पॉजिटिव खबर:केले के पेड़ में लकड़ी नहीं तो क्या, बुरहानपुर के मेहुल ने इनके तनों से धागे निकालने की फैक्ट्री लगाई; 30 लाख सालाना कमाई

एमपी के बुरहानपुर से5 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

केले के बेकार तनों के ढेर को आपने जरूर देखा होगा। अगर आपसे कहा जाए कि ये तने बेकार नहीं है, इनसे लाखों का कारोबार खड़ा किया जा सकता है तो आपको थोड़ा अजीब लगेगा। शायद यकीन नहीं होगा। हमें भी कुछ ऐसा ही लगा। इसलिए इसकी पड़ताल करने पहुंच गए बुरहानपुर। वही बुरहानपुर जो मध्य प्रदेश के 'बनाना शहर' के रूप में फेमस है।

भोपाल से करीब 340 किलोमीटर दूर स्थित बुरहानपुर शहर से 5-7 किलोमीटर भीतर गांवों की ओर बढ़ने पर दोनों तरफ सिर्फ केले के खेत ही नजर आते हैं। जिले की करीब 22 हजार हेक्टेयर जमीन पर केले की खेती होती है।

सुबह 10 बजे का वक्त है। कैलाश कुशवाहा और दिलीप कुशवाहा हाथ में धारदार बक्खी (हसुआ जैसा काटने वाला औजार) लिए केले के तने काट रहे हैं। ये वो तने हैं जिससे केला काटा जा चुका है। इन तने को काटकर कैलाश-दिलीप खेत के बीचो-बीच बने एक मेढ़ पर इकट्ठा करते हैं और फिर मेहुल श्रॉफ अपने लोगों को भेजकर इन तनों को अपनी यूनिट में मंगवा लेते हैं।

मेहूल ने MBA किया है, लेकिन कहीं नौकरी के लिए अप्लाई नहीं किया। वे पिछले चार साल से केले के बेकार तनों से फाइबर तैयार करने का काम कर रहे हैं।
मेहूल ने MBA किया है, लेकिन कहीं नौकरी के लिए अप्लाई नहीं किया। वे पिछले चार साल से केले के बेकार तनों से फाइबर तैयार करने का काम कर रहे हैं।

पहले पैसे देकर हटवाने पड़ते थे खेतों से केले के बेकार तने

दरअसल, बुरहानपुर के मेहुल श्रॉफ केले के तने से फाइबर बनाते हैं, इसे Banana Fiber कहते है। इस इलाके के किसान जब अपना फसल काट लेते हैं तो मेहुल को इंफॉर्म करते हैं। मेहुल इन खेतों से ट्रैक्टर पर केले के तने को लादकर अपने यूनिट तक ले आते हैं।

भाऊलाल कुशवाहा साल 2000 से केले की खेती कर रहे हैं। वो कहते हैं, पहले केला काटने के बाद मजदूरों से केले के तनों को हटवाना पड़ता था। इसे या तो किसी गड्ढे में डंप करवाता था या सड़ने के लिए फेंक देता था। 3 रुपए प्रति केले के तने की कटाई के हिसाब से मजदूरी देनी होती थी। लेकिन, अब मुझे ऐसा नहीं करना पड़ता है।

साल 2018 से मेहुल श्रॉफ Banana Fiber बना रहे हैं। वो अपने आइडिया को लेकर बताते हैं, परिवार का ज्वेलरी बिजनेस है। पुणे से मार्केटिंग में MBA करने के दौरान ही मन बना लिया था कि मुझे फैमिली बिजनेस नहीं करना है। रिसर्च में काफी दिलचस्पी थी। 2016 में पढ़ाई कंप्लीट होने के बाद कुछ साल रिसर्च की कि मैं क्या कर सकता हूं?

मेहुल ने तिरुचिरापल्ली में Banana Fibre बनाने की ट्रेनिंग ली

मेहुल ने कई एंटरप्रेन्योर से मुलाकात की। वो कहते हैं, जब मैं अलग-अलग इंडस्ट्री को लेकर रिसर्च कर रहा था तो देखा कि बनाना फ्रूट पर तो काम हुआ है, लेकिन इसके तने को लेकर हमने अभी उतना एक्सप्लोर नहीं किया है। पढ़े-लिखे लोग एग्री सेक्टर में आना भी नहीं चाहते हैं।

मेरे शहर में केले की खेती सबसे ज्यादा होती है। एक बार गुजरात की नवसारी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की टीम शहर आई थी, उन्होंने Banana Fiber को लेकर और अधिक जानकारी दी।

मेहुल इस आइडिया के पीछे का एक और किस्सा भी बताते हैं। कहते हैं, शहर के तत्कालीन डीएम से मैंने मुलाकात की थी। उनसे कहा कि कुछ अपना अलग स्टार्टअप शुरू करना चाहता हूं। उन्होंने सुझाव दिया- अपने जिले में मैं क्या-क्या कर सकता हूं? इस पर स्टडी करूं…। यहां से मैंने Banana Fiber बनाने का प्लान तैयार किया।

मेहुल कहते हैं, मार्केट मॉडल और इसके पीछे की पूरी कहानी समझने के लिए तिरुचिरापल्ली के नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर बनाना से ट्रेनिंग ली, जो पहले से Banana Fruit और स्टेम यानी केले के तने पर काम कर रहे थे। साउथ इंडिया में इस पर ज्यादा काम हो रहा है। जो लोग पहले से Banana Fiber यूनिट चला रहे थे, उनसे भी पूरे काम को समझा।

आइडिया को एक्जीक्यूट करना मेहुल के लिए मुश्किल था क्योंकि यह मार्केट किसानों पर टिका हुआ है। मेहुल शुरुआत की एक बात बताते हैं। कहते हैं, जब यूनिट सेटअप किया और किसानों को इसके बारे में बताया तो उनका कहना था कि उन्हें भी इसके बदले कुछ पेमेंट मिलना चाहिए। अभी भी ये दिक्कतें आती है।

हमने उन्हें समझाया कि फ्री ऑफ कॉस्ट वो उनके खेतों का कचड़ा साफ कर रहे हैं। यदि वो पेमेंट करेंगे तो फाइबर का कॉस्ट और ज्यादा हो जाएगा। प्लास्टिक को रिप्लेस करने के लिए फाइबर से बने प्रोडक्ट की कीमत कम होनी चाहिए, ताकि सभी लोग खरीद पाएं।

केले के तने को लेकर मेहुल एक और दिलचस्प बात बताते हैं। कहते हैं, केला का तना जितना कच्चा होगा, फाइबर की क्वालिटी उतनी अच्छी होती है। वो मुलायम अधिक होता है। जब आंधी-तूफान में केले की फसल को नुकसान होता है तो उन्हें इसका फायदा मिलता है।

जिन इलाकों में केले की खेती होती है, वहां यूनिट लगाना फायदेमंद

मेहुल के Banana Fiber यूनिट के एक कोने में लगे मशीन पर नर्सिंग काम कर रहे हैं। वो इस मशीन में केले के तने के हिस्से को डालते हैं और फिर वह हिस्सा रेशा यानी फाइबर बनकर बाहर निकल आता है। दरअसल, यह रास्पाडोर एक्सट्रैक्टर मशीन है। इसकी कीमत 1 लाख रुपए के करीब है।

मेहुल के मुताबिक इसकी यूनिट वहीं पर लगाई जा सकती है जिन इलाकों में केले की उपज ज्यादा होती हो। वो कहते हैं, यदि किसी इलाके में यूनिट है और केले की उपज नहीं है तो यह स्टार्टअप मुश्किल है।

नर्सिंग जो भींगे रेशे मशीन से तैयार कर रहे हैं, उसे वैशाली उठाकर बंधे लोहे के तार पर सुखाती हैं। कुछ घंटे बाद वो इसे उलट-पलट करती हैं और शाम तक इसे उतारकर, बांधकर यूनिट के भीतर ले आती हैं। वो कहती हैं, धूप यदि कड़क हो तो 6 घंटे में रेशा सुख जाता है।

खेत से केले के तने लाने और फिर अपने यूनिट में इससे फाइबर बनाने के प्रोसेस को लेकर मेहुल बताते हैं- जब किसान केले के फल की कटाई कर लेते हैं तो हम केले के तने को ट्रांसपोर्ट कर यूनिट में ले आते हैं। उसके ऊपरी हिस्से को साफ करने के बाद तने को छिला जाता है यानी अलग-अलग कर दिया जाता है।

मेहुल हर महीने 3 से 5 टन तैयार करते हैं Banana Fibre

इसे कुछ घंटो के लिए धूप में रखा जाता है। फिर मशीन से रेशे और लिक्विड को अलग-अलग कर दिया जाता है। जब लिक्विड अलग हो जाता है तो यह भीगे हुए धागे की तरह होता है। इसे सुखाने के बाद सफाई की जाती है। फिर फ्रेश फाइबर तैयार हो जाता है। इंडस्ट्री को सप्लाई करने के लिए बड़े लंबे आकार में गठरी की तरह बांधा जाता है।

एक केले के तने से 100 ग्राम फाइबर तैयार होता है यानी 10 केले के तने से एक किलो फाइबर बनता है। Banana Fiber यूनिट को सेट करने के लिए शुरुआत में करीब 3 लाख रुपए की जरूरत होती है।

मेहुल हर महीने 3 से 5 टन यानी 30 क्विंटल से 50 क्विंटल तक फाइबर तैयार कर रहे हैं और सालाना 30 लाख का टर्नओवर कर रहे हैं। वो इन फाइबर्स को उन घरेलू महिलाओं को भी सप्लाई करते हैं जो हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट बनाती हैं। इससे घरों की सजावट के लिए प्लांटेड डिब्बा, रस्सी, बैग, पूजा घर के लिए झाड़ू, योग करने वाली चटाई, पूजा करने वाली चटाई, वॉल घड़ी आदी प्रोडक्ट्स बनाए जाते हैं।

फाइबर के टाइप को लेकर मेहुल बताते हैं, जो मोटे फाइबर होते हैं वो पेपर इंडस्ट्री को जाता है। फ्रेश और पतले फाइबर को हम सैनिटरी नैपकिन, टेक्सटाइल इंडस्ट्री, मैट इंडस्ट्री को सप्लाई करते हैं।

गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में करते हैं Banana Fibre की सप्लाई

कपड़ों में 10 से 15% ही Banana Fiber का इस्तेमाल होता है। क्योंकि, कॉटन के मुकाबले यह थोड़ा भारी होता है। अभी गुजरात, महाराष्ट्र और साउथ में फाइबर की सप्लाई कर रहे हैं। Banana Fiber का मार्केट कॉस्ट 100 से 120 रुपए प्रति किलो है। ऐसे में जो घरेलू प्रोडक्ट्स बनते हैं उनका कॉस्ट 500 से 2,000 रुपए तक का आता है।

6 महिला और 4 पुरुष समेत कुल 10 लोगों को मेहुल डायरेक्ट जॉब दे रहे हैं, जबकि 50 से 70 महिलाएं हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट बनाकर हर महीने 4,000 रुपए तक की कमाई कर रही हैं। इनके प्रोडक्ट्स की मार्केट सप्लाई मेहुल ही करते हैं।

मेहुल अब बनाना स्टेम से फर्टिलाइजर बनाने को लेकर काम कर रहे हैं। उनके साथ कोर टीम में 4 लोग काम कर रहे हैं, जो पूरे बिजनेस की ब्रांडिंग से लेकर मार्केटिंग तक का काम संभालते हैं।