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आज की पॉजिटिव खबर:पहले खारे पानी को मीठा बनाया; फिर पारंपरिक खेती छोड़ ऑर्गेनिक आलू की खेती शुरू की, तीन महीने में 1.5 लाख कमाए

सौराष्ट्र3 महीने पहले
सौराष्ट्र के गोंडल तहसील के रहने वाले तुलसी गोंडलिया ऑर्गेनिक आलू की खेती करते हैं।

डीसा आलू, गुजरात में होने वाली आलू की एक बेहतरीन वैरायटी मानी जाती है। बनासकांठा जिले का डीसा तहसील इसका हब माना जाता है। देशभर में 6% आलू का उत्पादन बनासकांठा में ही होता है, लेकिन इसी आलू को सौराष्ट्र के क्लाइमेट में उगाना किसी चैलेंज से कम नहीं है। यहां के ज्यादातर किसानों का मानना है कि डीसा आलू की खेती यहां नहीं हो सकती, क्योंकि यहां का पानी खारा है, जो आलू की खेती के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है।

लेकिन, गोंडल तहसील के रहने वाले तुलसी गोंडलिया ने अपनी मेहनत और नई तकनीक से इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। उन्होंने एक बीघा जमीन पर 12 टन आलू का उत्पादन किया है। खास बात यह है कि ये आलू पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं। इनमें कई आलू का वजन का आधा किलो से ज्यादा है।

पुजारी ने दी थी ऑर्गेनिक आलू की खेती की सलाह

तुलसी पहले पारंपरिक फसलों की खेती करते थे। दो साल पहले गोंडल स्थित अक्षरधाम मंदिर के पुजारी आरुणि भगत ने उन्हें ऑर्गेनिक तरीके से आलू की खेती करने की सलाह दी। मेरे लिए यह काम चैलेंजिंग था। मैं कुछ एक्सपर्ट्स से मिला, उनसे ऑर्गेनिक आलू उगाने की तकनीक सीखी। इसके बाद पिछले साल मैंने पहली बार एक बीघा जमीन पर आलू की खेती की। तुलसी कहते हैं कि पहले ही साल अच्छा रिस्पॉन्स मिला। महज तीन महीने में ही आलू तैयार हो गए।

तुलसी गोंडलिया ने एक बीघा जमीन पर 12 टन आलू का उत्पादन किया है। खास बात यह है कि ये आलू पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं।
तुलसी गोंडलिया ने एक बीघा जमीन पर 12 टन आलू का उत्पादन किया है। खास बात यह है कि ये आलू पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं।

खारे पानी को मीठा कैसे बनाया?

तुलसी बताते हैं कि यहां जमीन से जो पानी निकलता है, वो बहुत ही खारा होता है। अगर इस पानी को सिंचाई के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो आलू का टेस्ट खराब हो जाता है और उत्पादन भी कम होता है। इसलिए यहां के किसान आलू की खेती नहीं करते हैं। मैंने खारे पानी से निजात पाने के लिए पास के डैम के पानी को संचित करना शुरू किया। फिर बारिश के पानी को संरक्षित किया। इसके बाद उसमें गुड़ मिला दिया। इससे पानी का टेस्ट बदल गया। तुलसी इसी पानी से आलू की सिंचाई करते हैं।

35,000 रुपए में खरीदे थे बीज

तुलसी बताते हैं कि उन्होंने 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 14 क्विंटल आलू के बीज खरीदे थे। इसके लिए 35 हजार रुपए का खर्चा आया था। उन्होंने किसी तरह के केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं किया। बुआई के बाद कीड़ों से बचाने के लिए हर पंद्रह दिन पर हींग का पानी, गोमूत्र और छाछ का छिड़काव किया। सिंचाई के लिए उन्होंने टपक विधि का उपयोग किया। जिससे कम खर्च और कम वक्त में आलू तैयार हो गया। इस साल उन्हें एक बीघा की खेती से 1.5 लाख रुपए तक की कमाई होने का अनुमान है।

अक्टूबर में इसकी खेती की जाती है। बीज की बुआई से पहले उसका ट्रीटमेंट जरूरी होता है। तीन महीने बाद आलू तैयार हो जाती है।
अक्टूबर में इसकी खेती की जाती है। बीज की बुआई से पहले उसका ट्रीटमेंट जरूरी होता है। तीन महीने बाद आलू तैयार हो जाती है।

कहां करते हैं मार्केटिंग?

तुलसी ने पहली बार आलू की खेती की है। इस बार 12 टन उत्पादन हुआ है। वे कहते हैं कि ज्यादातर लोग उनके खेत से ही आलू खरीद ले जाते हैं। इसके साथ ही जो लोग चिप्स वैगरह बनाने का कारोबार करते हैं, वे लोग हमारे यहां आलू खरीदने आ रहे हैं। उनकी डिमांड बड़े-बड़े आलू की होती है। होटल व्यवसायी भी बड़े लेवल पर उनसे खरीदी कर रहे हैं।

कहां हो सकती है इसकी खेती?

तुलसी बताते हैं कि इसकी खेती वैसी जगह पर हो सकती है, जहां पानी की अच्छी उपलब्धता हो। साथ ही ये भी जरूरी है कि पानी का टेस्ट मीठा होना चाहिए। इसकी खेती के लिए भुरभुरी और मुलायम मिट्टी सबसे अच्छी होती है। बहुत ज्यादा गर्मी वाले क्षेत्रों में इसकी खेती थोड़ी मुश्किल है।

कैसे करें आलू की खेती?

तुलसी बताते हैं कि उन्होंने 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 14 क्विंटल आलू के बीज खरीदे थे। इसके लिए 35 हजार रुपए का खर्चा आया था।
तुलसी बताते हैं कि उन्होंने 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 14 क्विंटल आलू के बीज खरीदे थे। इसके लिए 35 हजार रुपए का खर्चा आया था।

अक्टूबर में इसकी खेती की जाती है। बीज की बुआई से पहले उसका ट्रीटमेंट जरूरी होता है। साफ-सुथरा और स्वच्छ बीज का ही चयन करना चाहिए। इसके बाद मिट्टी तैयार की जाती है। उसमें गोबर, गुड़ और केंचुआ खाद डाली जाती है और इन्हें मिट्टी में अच्छी तरह मिला लिया जाता है। फिर मेढ़ बनाकर आलू के बीज को अच्छी तरह ढंक दिया जाता है। बुआई के बाद हर 10 दिन पर सिंचाई की जरूरत होती है। इसके लिए ड्रिप इरिगेशन विधि जिसे टपक विधि भी कहते हैं, सबसे अच्छी मानी जाती है। तीन महीने में आलू तैयार हो जाती है।

दूसरे किसान भी ले रहे हैं ट्रेनिंग

तुलसी अब अपने गांव के दूसरे किसानों को भी खेती की ट्रेनिंग दे रहे हैं। कई किसान उनके बताए तरीके से खेती कर रहे हैं। दूधेसिया में रहने वाले अमरीश भुवा ऑर्गेनिक पद्धति से आलू की खेती करने की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वे कहते हैं कि मैंने तुलसी को खेती करते हुए देखा तो खुद भी ऐसा करने का फैसला किया। अब वक्त आ गया है कि लोगों को नई तकनीक से आलू की खेती करनी चाहिए। इससे उन्हें अच्छी कमाई हो सकती है।

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