Sunday जज्बात:मेरा बेटा न नेता था और न किसान, फिर भी उसे इतना मारा कि चीथड़े उड़ गए; चेहरा देखने की हिम्मत नहीं हुई

15 दिन पहलेलेखक: विजय मिश्रा

तारीख 2 अक्टूबर 2021। गले में सोने की चेन पहनते हुए शुभम ने मुझसे कहा कि पापा मैं मंत्री अजय मिश्र टेनी के कार्यक्रम में जा रहा हूं, 5 ऑर्डर तैयार करवाए हैं, फलां जगह पहुंचवाना है। कल वापस आ जाऊंगा। तब उसकी तबीयत खराब थी, उसे बुखार था। हम नहीं चाहते थे कि वो जाए, हमने उसे रोकने की कोशिश भी की, लेकिन वो नहीं रुका। उसने 2 रोटी खाई और निकल गया। दिन भर शुभम से मेरी फोन पर बात होती रही। अगले दिन भी बात हुई, लेकिन फिर दोपहर 2 बजे के बाद उससे बात होनी बंद हो गई।

कुछ देर बाद हमें पता लगा कि जहां शुभम गया है, वहां हिंसा हो गई है। हमने फौरन TV ऑन किया तो देखा कि गाड़ियां जल रही हैं। हम परेशान हो गए। बार-बार शुभम को फोन करते रहे, लेकिन उसका फोन स्विच ऑफ बता रहा था। वो अपने दोस्त सुमित जायसवाल के बुलावे पर अजय मिश्र के गांव में होने वाले दंगल में गया था। हर साल मंत्री के गांव में यह दंगल होता है जिसमें पूरे लखीमपुर से BJP कार्यकर्ता शामिल होने के लिए जाते हैं। हम जिले में जिसे भी फोन लगा रहे थे, सब बोल रहे थे कि शुभम ठीक है, लेकिन कोई उससे बात नहीं करवा रहा था।

मैं अपने 4 भाइयों और भतीजों के साथ शुभम को ढूंढने के लिए निकल गया। मैंने लखीमपुर का एक-एक अस्पताल छान मारा। कोई नर्सिंग होम नहीं छोड़ा, लेकिन उसका कहीं कुछ पता नहीं लग पाया। हिंसा स्थल से जो भी एंबुलेंस आती थी मैं उसपर यह देखने के लिए चढ़ जाता कि शायद इसमें मेरा शुभम होगा, लेकिन वो हमें किसी एंबुलेंस में नहीं मिला।

मैं एक अस्पताल में खड़े-खड़े सोशल मीडिया चेक कर रहा था। तभी मेरे वॉट्सऐप पर एक वीडियो आया। जिसमें एक लाश दिखी, पिटाई की वजह से उसके चिथड़े उड़ गए थे, चेहरा देखने लायक नहीं था, उसकी पहचान करना मुमकिन नहीं था, लेकिन उसका अंडरवियर शुभम का ही था। उसी से मैंने पहचाना कि ये लाश मेरे बेटे की ही है।

शुभम बड़ा हो गया था, उसकी एक छोटी बच्ची भी है। अब वह घर की जिम्मेदारियां संभालने लगा था। मेरी भी नौकरी उसने छुड़वा दी थी।
शुभम बड़ा हो गया था, उसकी एक छोटी बच्ची भी है। अब वह घर की जिम्मेदारियां संभालने लगा था। मेरी भी नौकरी उसने छुड़वा दी थी।

बस फिर क्या था घर में रोना-धोना मच गया। हम तत्काल उस अस्पताल में पहुंचे जहां शुभम की लाश रखी थी। वहां जाने पर देखा कि मेरे बेटे की लाश सील्ड कर दी गई है। उसका चेहरा देखा नहीं जा सकता था। शुभम की मां और उसकी पत्नी की जिद थी कि वो उसका चेहरा देखना चाहती हैं। आखिरी वक्त में उसके मुंह में गंगाजल और तुलसी का पत्ता डालना चाहती हैं, लेकिन मैंने कलेजे पर पत्थर रख कर सील खोलने से मना कर दिया।

मैं जानता था कि शुभम की लाश देखकर घर की औरतें कभी संभल नहीं पाएंगी। कई रिश्तेदार भी उसका चेहरा देखना आए, लेकिन मैंने मना कर दिया। आखिरी दफा मैं अपने बेटा का चेहरा नहीं देख पाया, उसकी मां तड़प कर रह गई, उसकी पत्नी पर क्या बीती होगी, मैं सोच भी नहीं सकता, बताना तो मुमकिन ही नहीं है। इससे ज्यादा अफसोस की बात मेरे लिए कुछ नहीं हो सकती।

मैं तो आजाद हो चुका था, जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका था। शुभम ने सबकुछ संभाल लिया था। जब मैं 18 साल का था तब से एक ट्रैक्टर एजेंसी में नौकरी करता था। 7 महीने पहले ही शुभम ने मेरी नौकरी छुड़वा दी थी। मुझसे कहने लगा कि पापा अब नौकरी छोड़ दो, मैं सब संभाल लूंगा। वो ही घर में कमाने वाला था और सारा खर्च चलाता था। डेढ़ साल पहले उसने 1.5 लाख रुपए से अपना बिजनेस शुरू किया था जो 17 लाख तक पहुंच गया था। मेरा छोटा बेटा लखनऊ में LLB की पढ़ाई कर रहा था।

मैं खुश था कि अब मेरा परिवार सेट हो गया है। दोनों बच्चों ने अपनी लाइन पकड़ ली है, लेकिन शुभम के जाने के बाद उसके भाई ने पढ़ाई छोड़ दी, अब वह हमारे साथ घर पर ही रहता है। बुढ़ापे की इस उम्र में मुझ पर फिर से परिवार का बोझ आ गया है। जहां से मैंने अपना संघर्ष शुरू किया था, आज उसी जगह फिर से आ गया हूं। मुझे ही उसका बिजनेस संभालना पड़ रहा है।

मन नहीं लगता है। दिमाग काम नहीं करता है, लेकिन जी रहे हैं। एक दिन एक गाड़ी से माल उतारने के लिए मुझे गाड़ीवाले को 240 रुपए देने थे, मैंने उसे 2400 रुपए दे दिए। यानी मेरा दिमाग ही काम नहीं करता है। मेरे सामने परिवार चलाने की स्थिति दयनीय है। मैं जैसे परिवार मैनेज कर रहा हूं, कैसे कर रहा हूं, बस मैं ही जानता हूं, आपको, बता नहीं सकता।

मैंने सिर्फ अपना बेटा नहीं खोया है। इस पूरे परिवार ने किसी न किसी रूप में शुभम को खोया है। उसके जाने के बाद हमने जीना छोड़ दिया है। बस एक-एक दिन जैसे-तैसे काट रहे हैं।
मैंने सिर्फ अपना बेटा नहीं खोया है। इस पूरे परिवार ने किसी न किसी रूप में शुभम को खोया है। उसके जाने के बाद हमने जीना छोड़ दिया है। बस एक-एक दिन जैसे-तैसे काट रहे हैं।

अपनी मौत से कुछ दिन पहले शुभम अपनी मां से बोला था कि नवरात्र के बाद इतना पैसा आने वाला है कि तुम रख नहीं पाओगी। नवरात्र से ठीक 3 दिन पहले पैसा तो आया, लेकिन उसकी मौत का मुआवजा आया। भगवान ऐसा पैसा किसी बाप को न दें। मुआवजे के तौर पर हमें 45 लाख रुपए मिले, लेकिन वह पैसे बहू को मिले हैं। आगे बहू की मर्जी, वो चाहे तो हमें कुछ न दे, हम सड़क पर आ जाएंगे।

इतना ही नहीं जो बिजनेस मैं संभाल रहा हूं, वो भी शुभम की पत्नी का ही है। शुभम की मां भी बीमार रहती है, उसके दादा-दादी भी अभी जिंदा हैं। यानी इन सब की देखभाल अब मेरे कंधों पर ही है। कई लोगों के पास शुभम के पैसे भी थे। आज जब हम उनसे मांगते हैं तो वे लोग कहते हैं कि हमने तो दे दिए हैं, लेकिन मैं लोगों को कैसे समझाऊं कि अगर पैसे दिए होते तो वो पैसे उसके बैंक में ही होते न। शुभम उसे अपने साथ लेकर थोड़ी गया है। वहीं जिसको पैसे लेने थे, वे अब बार-बार आ रहे हैं।

शुभम की मां की आंखें हमेशा फूली रहती हैं। छिप-छिप कर रोती रहती है। हम उसे अकेला नहीं छोड़ते हैं। शुभम की डेढ़ साल की बेटी है। बार-बार बोलती है कि पापा आएंगे तो मारूंगी उन्हें कि अभी तक घर क्यों नहीं आए। उसे देखता हूं तो मैं भी रोने लगता हूं। उसे कैसे बताऊं कि अब उसके पापा कभी आने वाले नहीं हैं।

शुभम के सपने बहुत ऊंचे थे। मैं उससे अक्सर बोला करता था कि बेटा हम गरीब हैं, लेकिन वो बोलता था कि सोच तो ऊंची ही रखनी चाहिए। घर में पैसे नहीं थे, गर्मी के दिन में सोच रहे थे कि कूलर लगवा लें, लेकिन शुभम ने AC लगवाया। उसकी एक इच्छा थी एक कार लेने की। एक अधूरा मकान है, जिसमें वो मार्बल लगवाना चाहता था। उसकी ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी। उसे खाने में मशरूम बहुत पसंद था। उसके जाने के बाद हमने घर में कभी मशरूम की सब्जी नहीं बनाई।

मेरा क्या है,मेरी तो एक-एक दिन गुजर ही रहा है, लेकिन परिवार में और भी तो लोग हैं। शुभम की मां है, दादा-दादी हैं, उसकी पत्नी और छोटी बच्ची है। सबकुछ कैसे संभलेगा भगवान ही जानें।
मेरा क्या है,मेरी तो एक-एक दिन गुजर ही रहा है, लेकिन परिवार में और भी तो लोग हैं। शुभम की मां है, दादा-दादी हैं, उसकी पत्नी और छोटी बच्ची है। सबकुछ कैसे संभलेगा भगवान ही जानें।

वो किसी का दर्द नहीं देख सकता था। एक दफा उसके चाचा को पैसों को जरूरत थी तो उसने अपनी सोने की चेन गिरवी रख कर चाचा को पैसे दिलवा दिए। उसे किसी की मजबूरी पता लगनी चाहिए बस मदद मे लग जाता था।

लखीमपुर हिंसा में कई लोग मारे गए। सरकार के लिए मेरा बेटा भी एक आंकड़ा ही है, लेकिन मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मैंने सिर्फ अपना बेटा नहीं खोया है। शुभम के जाने से एक भाई चला गया, एक पोता चला गया, एक पति चला गया और एक छोटी सी मासूम का बाप चला गया। मेरा तो घर बरबाद हो गया।

जहां-जहां कांग्रेस की सरकारें थीं उन्होंने यहां हिंसा में मरे किसानों के परिजनों की मदद की। उन्हें एक करोड़ 95 लाख रुपए मिले, लेकिन हमें सिर्फ 45 लाख। क्योंकि शुभम भाजपा का कार्यकर्ता था। आज केंद्र में और देश में कई राज्यों में भाजपा की सरकार है, लेकिन किसी ने कुछ नहीं दिया। अपने पार्टी के कार्यकर्ता के लिए कुछ तो सरकार करती, लेकिन नहीं की। ​दुख होता है कि जिस पार्टी के लिए वो गया, जिसका वो कार्यकर्ता था उसके किसी नेता ने उसके लिए एक शब्द भी नहीं बोला। इतना ही नहीं गाड़ी का ड्राइवर हरिओम तो इतना गरीब था कि उसके घर में खाने के लिए भी कुछ नहीं है। उसके पिता विकलांग हैं।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में पिछले साल 3 अक्टूबर को हिंसा भड़क थी। इसमें 8 लोगों की जान गई थी। जिसमें भाजपा कार्यकर्ता शुभम मिश्रा भी थे। उनके पिता विजय मिश्रा ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की है...