पात्रा चॉल को आबाद करने में बर्बाद हुए 672 परिवार:किसी की सड़क पर गुजर रही जिंदगी, तो कोई गहने बेच दे रहे किराया

मुंबई15 दिन पहलेलेखक: आशीष राय

शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत को 2008 के जिस आवासीय प्रोजेक्ट ‘पात्रा चॉल घोटाले’ से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया है, उसकी कहानी दर्द भरी है। सपनों का आशियाना देने का वादा करके लोगों को बेघर कर दिया गया। जिनसे जमीनें खरीदी गईं, वे सड़क पर जिंदगी गुजार रहे हैं, इनमें कई गहने बेचकर किराया चुका रहे हैं।

47 एकड़ में फैली इस कॉलोनी में 672 परिवार रहते थे। इन्हें बड़े घर और लाखों रुपए का लालच देकर बेघर किया गया था। जमीन खरीदने के बाद बिल्डर घर खाली करवाने बुलडोजर लेकर पहुंच गए और लोगों को घसीट-घसीट कर उनके घरों से बाहर निकाला।

इस पूरे मामले की पड़ताल करने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंची। यह जानने का प्रयास किया कि 14 साल बाद वहां रहने वालों की लाइफ कैसी है।

कंक्रीट का खंडहर बनता जा रहा है पात्रा चॉल का इलाका

हम जब उत्तर मुंबई के गोरेगांव में बनी सिद्धार्थनगर पात्रा चॉल पहुंचे, तो वहां फ्लैट के नाम पर सिर्फ अंडर कंस्ट्रक्शन इमारतें मिलीं। जिनकी दीवारें काई से पुती हुई थीं। इसमें लगा सरिया और सीमेंट खराब हो चुका था। हमने यहां रहने वालों को खोजना शुरू किया तो पता चला कि बिल्डर के साथ करार करने वाले 400 से ज्यादा लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनका परिवार सड़कों पर जिंदगी काटने को मजबूर है।

मुंबई के गोरेगांव में पात्रा चॉल प्रोजेक्ट के तहत बने अर्धनिर्मित मकान अब खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। दीवारों पर काई जमी है, सरियों में जंग लग गया है।
मुंबई के गोरेगांव में पात्रा चॉल प्रोजेक्ट के तहत बने अर्धनिर्मित मकान अब खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। दीवारों पर काई जमी है, सरियों में जंग लग गया है।

बहुत खोजने पर हमें 5-6 परिवार मुंबई के बाहरी इलाके में मिले। उन्होंने अपनी बदहाली की जो कहानी बताई, उसे सुन किसी का भी दिल पसीज सकता है।

कुछ लोग अपने गहने, कुछ घर का सामान और कुछ गांव की जमीन बेचकर दूसरों के घर में किराए पर रहे हैं। कुछ ऐसे भी परिवार मिले, जिनके बुजुर्ग नए घर की आस लिए इस दुनिया से चले गए। घर नहीं होने की वजह से कई लोगों की शादी नहीं हो सकी, उनकी उम्र अब ढल रही है।

हालांकि इन लोगों का कहना है कि वे अपना दुखड़ा हर राजनीतिक दल, मंत्री, नेता और अधिकारी के आगे सुना चुके हैं, लेकिन कोई उनकी मदद को आगे नहीं आया।

‘7 दिन का का वक्त दिया, लेकिन अगले ही दिन बुलडोजर से घर गिरा दिया’

70 साल की शांति पवार बताती हैं, ’हमें वादा किया गया कि 3 साल में नया फ्लैट देंगे। घर खाली करने के लिए 7 दिन का वक्त दिया, लेकिन दूसरे ही दिन बुलडोजर लेकर पहुंच गए। मेरा घर तोड़ दिया। बहुत सामान नीचे दब गया। इन्हें जब जरूरत थी तो हमसे भीख मांगी और अब हमें जरूरत है, तो हम इनके सामने हाथ फैला कर खड़े हैं।'

जिन लोगों की जमीनें पात्रा चॉल प्रोजेक्ट के तहत ली गई थीं, आज वे इन जर्जर मकानों में रहने को मजबूर हैं।
जिन लोगों की जमीनें पात्रा चॉल प्रोजेक्ट के तहत ली गई थीं, आज वे इन जर्जर मकानों में रहने को मजबूर हैं।

हालात इतने खराब हैं कि जी करता है आत्महत्या कर लें

पात्रा चॉल में पैदा हुए 48 साल के नरेश सोनावडे ने बताया, ‘पात्रा चॉल से निकलने के बाद हमें घर का सामान बेचना पड़ा। सोना बेचना पड़ा। पिछले 8 साल से किराया नहीं मिला है। मकान मालिक हमें किराए पर अपना घर नहीं देते हैं। कभी-कभी तो मन करता है कि हम पूरे परिवार के साथ कुछ कर गुजरें।'

नरेश ने आगे बताया, ’हर पार्टी के नेता और मंत्री आते-जाते रहते हैं और सिर्फ वादे और झूठे आश्वासन देते हैं। राउत की गिरफ्तारी के बाद भी कुछ बदलने वाला नहीं है। 672 में से 400 किराएदार अब तक इस दुनिया से जा चुके हैं। 30% ऐसे लोग हैं जो मुंबई छोड़ कर अपने गांव जा चुके हैं।’

पात्रा चॉल में रहने वाले पंकज दाल्वी बताते हैं, 'हम रहते थे, हैं और आगे आगे भी यहीं रहेंगे। हम किसी को यहां अपना हक मारने नहीं देंगे। हमें घर नहीं मिल रहा है, सिर्फ आश्वासन मिल रहा है।'

‘हमें अपनी ही सोसाइटी के लोगों ने धोखा दिया’

पात्रा चॉल की 9 नंबर गली में रहने वाले जोजफ ने बताया, ’12 साल से ज्यादा का समय हो गया, लेकिन कभी किसी ने कोई एक्शन नहीं लिया। हमें धोखा हमारी सोसाइटी की ओर से दिया गया। उन्होंने कहा कि आपको घर मिलेगा, पैसा मिलेगा और लाइफ अच्छी होगी, लेकिन हम बर्बाद हो चुके हैं। कोरोना में हम लोगों की हालत खराब हो गई। ढाई सौ से ज्यादा लोग केवल टेंशन से मर गए। अब हम पेट काट के अपना किराया जमा कर रहे हैं।’

‘घर न होने के कारण नहीं हो पा रही शादी’

अनिल हीरे कहते हैं कि अपना घर नहीं होने की वजह से कोई अपनी बेटी की शादी मुझसे नहीं कर रहा है।
अनिल हीरे कहते हैं कि अपना घर नहीं होने की वजह से कोई अपनी बेटी की शादी मुझसे नहीं कर रहा है।

यहीं पैदा हुए अनिल हीरे ने बताया, 'हमें 2 साल में घर देने का वादा किया गया था, लेकिन आज 14 साल हो गए और कुछ नहीं मिला। जिन्होंने इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया, वही अनशन पर बैठे हैं और वही सब घोटाले कर रहे हैं। मैं छोटे से बड़ा हो गया और आज तक घर नहीं मिला। घर नहीं होने के कारण मुझसे कोई अपनी बेटी की शादी को तैयार नहीं है।'

16 साल पहले पात्रा चॉल में बहू बनकर आईं पायल सोनावडे ने बताया, ’मुंबई के पात्रा चॉल में मेरा 5 कमरों का घर था। मेरे मां-बाप ने उसी घर को देख मेरी शादी की थी। शादी के कुछ दिन बाद ही पता चला कि यह घर टूटने वाला है।’

‘किराया देने के लिए बेचने पड़े अपने गहने’

गोरेगांव में एक किराए के मकान में रहने वाली ज्योति सावंत बताती हैं कि हमें हर महीने 40 हजार किराया देना पड़ता है। पैसे नहीं थे तो मजबूरी में अपने गहने बेचने पड़े। अब किसी के पास नौकरी नहीं है। हम लोग वहां 16-17 साल से रह रहे थे और अचानक एक दिन कोई आया और हमारी आंखों के सामने हमारे घर को तोड़ दिया। हमें तीन से 4 दिन सड़कों पर बिताने पड़े। हम अब सिर्फ देख रहे हैं कि सरकार क्या करेगी।

‘खाना खा रहे लोगों को घसीट कर उठाया और घर गिरा दिया’

सिद्धार्थ नगर की एक बस्ती में रहने वाली नम्रता बताती हैं, ’घर से निकालने के बाद हमारे पास किराया देने के लिए पैसे नहीं थे और कंडीशन लगातार खराब हो रही थी। हम लोग 2-3 दिन तक सड़क पर रहे। बिल्डर के लोग जब हमारे घरों को गिराने के लिए बुलडोजर लेकर पहुंचे तो कुछ लोग खाना खा रहे थे। उन्हें दया नहीं आई और घसीट कर लोगों को किनारे किया और उनके घरों को गिरा दिया गया।'

‘किराए के लिए 25 करोड़ देने का वादा किया गया’

MHADA की देखरेख में इस प्रोजेक्ट का काम चल रहा था। इसके तहत 672 परिवारों को घर मिलना था।
MHADA की देखरेख में इस प्रोजेक्ट का काम चल रहा था। इसके तहत 672 परिवारों को घर मिलना था।

पात्रा चॉल संघर्ष समिति से जुड़े रमाकांत थोर्वे ने बताया, ’हमारा गुरु आशीष बिल्डर और महाडा के साथ एक त्रिपक्षीय करार हुआ था। एग्रीमेंट में कहा गया था कि 672 लोगों को 650 स्क्वायर फीट का घर मिलेगा। 25 करोड़ रुपए का कॉरपस फंड मिलेगा। जिससे हमारे टेनेंट का मंथली मेंटेनेंस भरा जाएगा। यहां मंदिर समेत कई एमेनिटीज बनेंगी। 2008 में इस कॉलोनी को खाली किया गया और इसके 7 साल बाद यहां के लोगों को मिलने वाला किराया बंद हो गया।'

रमाकांत थोर्वे आगे कहते हैं कि जो ओरिजिनल टेनेंट हैं, वह बाहर हैं और बिक्री का माल बनकर तैयार हो गया है। MHADA के कुछ अधिकारी और हमारी पुरानी सोसाइटी से जुड़े कुछ लोगों ने मिलकर बिल्डर को सपोर्ट किया और इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया। बिल्डर जमीनें बेच कर निकल गया और प्रोजेक्ट जस का तस पड़ा है। संजय राउत यहां कभी नहीं आए और मीडिया जो घोटाले में उनके नाम की बात कर रही है, उसमें हमारा कोई लेना-देना नहीं, वह प्रशासन देखें।

संजय राउत के खिलाफ 4 पुख्ता सबूत

  • ED के मुताबिक, साजिश रचने के दो साल बाद 2009 में प्रवीण राउत ने अपने खाते से 55 लाख वर्षा राउत के खाते में ट्रांसफर किए। इस रकम का इस्तेमाल मुंबई में एक फ्लैट खरीदने में किया गया।
  • 2011 में, प्रवीण की फर्म प्रथमेश डेवलपर ने संजय और उनकी पत्नी से 29.50 लाख का निवेश प्राप्त किया। एक महीने के भीतर, राउत को उनके निवेश के साथ 37.50 लाख अतिरिक्त लाभ के रूप में वापस कर दिए गए। इस पैसे का इस्तेमाल गार्डन कोर्ट में फ्लैट खरीदने में किया गया।
  • गवाहों के बयान के आधार पर ED का दावा है कि वर्षा राउत के नाम पर अलीबाग में जमीन के 10 प्लॉट्स खरीदे गए और इसकी पेमेंट कैश में प्रवीण राउत की ओर से की गई।
  • 'अवनी इंफ्रास्ट्रक्चर' में राउत की पत्नी वर्षा राउत ने 5,625 रुपए का निवेश किया और उन्हें 13.95 लाख मिले थे।
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