मैं 1947 का हिन्दुस्तान बोल रहा हूं- पहली कड़ी:हरीश भिमानी की आवाज में सुनिए हिन्दुस्तान से ब्रिटेन तक कैसी उथल-पुथल मची थी

6 दिन पहले

1947...जश्न और जख्म का साल। जनवरी से 15 अगस्त 1947 के बीच हिन्दुस्तान में जो भी हुआ, वह इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। 15 कहानियों की इस सीरीज की पहली कड़ी में आज जानिए, हिन्दुस्तान से ब्रिटेन तक कैसी उथल-पुथल मची थी...जी हां! मैं 1947 का हिन्दुस्तान बोल रहा हूं। और मुझे बोलना पड़ रहा है, क्योंकि जनवरी से 15 अगस्त के बीच का वो सबसे चमकदार और सबसे दागदार वक्त मुझ पर कैसे गुजरा... मैं ही जानता हूं। एक तरफ मेरा जिस्म खून की लाली में सराबोर था तो दूसरी तरफ यह होली के गुलाल में नहा रहा था।

जनवरी का वो दिन मुझे अच्छी तरह याद है। गुनगुनी धूप खिली थी...तारीख थी- 22 जनवरी 1947, दिन- बुधवार, वक्त- सुबह 11 बजे। जगह- दिल्ली। संविधान सभा कक्ष में संविधान सभा के सदस्य जुटे हुए थे। मौका था उस उद्देश्य प्रस्ताव को पास करने का, जिसे 13 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई संविधान सभा में 210 सदस्यों की उपस्थिति में पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत किया था। इसके पास होते ही हिन्दुस्तानियों की यह हुंकार अंग्रेजों सहित पूरी दुनिया ने सुन ली थी कि मैं एक पूर्ण संप्रभुता संपन्न गणराज्य बनूंगा, जो अपना संविधान खुद बनाएगा।

यह भी तय हुआ था कि मुझमें ऐसे सभी क्षेत्र शामिल होंगे, जो इस समय ब्रिटिश भारत में हैं या देशी रियासतों में हैं या इन दोनों से बाहर ऐसे क्षेत्र हैं, जो मुझमें शामिल होना चाहते हैं। एक तरफ, हर गली, हर नुक्कड़, हर घर में हर जुबान पर आजादी के जश्नभरे नग्मे गुनगुना रहे थे। वहीं, हैदराबाद और कश्मीर जैसी कुछ रियासतें ऐसी भी थीं, जिन्हें खुद की आजादी खतरे में नजर आ रही थी और वे बगावती तेवर इख्तियार कर रही थीं। उधर, लंदन वालों को जनवरी की वह ठंड कुछ ज्यादा ही कटीली लग रही थी।

गजब की ठिठुरन के बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने माउंटबेटेन को अपने निवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट में बुलाकर बता दिया था कि वे वायसराय बनाकर हिन्दुस्तान भेजे जा रहे हैं और उन्हें उसकी आजादी की राह को आसान बनाने का काम करना है। जनवरी के इन दिनों में जब पूरी दुनिया नए साल का जश्न मना रही थी, तो बापू नोआखाली के श्रीरामपुर में थे। वे दुखी थे कि जब हम आजादी के इतने करीब पहुंच गए हैं, तब हम खुद को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक रहे हैं।

मुझे याद है 16 अगस्त 1946 का वो मनहूस वक्त जब मोहम्मद अली जिन्ना ने 'डायरेक्ट एक्शन' की घोषणा की थी और उनके इस एलान के बाद संयुक्त बंगाल में दंगे शुरू हो गए थे। इसमें मेरे 5 हजार से ज्यादा सपूतों की जान चली गई। घायलों का तो सही आंकड़ा तक नहीं मिल पाया।

कल सुनिए: कैसे विभाजन पर अड़ गए थे जिन्ना

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