच मुक्त है उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश सरकार ने जनवरी 2019 में पूरे प्रदेश को खुले में शौच मुक्त घोषित किया था। उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि प्रदेश के सभी 75 जिले पूरी तरह खुले में शौच मुक्त हैं। सरकार के मुताबिक 2 अक्तूबर 2014 के बाद से प्रदेश में 1,95,98,984 शौचालय बनाए गए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान प्रदेश में शौचायल वाले घरों की संख्या में 67.37 फीसदी वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2019-20 में ही 119455 नए शौचायल बने हैं। प्रदेश में 97640 गांव और 58769 पंचायतें खुले में शौच मुक्त हैं।

प्रदेश में बने हुए शौचालयों की तस्वीरें सरकारी वेबसाइट पर अपलोड की जाती हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक 2 अक्तूबर 2014 के बाद से अब तक 1,61,31,55,500 तस्वीरें अपलोड की जा चुकी हैं। लखीमपुर जिले को दिसंबर 2018 में पूरी तरह खुले में शौचमुक्त घोषित किया गया था। जिला प्रशासन ने कार्यक्रम आयोजित करके जिले के हर परिवार के घर में शौचालय निर्माण हो जाने की घोषणा की थी, लेकिन ये घोषणा कागजी ही अधिक थी, क्योंकि अभी भी जिले के अधिकतर गांवों में लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।

कोठिया में ग्राम प्रधान एक महिला ही हैं। इनका नाम गोल्डी भार्गव है। हालांकि, ग्राम पंचायत का काम इनके पति आशुतोष देखते हैं। गांव में शौचालय न बनने के सवाल पर आशुतोष कहते हैं, "ये सच है कि गांव में खुले में शौच की समस्या है। अभी हमारे पास प्रधानी आए तीन महीने ही हुए हैं, हमें दस शौचालय मिले हैं, जिनमें से हमने हर मोहल्ले में तीन-तीन दिए हैं।" आशुतोष कहते हैं, "यदि विकास खंड से अनुमति मिलेगी तो वो सभी जरूरतमंदों के घर पर शोचालय बनवाएंगे।" वहीं इस संबंध में हमने जिलाधिकारी कार्यालय में संपर्क किया तो कोई जवाब नहीं मिल सका। ये जरूर बताया गया कि लखीमपुर खीरी पूरी तरह खुले में शौच मुक्त है।

लोटे से मुक्ति चाहती हैं कोठिया गांव की औरतें

किसान हत्याकांड से चर्चा में आए लखीमपुर की इन औरतों को उम्मीद है कि अब मीडिया लखीमपुर आ रहा है तो उनके मुद्दे पर भी चर्चा होगी। गूढ़ा और बाकी औरतें लोटे से मुक्ति चाहती हैं। वो बड़े अपनेपन और उम्मीद से कहती हैं, "दीदी अगर हमारे घर में शौचालय बन जाए तो हमारी जिंदगी संवर जाए। हमारा ये काम करवाने वालों का गुणगाम हम जीवनभर करेंगे।" जब मैंने इन महिलाओं से मिलने के लिए गाड़ी रोकी थी तो वो भाग गईं थीं और उनके हाथ से लोटा छूट गया था।

कोठिया गांव से निकलते हुए मैं यही दुआ कर रही थी कि इन महिलाओं के हाथ से लोटा छूट जाए, इनके घरों में शौचालय बन जाएं। सड़कों से उतरकर गांव की तरफ बढ़ते ही उत्तर प्रदेश की वो हकीकत दिखाई देती है जो विज्ञापनों से कहीं दूर है। मन में सवाल कौंधता है कि क्या UP सरकार फर्जी आंकड़े पेश करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कर पाएगी। यदि घरों में टॉयलेट नहीं बने हैं तो फिर रिकॉर्ड में कैसे बने, उनका पैसा कहां गया?

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