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भास्कर ओरिजिनल:कोर्ट-कचहरी के चक्कर में हो रहे नुकसान से बचाएगा लीगल इंश्योरेंस, डॉक्टर, इंजीनियर और छोटे कारोबारियों के लिए है फायदेमंद

18 दिन पहले
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अगर आप डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या छोटे कारोबारी हैं तो आपको लीगल इंश्योरेंस किसी भी तरह की कानूनी लड़ाई में होने वाले नुकसान से बचा सकता है। यह बीमा कवर कोर्ट की पेशी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करता है। इसे 'लायबिलिटी इंश्योरेंस' भी कहा जाता है।

‘दक्ष’ नाम के एक एनजीओ ने अपने सर्वे में पाया है कि एक पेशी में जाने पर आपको औसतन 1746 रुपए का नुकसान होता है। यह रकम पेशी पर न जाकर आप अपना काम करने के दौरान कमा सकते थे। दक्ष के 'एक्सेस टू जस्टिस' नाम के सर्वे में 24 राज्यों के 300 कोर्ट के 9 हजार लोगों को शामिल किया गया।

लीगल इंश्योरेंस आपके इसी नुकसान की भरपाई करता है, लेकिन यह बीमा उन लोगों के लिए नहीं है जो आरोपी हों। इसका लाभ आप तभी उठा सकते हैं जब आप अपना बचाव करने के लिए कोर्ट की शरण में गए हों।

भारत जैसे देश में समस्या यह है कि लीगल इंश्योरेंस की जानकारी बेहद कम लोगों को है। लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्सपर्ट उमेश प्रतापा से हमने बात की और समझा कि लीगल इंश्योरेंस किसे और क्यों लेना चाहिए। इसके क्या फायदे हैं और ये क्यों जरूरी है।

बिजनेस के आकार के हिसाब से तय होती है प्रीमियम
लीगल इंश्योरेंस में आपके काम के आकार के हिसाब से प्रीमियम तय होती है। इसमें आपके काम में शामिल रिस्क या जोखिम के आधार पर भी गणना की जाती है। भारत में एचडीएफसी एर्गो कॉमर्शियल जनरल लायबिलिटी, भारती एक्सा कॉमर्शियल जनरल लायबिलिटी पॉलिसी और आईसीआईसीआई के कई लायबिलिटी इंश्योरेंस के ऑप्शन हैं।

लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्सपर्ट और कंसल्टेंट उमेश प्रतापा कहते हैं, 'लीगल इंश्योरेंस अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में बहुत प्रचलित है। यह दोनों देश ही इसके सबसे बड़े मार्केट भी हैं। भारत में भी इसे अपनाने वाले धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं, हालांकि अब भी देश के कुल जनरल इंश्योरेंस में इसका हिस्सा 2% ही है।'

'क्रिमिनल केस में नहीं मिलता लीगल कवरेज का लाभ'
उमेश प्रतापा ने बताया, 'लायबिलिटी इंश्योरेंस का लाभ सिर्फ सिविल मामलों तक सीमित है, यह क्रिमिनल मामलों का कवरेज नहीं देता। ऐसा नहीं होने पर लोग अपराध करके इसका लाभ लेना चाहेंगे। भारत में यह सामान्य लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है, हालांकि डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसे कुछ पेशेवर लोग इसका लाभ ले सकते हैं।'

विदेशों में पर्सनल लीगल इंश्योरेंस भी करवा सकते हैं
अमेरिका और कई दूसरे देशों में वो लोग भी लीगल इंश्योरेंस करा सकते हैं जिनका कोई कारोबार नहीं है। आसानी से उपलब्ध यह 'पर्सनल लीगल इंश्योरेंस' लोगों को चालान, टैक्स विवाद, दीवालिया होने या पैसे न चुका पाने, ग्राहकों से जुड़े विवाद, चोट या नुकसान से जुड़े दावे, वसीयत बनवाने और प्रॉपर्टी खरीदने के खर्च का कवरेज देता है।

इसके अलावा ये इंश्योरेंस किसी विवाद की स्थिति में कस्टमर की ओर से पेश होने के लिए वकील भी उपलब्ध कराते हैं। वहां ऐसे इंश्योरेंस करीब 9 हजार रुपए के सालाना प्रीमियम से लेकर 35 हजार रुपए के सालाना प्रीमियम में उपलब्ध हैं।

भारत में साधारण लोगों के लिए लीगल इंश्योरेंस क्यों नहीं?
भारत जैसे देश में अधिकतर विवाद जमीन जायदाद से जुड़े होते हैं। लैंड कंफ्लिक्ट वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक यहां 77 लाख लोग 25 लाख हेक्टेयर जमीन के लिए कोर्ट में लड़ रहे हैं। इनसे उन्हें तकरीबन 15 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है, लेकिन जमीन विवाद में फंसे इन लोगों के लिए लीगल या लायबिलिटी इंश्योरेंस का ऑप्शन क्यों नहीं है?

इस पर प्रतापा कहते हैं, 'भारत में लोग हेल्थ इंश्योरेंस जैसे जरूरी इंश्योरेंस नहीं कराते क्योंकि उन्हें प्रीमियम की रकम ज्यादा लगती है। ऐसे में वे लीगल इंश्योरेंस कैसे करवाएंगे, जबकि इसका प्रीमियम अन्य किसी इंश्योरेंस से ज्यादा होता है। लोग इंश्योरेंस तभी लेते हैं, जब वो या तो गाड़ियों के इंश्योरेंस की तरह अनिवार्य हो या जब यह लोगों को जरूरी और सस्ता लगे।'

भारत के सामान्य किसान परिवार की सालाना औसत आय 77 हजार रुपए है। ऐसे में उनके लिए पर्सनल लीगल इंश्योरेंस लेना महंगा सौदा साबित हो सकता है।

क्या पत्रकारों का लीगल इंश्योरेंस होना चाहिए?
'बिहाइंड बार्स: अरेस्ट एंड डिटेंशन ऑफ जर्नलिस्ट इन इंडिया 2010-20' नाम की एक स्टडी के मुताबिक पिछले सालों में पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज होने की घटनाएं और उनकी गिरफ्तारी बढ़ी है। साल 2010 से 2020 के बीच देश में 154 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से 40% पत्रकार सिर्फ 2020 में गिरफ्तार हुए।

क्या पत्रकारों के लिए भी लीगल इंश्योरेंस होना चाहिए? इस सवाल के जवाब में प्रतापा कहते हैं, 'यह एक अच्छा विचार है। इंश्योरेंस कंपनियां ऐसा करें तो अच्छा होगा, लेकिन अब भी ज्यादातर पत्रकार मीडिया कंपनियों में काम करते हैं और ये कंपनियां 'मीडिया लायबिलिटी इंश्योरेंस' के तहत अपना इंश्योरेंस करा सकती हैं।'

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