• Hindi News
  • Db original
  • Listen In The Voice Of Harish Bhimani, How Jinnah's Insistence Put The Country On The Verge Of Partition

मैं 1947 का हिन्दुस्तान बोल रहा हूं -दूसरी कड़ी:हरीश भिमानी की आवाज में सुनिए, किस तरह जिन्ना की जिद ने देश में बंटवारे के बीज बोएं

6 दिन पहले

1 जनवरी से 15 अगस्त 1947 के बीच हिन्दुस्तान में जो भी हुआ, वह इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। 15 कहानियों की इस सीरीज की दूसरी कड़ी में आज जानिए, किस तरह जिन्ना की जिद ने देश को बंटवारे के मुहाने पर खड़ा कर दिया...मुझे याद है वो खूबसूरत लम्हा... तारीख थी- 20 फरवरी 1947, लंदन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने हाउस ऑफ काॅमन्स में घोषणा कर दी कि अंग्रेज जून 1948 से पहले हिन्दुस्तान छोड़ देंगे और सत्ता जिम्मेदार हाथों में सौंप दी जाएगी। ये सुनते ही मेरा जिस्म आजादी की खुशबू से महक उठा।

19 फरवरी 1947 की सुबह नाश्ता कर रहे वायसराय वावेल को जैसे ही लंदन से गोपनीय तार मिला तो पहले वे थोड़े गंभीर हुए, फिर मुस्कुराकर बोले- आखिर उन्होंने मुझे भगा दिया। क्योंकि नए वायसराय लुई फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकोलस माउंटबेटेन को आजादी देने का जिम्मा सौंपा गया था। उधर, मेरे करोड़ों बाशिंदों के चेहरों पर आजादी की मुस्कान बिखरी ही थी कि आंखों से खून के कतरे बह निकले। वजह थी- मोहम्मद अली जिन्ना। जी हां! यही वो शख्स था, जो बंटवारे के खंजर से मेरे जिस्म के दो टुकड़े करने पर आमादा था।

जिन्ना ने साफ-साफ कह दिया था कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान का बंटवारा चाहती है, नहीं तो यह देश ध्वस्त हो जाएगा। वहीं, लंदन में लेबर पार्टी के नुमाइंदे यह गणित बिठाने में लगे थे कि बंटवारे के जरिए किस तरह हिन्दुस्तान में नफरत का बीज बोएं कि देश में तबाही भी मच जाए और उनके दामन पर दाग भी न लगे। 10 डाउनिंग स्ट्रीट और बकिंघम पैलेस की नींद इसलिए हराम थी, क्योंकि हिन्दुस्तानी और अंग्रेज सैनिकों के बीच दरार बहुत चौड़ी हो चुकी थी।

रॉयल एयरफोर्स के अंग्रेज अफसरों ने तो विद्रोह ही कर दिया था। दरअसल, 18 फरवरी 1946 को करीब 2000 भारतीय नौसैनिकों ने बगावत कर दी थी और गोलीबारी में करीब 400 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। तभी से अंदर ही अंदर गुस्सा पनप रहा था। 1946 में ही अंग्रेजों ने तय कर लिया था कि अब हम हिंदुस्तान को आजाद कर देंगे। इसी को ध्यान में रखकर 2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार गठित हुई, जिसके मुखिया जवाहरलाल नेहरू थे।

इस अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग शामिल तो हुई थी, लेकिन 1947 आते-आते अपने कारनामों से उसने जबरदस्त अंतर्विरोध पैदा कर दिया। नतीजा यह कि फरवरी 1947 में नेहरू का धैर्य टूटा और उन्होंने मांग कर दी कि लीग के मंत्री त्यागपत्र दे दें। सरदार पटेल ने भी कड़ी चेतावनी दी कि मुस्लिम लीग के सदस्य फौरन कैबिनेट नहीं छोड़ेंगे तो कांग्रेस के सदस्य त्यागपत्र दे देंगे। हालांकि, नए वायसराय का नाम और आजादी की तारीख तय होने की घोषणा ने इस गहमागहमी को कुछ दिन शांत कर दिया था।

अगली कड़ी में गांधीजी से माउंटबेटेन के मिलने की कहानी….

सीरीज की पहली कड़ी में ​​​​​​​जानिए कैसे हिन्दुस्तान से ब्रिटेन तक उथल-पुथल मची थी…सुनने के लिए क्लिक करें

खबरें और भी हैं...