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खुद्दार कहानीबाइक और मोबाइल रिपेयरिंग करती हैं आदिवासी लड़कियां:लड़के ताने मारते थे तुम्हारे हाथ बेलन-चूड़ी सजेगा; राष्ट्रपति कर चुके हैं सम्मानित

2 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

“मर्दों को लगता है कि लड़कियों के हाथ सिर्फ चूड़ियां पहनने, मेहंदी लगाने, चूल्हा-चौका करने और चौखट के भीतर दो वक्त की रोटियां बेलने के लिए ही हैं। हम अब इस सोच को तोड़ रहे हैं, चुनौती दे रहे हैं।”

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक की रहने वाली कोरकू आदिवासी समुदाय की गायत्री और मंटू ये बातें कह रही हैं। सांवली खेड़ा गांव की गायत्री कासडे और काला आम खुर्द की मंटू कासीर मोटर साइकिल रिपेयरिंग का गैराज चलाती हैं।

यह इलाका खंडवा से करीब 50 किलोमीटर दूर है। इस ब्लॉक में 145 आदिवासी गांव हैं। जंगल और पहाड़ के बीच उपजाऊ जमीनें। खेतों में चना, बाजरा, गेहूं की फसल, लेकिन गांव गरीबी की चादर ओढ़े।

सुबह के करीब 10 बज रहे हैं। गायत्री और मंटू अपनी गैराज पर हैं। मेहंदी लगे हाथों में चूड़ियां खनक रही हैं और दोनों प्लास, पेचकस, रिंच जैसे औजार के साथ एक मोटर साइकिल के नट-बोल्ट खोलने में लगी हैं।

मंटू और गायत्री मोटर साइकिल की सर्विसिंग कर रही हैं।
मंटू और गायत्री मोटर साइकिल की सर्विसिंग कर रही हैं।

गायत्री पहिए के रिंग पर जैसे ही हथौड़ा मारती हैं, उनकी नजर मुझ पर पड़ती है। मानो आत्मविश्वास के साथ कहना चाह रही हों, देखो जिस काम को मर्द करते हैं, उसे हम भी कर सकते हैं।

मैं मोटर साइकिल के पास ही बैठ जाता हूं। बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता है। गायत्री कहती हैं, जब हमने गैराज खोला तो गांव के लोगों ने कहना शुरू किया, ‘लड़कियों के हाथ में बेलन ही अच्छे लगते हैं। चली हो गैराज खोलने, गाड़ी के नट-बोल्ट तो खोल नहीं पाओगी। नकली मैकेनिक।’

इसके बावजूद दोनों ने ठान लिया था कि हमें कुछ तो नया करना है।

इतने में मंटू सर्विसिंग के काम को थोड़ा विराम देते हुए बोल पड़ती हैं- जब लड़कियां हवाई-जहाज उड़ा सकती हैं, ट्रेन चला सकती हैं, घर चला सकती हैं, बच्चों को पाल सकती हैं, बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर सकती हैं, तो फिर हम अपने गांव में गैराज क्यों नहीं चला सकते हैं?

अब हम अपने पैरों पर खड़े हैं। हमारे परिवार को किसी पर आश्रित नहीं होना पड़ रहा है। कहीं पलायन भी नहीं करना पड़ रहा है।

ये बातें सुनकर पलायन का दंश गायत्री की आंखों को नम कर देता है। वो बोल पड़ती हैं- हम लोग आदिवासी परिवार से आते हैं। हर कोई मजदूरी करने के लिए बरसों तक घर से दूर रहता है। दूसरे राज्यों में कम दिहाड़ी पर मजदूरी करनी पड़ती है। मालिक बंधक भी बना लेता है।

सबसे ज्यादा तकलीफ तो हम लड़कियों को रहने, नहाने में होती है। एक तो मर्दों के बीच रहना पड़ता है। और दूसरा, वो पर्दा नहीं होता है यानी कोई बाथरूम नहीं जहां हम नहा भी पाएं।

कपड़े पहने हुए ही खुले में नहाना और फिर कमरे में जाकर चादर की आड़ में कपड़े बदलना। एक दिन की बात हो, तो बर्दाश्त की जा सकती है, लेकिन महीने-छह महीने कौन सह सकता है?

गायत्री अपने बाल को सहेजते हुए कहती हैं- शहर से दूर होने की वजह से हमारे इलाके के घरों में दो वक्त का खाना हो न हो, लेकिन बाइक हर घर में जरूर है।
गायत्री अपने बाल को सहेजते हुए कहती हैं- शहर से दूर होने की वजह से हमारे इलाके के घरों में दो वक्त का खाना हो न हो, लेकिन बाइक हर घर में जरूर है।

फिर वो मुझ से सवाल करती हैं, और जवाब भी देती हैं- आप शहर होते हुए आए हैं न? बाइक का थोक में जमावड़ा दिखा ही होगा।

गायत्री सच ही कह रही हैं। वाकई में, जब मैं खंडवा से खालवा आदिवासी इलाके की तरफ रुख कर रहा था, तब सब्जी मंडी की तरह बाइक के शो रूम दिखाई दिए। सड़क किनारे कुछ-कुछ दूरी पर अलग-अलग कंपनियों के शो रूम मौजूद हैं। दूरियों की वजह से यहां के लोग कहीं आने-जाने के लिए बाइक पर ही निर्भर हैं।

गायत्री अपने पलायन की पीड़ा को कहते-कहते रुक जाती हैं।

इतने में मंटू बोल पड़ती हैं, मुझे तो दूसरे राज्यों में काम करने के लिए नहीं जाना पड़ा, लेकिन शहर के ही बड़े-बाबूओं के यहां शोषण का शिकार हुई। हर रोज 14-14 घंटे काम करना पड़ता था। मजदूरी मांगने पर बोला जाता- कल ले लेना, आज नहीं है। ऐसा हर दिन ही होता।

लॉकडाउन में जब हम लड़कियां गांव लौटे, तब कुछ ने गैराज खोलने का फैसला किया तो कुछ ने मोबाइल रिपयेरिंग और पशु सखी (बकरियों का इलाज करना) का काम।

ये गायत्री के पिता शिवराम कास्ते हैं, जो हमारी बातचीत के बीच मोटर साइकिल लिए गैराज पर आ जाते हैं।
ये गायत्री के पिता शिवराम कास्ते हैं, जो हमारी बातचीत के बीच मोटर साइकिल लिए गैराज पर आ जाते हैं।

वो हल्की मुस्कान के साथ ठसक आवाज में बोलते हैं, लोग तो ताने मार सकते हैं, लेकिन हमारे घर तो नहीं चला सकते हैं न? बेटियां काम करके ही पैसे कमा रही हैं न, चोरी तो नहीं कर रहीं, डाका तो नहीं डाल रहीं।

हम लोगों ने सालों तक दूसरे राज्यों में रहकर दिहाड़ी-मजदूरी की है। आज भी हमारे गांव के दर्जनों लोग पलायन कर रहे हैं।

गायत्री और मंटू मोटर साइकिल की सर्विसिंग में व्यस्त हो जाती हैं और अब हमारा अगला पड़ाव होता है जामधड़, यहां से करीब 16 किलोमीटर दूर।

रास्ते में सैकड़ों झोपड़ीनुमा घर और बकरियों-मवेशियों के झुंड। इस इलाके में शेड्यूल कास्ट परिवार सबसे ज्यादा रहते हैं।

आसमानी ब्लू साड़ी में साकिया और लाल कुर्ती में सती हैं।
आसमानी ब्लू साड़ी में साकिया और लाल कुर्ती में सती हैं।

साकिया और सती बरधाया दोनों बहने हैं। एक BA कर रही है, जबकि दूसरी MA । दोनों बहनों को भी मोटर साइकिल रिपेयरिंग का काम आता है। सती कहती हैं, पढ़ाई करने के लिए गांव से शहर जाना पड़ता है। इसलिए अधिकांश लड़कियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है।

हम पढ़ाई के साथ-साथ ब्यूटी-पार्लर, श्रृंगार शॉप और रिपेयरिंग का भी काम करते हैं। गांव में इतनी सुविधाएं नहीं हैं कि लड़कियां सज-संवर सकें, लोग मोटर साइकिल में कोई खराबी होने पर बनवा सकें।

गांव में रोजगार के साधन नहीं हैं, तो लोगों को शहरों या दूसरे जिलों-राज्यों में दिहाड़ी करने के लिए जाना पड़ता है। आमदनी के लिए हम लोग सबसे ज्यादा बकरी पालन करते हैं, क्योंकि इसमें खर्च कम आता है। गांव में 500 से ज्यादा बकरियां हैं।

सती की बहन साकिया आसमानी ब्लू रंग की साड़ी पहनी हुई हैं। वो गांव में किसी के यहां बकरी का इलाज करने के लिए जा रही हैं। बताती हैं, पहले हम लोग भी मनरेगा में काम करते थे। सिर पर टोकरी लादकर भरी दोपहरी में कोसों चलना पड़ता था। कम पैसों में मजदूरी करती थी।

अब मैं पशु सखी हूं। गांव में किसी की बकरी बीमार पड़ती है, तो लोग मुझे बुलाने के लिए आते हैं। हमें ‘गॉट ट्रस्ट’ संस्था से ट्रेनिंग का सर्टिफिकेट मिला हुआ है।

गांव के लड़कों को हमारे काम से परेशानी भी होती है। वो कहते हैं, ‘अरे! लड़की होकर गांव में दूसरों के दरवाजे पर घूमती है। शर्म नहीं आती, कोई शादी भी नहीं करेगा।’

साकिया बातचीत के बाद बकरी के इलाज के लिए गांव में निकल जाती है
साकिया बातचीत के बाद बकरी के इलाज के लिए गांव में निकल जाती है

इधर सती एक लड़की को सजाने-संवारने में जुट जाती हैं और मैं यहां से 22 किलोमीटर दूर मामाडोह गांव की तरफ निकल पड़ता हूं।

गोंड आदिवासी समुदाय की अंकिता अमीन उइके अपनी दुकान पर मोबाइल रिपेयरिंग और साइकिल बनाने का काम कर रही हैं।

वो कहती हैं, लॉकडाउन की वजह से पढ़ाई छूट गई। मैंने दो महीने पहले ये काम शुरू किया है। अब घर के हालात भी अच्छे हो रहे हैं और मैं पढ़ भी रही हूं। घर वालों को पैसों के लिए किसी बाबू-भइया के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता है।

इन बातों को घर के बरामदे में बैठे अंकिता के पिता सुनकर मुस्कुराने लगते हैं। ये मुस्कुराहट तसल्ली भरी दिखाई देती है। अंकिता को एक दिन पहले कोई मोबाइल बनाने के लिए दे गया है। वो इसकी रिपेयरिंग करने में व्यस्त हो जाती हैं।

अंकिता मोबाइल रिपेयरिंग का काम करती हैं। साथ में वो श्रृंगार का सामान भी बेचती हैं।
अंकिता मोबाइल रिपेयरिंग का काम करती हैं। साथ में वो श्रृंगार का सामान भी बेचती हैं।

अंकिता से बातचीत के बाद अब मेरा आखिरी पड़ाव होता है यहां से 50 किलोमीटर दूर मेहलू गांव।

रास्ते हिमाचल की तरह दिखाई पड़ते हैं। दोनों तरफ सिर्फ सागवान के पेड़। ऊंचे-ऊंचे पहाड़। गांव पहुंचने पर हमारी मुलाकात मोनू उइके से होती है, ये पेट्रोल बेचने का काम करती हैं। उम्र 18 साल, लेकिन बिजनेस की जबरदस्त समझ।

रास्ते में जब मैं जा रहा था, तो 100 किलोमीटर के रेंज में मात्र एक पेट्रोल पंप दिखाई दिया। मोनू के यहां पहुंचने पर उधर से एक मोटर साइकिल वाला पेट्रोल खत्म हो जाने की वजह से मोटर साइकिल को धक्का देते हुए मोनू की दुकान तक ला रहा है।

ये मोनू हैं, जो मोटर साइकिल रिपेयरिंग के साथ-साथ पेट्रोल भी बेचती हैं।
ये मोनू हैं, जो मोटर साइकिल रिपेयरिंग के साथ-साथ पेट्रोल भी बेचती हैं।

मोनू कहती हैं, इलाके में लोगों के पास बड़ी संख्या में मोटर साइकिल तो है, लेकिन पेट्रोल भरवाने के साधन नहीं। लोगों को गैलन में पेट्रोल भरकर रखना पड़ता है। इसलिए हमने ये काम शुरू किया है। जरूरत पड़ने पर रिपेयरिंग का काम भी कर लेती हूं। अब इलाके के लोग हमसे आकर खुदरा में पेट्रोल भी खरीद रहे हैं और मोटर साइकिल के किसी पार्ट में खराबी होने पर उसे बनवाते भी हैं।

अब तक मैं करीब 200 किलोमीटर की यात्रा कर चुका हूं। सुबह से शाम हो गई है। खंडवा की तरफ लौटना पड़ता है। हमारे साथ खालवा ब्लॉक में अलग-अलग सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली संस्था ‘स्पंदन’ की डायरेक्टर सीमा प्रकाश हैं, जिन्होंने इन लड़कियों से मिलवाने में मदद की।

इसी NGO ने लॉकडाउन के बाद लौटी लड़कियों को मोबाइल और मोटर साइकिल रिपेयरिंग की ट्रेनिंग दी है। लड़कियों को पलायन करने से रोका है। सीमा कहती हैं, आदिवासी लोगों के पास रोजगार और पढ़ाई का कोई साधन नहीं हैं। लड़कियों को भी दूसरे राज्यों में जाकर काम करना पड़ता है। भूखा पेट क्या नहीं करवाता…

इसलिए हम लोग जब अलग-अलग गांव का दौरा कर रहे थे, तो इन लड़कियों की तकलीफ देख इन्हें ट्रेनिंग देने का फैसला किया।

सीमा प्रकाश को 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रानी लक्ष्मीबाई 2014 अवॉर्ड से नवाजा था।
सीमा प्रकाश को 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रानी लक्ष्मीबाई 2014 अवॉर्ड से नवाजा था।

फिर मोबाइल और मोटर साइकिल रिपेयरिंग की ट्रेनिंग ही क्यों?

अब ये मेरा सवाल था।

सीमा तल्ख आवाज में कहती हैं, क्या लड़कियां सिर्फ सिलाई और ब्यूटी पार्लर का ही काम कर सकती हैं? हमने इसी सोच को बदलने की कोशिश की है। इन लड़कियों ने मोबाइल रिपेयरिंग और मोटर साइकिल रिपेयरिंग की ही ट्रेनिंग लेने की इच्छा जताई, तो फिर हम इनके मनोबल को कैसे तोड़ सकते थे।

‘स्पंदन’ पिछले 25 साल से TATA के सपोर्ट से मध्य प्रदेश के कई जिलों में आदिवासी, पिछड़े तबकों के लिए काम कर रही है।

अंत में मैं इन लड़कियों की एक बात को अपने साथ लेकर खंडवा से भोपाल के लिए लौट जाता हूं। सभी ने यही कहा, “एक बार हम लड़कियों पर भरोसा करके तो देखो, हम सब कुछ कर सकते हैं! हम कर्मयोगिनी हैं।”

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