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आज की पॉजिटिव खबर:कॉर्पोरेट लाइफ छोड़कर पहाड़ों में नर्सरी शुरू की, अब सलाना 20 से 25 लाख के पौधों की बिक्री

3 महीने पहलेलेखक: सुनीता सिंह

सक्सेसफुल लाइफ के लिए बड़े शहरों की भीड़ में शामिल होना जरूरी नहीं है। इसी सोच के साथ देहरादून के सचिन कोठरी दस साल पहले कॉर्पोरेट लाइफ छोड़ देहरादून के एक छोटे से गांव में अपने दोस्त के साथ फूलों और सब्जियों की नर्सरी का काम शुरू किया। शुरुआत के छह महीने तक नर्सरी का काम अच्छा नहीं चला तो दोस्त साथ छोड़ वापस दिल्ली चला गया और घरवाले भी साथ नहीं दिए लेकिन सचिन ने हार नहीं मानी।

आज इनकी नर्सरी से तकरीबन 10 लाख फूलों और सब्जियों के पौधे देश के कई शहरों में भेजे जाते हैं। सचिन अपने सपनों को जीने के साथ कई लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं। हर साल नर्सरी से 20-25 लाख के पौधों की बिक्री की जाती है। सचिन के काम से प्रेरित कई युवा इस बिजनेस मॉडल पर काम कर रहे हैं।

सीनियर्स की स्ट्रेसफुल लाइफ को देख खुद का काम शुरू किया

दुबई में लाखों की सैलरी के ऑफर को मना कर नर्सरी की शुरुआत की।
दुबई में लाखों की सैलरी के ऑफर को मना कर नर्सरी की शुरुआत की।

37 साल के सचिन कोठारी देहरादून के रहने वाले हैं। सचिन MBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद ‘टोटल ऑयल इंडिया लिमिटेड कंपनी’ में सेल्स ऑफिसर थे। सचिन कॉर्पोरेट की कभी न पूरी होने वाली टारगेट बेस्ड लाइफ से परेशान हो गए थे, और तब उन्होंने कुछ नया करने की ठानी।

सचिन कहते हैं, “ऑफिस में जब मैं अपने सीनियर्स को देखता था, जो भारत के टॉप इंस्टिट्यूट से पढ़े थे और जिनकी सैलरी लाखों में थी, लेकिन उनकी लाइफ स्टाइल मुझे पसंद नहीं थी। कॉर्पोरेट में ज्यादातर काम करने वाले लोग स्ट्रेस की वजह से चेन स्मोकर बन जाते हैं और कई बीमारियों से घिरे रहते हैं। मैं ऐसी जिंदगी नहीं चाहता था और मैंने अपना रास्ता बदला।”

2012 में सचिन अपने एक दोस्त के साथ मिलकर देहरादून से 15 किलोमीटर दूर सुरखेत गांव में फूल और फल की नर्सरी का काम शुरू किया। नर्सरी के लिए जमीन भी दोस्त की ली। तकरीबन छह महीने के लगातार नुकसान के बाद सचिन के दोस्त उनका साथ छोड़ कर वापस दिल्ली आ गए। नए काम में सचिन को लगातार एक साल तक नुकसान होता रहा। घर वाले भी उनका साथ देने के बजाय उन्हें ताना देते थे। बावजूद इसके सचिन ने अपना काम जारी रखा और धीरे-धीरे ये अपने काम में सफल होते गए।

सफर आसान नहीं था लेकिन आज अपनी पसंद का काम कर रहे

सचिन की नर्सरी में सीजन से पहले ही फल और सब्जियों के पौधों की डिमांड आ जाती है।
सचिन की नर्सरी में सीजन से पहले ही फल और सब्जियों के पौधों की डिमांड आ जाती है।

नर्सरी को शुरू करने के लिए सचिन को तकरीबन 6 लाख की जरूरत थी। उन्होंने कुछ पैसे खुद की सेविंग्स से लगाए, कुछ दोस्त और परिवार के लोगों से लिए। शुरू के एक साल तक टेक्निकल नॉलेज की कमी और इस फील्ड में एक्सपीरियंस न होने के कारण लगातार नुकसान होता रहा। सचिन कहते हैं, “शुरू के एक साल तक तो काम में सफलता के आसार दिख ही नहीं रहे थे, लेकिन मैं पहाड़ों के शांत माहौल में ही काम करना कहता था, तो लगातार कोशिश करता रहा और एक समय बाद सब कुछ बदलता नजर आने लगा।”

आज नर्सरी में कई शहरों से डिमांड आती हैं। देहरादून के अलावा कई बड़े शहरों में पौधे की सप्लाई की जाती है। देहरादून में जितनी भी बड़ी नर्सरी हैं, वहां यहीं से पौधे जाते हैं। इसके अलावा सहारनपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, अमृतसर, लुधियाना सहित कई शहरों में फल और सब्जियों के पौधे सचिन की नर्सरी से सप्लाय किए जाते हैं।

नर्सरी में हर साल दस लाख से ज्यादा पौधे प्रो ट्रे में तैयार किए जाते हैं

पौधों को एडवांस टेक्नोलॉजी की मदद से प्रो ट्रे में उगाया जाता हैं।
पौधों को एडवांस टेक्नोलॉजी की मदद से प्रो ट्रे में उगाया जाता हैं।

सचिन की नर्सरी में पौधे एडवांस तरीके से और जल्दी उगाए जाते हैं। ज्यादातर पौधे प्रो ट्रे में कोकोपीट और वर्मी कम्पोस्ट डाल कर उगाए जाते हैं । इस तरीके पौधे उगाने में खर्च ज्यादा होता है लेकिन पैकिंग और ट्रांसपोर्टेशन में काफी आसानी होती है, क्योंकि यह हल्का और एरेटेड होता है। सचिन बताते हैं ,” हम मार्केट में पौधों की जल्दी सप्लाई के लिए कई पौधों को काम समय में ही तैयार कर लेते हैं। इसके लिए आर्टिफिशियल लाइट और एयर कंडीशनर रूम की भी सुविधा है जहां सीजन आने से पहले ही हम उन पौधों को उगा लेते हैं जिनकी डिमांड मार्केट में होती है।”

पौधों को तैयार करने के लिए दिल्ली से सभी तरह के बीज मंगाए जाते हैं, जो थोड़े महंगे तो मिलते हैं लेकिन इनसे उगाए जाने वाले पौधे काफी अच्छे होते हैं।

नर्सरी में करीब 10 लाख सीजनल फूलों और सब्जियों के पौधे तैयार किये जाते हैं। यानी हर सीजन में अलग-अलग पौधे। इसकी वजह से नर्सरी में साल भर पौधे उगाने का काम किया जाता है। पैंजी, पेटूनिया, डीऐनथस और गजानिया सहित कई फूलों के पौधे उगाए जाते हैं। जबकि गोभी, शिमला मिर्च, ब्रोकली जैसे सब्जियों के पौधे उगाए जाते हैं, जिन्हें कई शहरों में भेजा जाता है।

सालाना 20-25 लाख रुपए की बिक्री होती है

सचिन के काम में उनकी वाइफ रूचि कोठारी भी मदद करती हैं।
सचिन के काम में उनकी वाइफ रूचि कोठारी भी मदद करती हैं।

पॉलीहाउस का पूरा सेटअप करने में सचिन की लगभग छह लाख रुपए की लागत लगी थी। शुरुआत में कुछ कठिनाइयों तो रहीं लेकिन आज सालाना 20-25 लाख रुपए के पौधे बेच देते हैं। खर्च निकालकर तकरीबन 12-14 लाख रुपए का मुनाफा हो जाता है। सचिन बताते हैं, “मैं पहाड़ों में अपने पसंद का काम कर के जितना कमा लेता हूं अमूमन शहर की नौकरी में उतना कमना आसान नहीं था और स्ट्रेस अलग लेना पड़ता था।”

सचिन ने अपने काम के जरिये कई लोगों को रोजगार भी दिया है। इनकी नर्सरी में तकरीबन 12 लोग परमानेंट काम करते हैं जबकि पीक सीजन में इन्हें जरूरत के अनुसार और भी लोगों को काम पर रखना होता है।

कोरोना के समय में सब्जियों के पौधों की मांग और भी ज्यादा बढ़ गई

कोरोना के समय जहां एक तरह हर पेशे के लोगों को नुकसान उठाना पड़ा रहा था वहीं, दूसरी तरफ नर्सरी में पौधों की डिमांड बढ़ रही थी। सचिन कहते हैं, " कोरोना के समय फूलों के पौधों का तो नुकसान हुआ है, लेकिन सब्जियों के पौधों की मांग और ज्यादा बढ़ गई है। घर में लोग टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च, लौकी तोरई जैसी सब्जियां उगाना चाहते हैं। मेरा नुकसान नहीं हुआ बल्कि मेरा काम और बढ़ा। "

दूसरे भी कर सकते हैं इस मॉडल पर काम

सचिन से इंस्पायर कई युवा शहर की नौकरी छोड़ पहाड़ों पर कई पसंदीदा काम कर रहे हैं।
सचिन से इंस्पायर कई युवा शहर की नौकरी छोड़ पहाड़ों पर कई पसंदीदा काम कर रहे हैं।

सचिन बताते हैं नर्सरी के काम में बहुत स्कोप है। फूलों और सब्जियों के अलावा फारेस्ट, एसेंस, हर्बल जैसे कई पौधों की डिमांड मार्केट में है। इस काम में पैसा और सुकून दोनों है। “मुझे लगता है युवाओं को काम मांगने के बजाय काम देने के बारे में सोचना चाहिए। मैंने भी यही किया आज मैं कई लोगों को काम देता हूं और सुकून से अपना काम करता हूं। मेरे बॉस मैं खुद ही हूं।नर्सरी के काम में आने के पहले थोड़ी ट्रेनिंग लेने की जरूरत है ताकि मेरे जैसा नुकसान किसी और का न हो। ”

सचिन पूरे साल के सिर्फ पीक सीजन में ही 9 घंटे काम करते हैं बाकी सीजन 2-4 घंटे ही उन्हें नर्सरी पर जाना होता है। ऐसे में वह अपना समय परिवार और दूसरे काम को भी दे पाते हैं।

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