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एकनाथ शिंदे का 25% काम ही पूरा:शिवसेना के सिंबल पर कब्जे के लिए 3 बड़े चैलेंज बाकी, जानिए चुनाव आयोग कैसे तय करेगा

5 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी/नीरज सिंह

एकनाथ शिंदे ने डिप्टी स्पीकर और राज्यपाल को एक चिट्ठी भेजी है। इसमें शिवसेना के 37 विधायकों के समर्थन से खुद को विधायक दल का नेता बताया है। शिवसेना के तीन अन्य विधायक शिंदे खेमे में शामिल होने के लिए गुवाहाटी पहुंच रहे हैं।

मौजूदा हालात साफ तौर पर इशारा कर रहे हैं कि शिंदे खेमे की नजर अब शिवसेना के पार्टी सिंबल 'तीर और कमान' पर है। फिलहाल शिंदे का 25% काम ही पूरा हुआ है।

भास्कर एक्सप्लेनर में 8 सवालों के जवाब से जानते हैं कि शिवसेना के सिंबल पर कब्जे के लिए शिंदे खेमे को अभी क्या-क्या करना पड़ेगा?

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सवाल-1: पार्टी सिंबल पर दावा ठोकने के लिए किसके पास जाना होगा?

राजनीतिक पार्टियों में बंटवारे की दो स्थितियां हैं। पहली- जब विधानसभा सत्र चल रहा हो। इस स्थिति में निर्णय लेने का अधिकार विधानसभा स्पीकर के पास होता है। ऐसे में दल-बदल कानून भी लागू होता है।

दूसरी- जब विधानसभा सत्र नहीं चल रहा हो। जैसे फिलहाल महाराष्ट्र के हालात हैं। दूसरी स्थिति में अगर किसी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी में कोई फूट होती है, तो चुनाव आयोग फैसला करता है कि असली पार्टी किसकी है। चुनाव आयोग को ये अधिकार द इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 के पैराग्राफ 15 से मिलता है।

सवाल-2: चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि पार्टी सिंबल किसे देना चाहिए?

चुनाव आयोग में किसी भी पार्टी में विवाद का मामला पहुंचने के बाद उसके वर्टिकल बंटवारे की जांच की जाती है। इसमें विधायिका और संगठन दोनों देखे जाते हैं। इसके अलावा चुनाव आयोग बंटवारे से पहले पार्टी की टॉप कमेटियों और डिसीजन मेकिंग बॉडी की लिस्ट निकालता है। इससे ये जानने की कोशिश करता है कि इसमें से कितने मेंबर्स या पदाधिकारी किस गुट में हैं। इसके अलावा किस गुट में कितने सांसद और विधायक हैं।

ज्यादातर मामलों में आयोग ने पार्टी के पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन के आधार पर सिंबल देने का फैसला दिया है, लेकिन अगर किसी वजह से यह ऑर्गेनाइजेशन के अंदर समर्थन को सही तरीके से जस्टिफाई नहीं कर पाता, तो आयोग पूरी तरह से पार्टी के सांसदों और विधायकों के बहुमत के आधार पर फैसला करता है।

उद्धव की वजह से शिवसेना में बगावत पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी उद्धव के रवैये से नाराज होकर राज ठाकरे और नारायण राणे ने पार्टी का दामन छोड़ दिया था...पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट

1987 में एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद AIADMK के विभाजन के समय आयोग को एक अलग ही चुनौती का सामना करना पड़ा था। उस समय एमजीआर की पत्नी जानकी को पार्टी के अधिकांश विधायकों और सांसदों का समर्थन था, लेकिन उनकी शिष्य जे जयललिता को पार्टी के अन्य मेंबर्स और कैडर का भारी समर्थन था। हालांकि, दोनों गुटों में समझौता होने के चलते चुनाव आयोग को इस चुनौती से राहत मिल गई थी। इस तस्वीर में जयललिता, एमजीआर और जानकी हैं।
1987 में एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद AIADMK के विभाजन के समय आयोग को एक अलग ही चुनौती का सामना करना पड़ा था। उस समय एमजीआर की पत्नी जानकी को पार्टी के अधिकांश विधायकों और सांसदों का समर्थन था, लेकिन उनकी शिष्य जे जयललिता को पार्टी के अन्य मेंबर्स और कैडर का भारी समर्थन था। हालांकि, दोनों गुटों में समझौता होने के चलते चुनाव आयोग को इस चुनौती से राहत मिल गई थी। इस तस्वीर में जयललिता, एमजीआर और जानकी हैं।

सवाल-3: एकनाथ शिंदे का पार्टी सिंबल पर दावा कितना मजबूत?

एकनाथ शिंदे के पास फिलहाल शिवसेना के 40 विधायकों का समर्थन है। इसके अलावा कुछ सांसदों के भी शिंदे को समर्थन देने की खबरे हैं। ठाणे जिले के करीब 40 कॉर्पोरेटर भी शिंदे के साथ बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद अभी सिर्फ 25% काम ही पूरा हुआ है।

सवाल-4: एकनाथ शिंदे को पार्टी सिंबल पाने के लिए अभी क्या-क्या करना पड़ेगा?

शिवसेना का पार्टी सिंबल पाने के लिए शिंदे को विधायकों के अलावा पार्टी लीडर्स, डिप्टी लीडर्स, सेक्रेटरी, स्पोक्स पर्सन, लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद, MLC, मेयर और डिप्टी मेयर का समर्थन लेना होगा। इसके अलावा संगठन में युवा सेना, महिला अघाड़ी, भारतीय कामगार सेना जैसे पार्टी के मोर्चों का भी समर्थन चाहिए। पार्टी सिंबल पाने के लिए शिंदे के पास ये समर्थन आधे से ज्यादा लोगों का होना चाहिए। फिलहाल संगठन और विधायिका में इनकी संख्या कितनी है, नीचे ग्राफिक्स में देख सकते हैं…

सवाल-5: अगर उद्धव और शिंदे दोनों खेमे वर्टिकल मेजॉरिटी साबित नहीं कर पाए, तो क्या होगा?

अगर चुनाव आयोग को लगता है कि किसी पार्टी के पास बहुमत नहीं है। यानी दोनों गुटों को विधायकों और सांसदों का बराबर का समर्थन है या मेजॉरिटी क्लियर नहीं है तो ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पार्टी के सिंबल को फ्रीज कर सकता है। साथ दोनों गुटों को नए नामों के साथ रजिस्टर करने या पार्टी के मौजूदा नामों को जोड़ने की अनुमति दे सकता है।

सवाल-6: चुनाव आयोग में मामला जाने के बाद पार्टी सिंबल पर कितने दिनों में फैसला आ सकता है?

चुनाव आयोग को ऐसे मामलों में पेश फैक्ट्स, दस्तावेज और हालात की स्टडी करने में समय लग सकता है। चुनाव आयोग से फैसले की कोई समय-सीमा नहीं है। हालांकि, चुनाव होने की स्थिति में आयोग पार्टी के सिंबल को फ्रीज कर सकता है। साथ ही दोनों गुटों को अलग-अलग नामों और अस्थायी सिंबल पर चुनाव लड़ने की सलाह दे सकता है।

सवाल-7: भविष्य में शिंदे और उद्धव के बीच सुलह हो जाती है, तो पार्टी सिंबल की अपील का क्या होगा?

यदि दोनों गुटों में सुलह हो जाती है तो वे फिर से चुनाव आयोग से संपर्क कर सकते हैं। साथ ही एक पार्टी के रूप में पहचान की मांग कर सकते हैं। आयोग के पास गुटों के मर्जर को एक पार्टी के रूप में मान्यता देने का भी अधिकार है। यानी, पार्टी फिर से अपने सिंबल और नाम का इस्तेमाल कर सकेगी।

सवाल-8: क्या इससे पहले किसी अन्य बागी ने किसी पार्टी सिंबल पर दावा किया है?

हां, इससे पहले कई बार पार्टी सिंबल को लेकर विवाद हुए हैं। हम यहां हाल ही में हुए तीन उदाहरण बता रहे हैं…

1. लोक जन शक्ति पार्टीः चिराग और पशुपति की खींचतान

अक्टूबर 2021 में LJP में ऐसी स्थिति होने पर आयोग ने चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस को LJP या उसके सिंबल 'बंगले' के नाम का यूज करने से रोक दिया था।
अक्टूबर 2021 में LJP में ऐसी स्थिति होने पर आयोग ने चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस को LJP या उसके सिंबल 'बंगले' के नाम का यूज करने से रोक दिया था।

30 अक्टूबर को कुशेश्वर अस्थान और तारापुर विधानसभा में होने वाले उप चुनाव के लिए आयोग ने चिराग गुट को हेलिकॉप्टर सिंबल के साथ LJP (रामविलास) नाम यूज करने की मंजूरी दी थी। साथ ही पारस खेमे को LJP नाम और सिलाई मशीन सिंबल के रूप में दिया था।

2. AIADMK: शशिकला और पलानीस्वामी का विवाद

ओ पन्नीरसेल्वम और वीके शशिकला ने जब AIADMK के सिंबल दो पत्ती पर अपना दावा किया तो चुनाव आयोग ने मार्च 2017 में इसे फ्रीज कर दिया था। हालांकि, बाद में CM ई पलानीस्वामी खेमे ने शशिकला के खिलाफ विद्रोह कर दिया और पन्नीरसेल्वम से मिल गए।

इसके बाद पलानीस्वामी-पन्नीरसेल्वम गुट का ऑर्गेनाइजेशन और लेजिस्लेचर विंग दोनों में बहुमत हो गया। नवंबर 2017 में उसे पार्टी का सिंबल दो पत्ती मिल गया। देखा जाए तो ऐसा ही मामला इस समय शिवसेना में भी देखने को मिल रहा है।

3. समाजवादी पार्टीः अखिलेश और मुलायम सिंह का विवाद

2017 में जब सपा UP की सत्ता में थी तब उसमें भी विभाजन देखने को मिला था। अखिलेश ने इस दौरान अपने पिता मुलायम सिंह को हटाकर खुद अध्यक्ष बन कर पार्टी पर कब्जा कर लिया था।
2017 में जब सपा UP की सत्ता में थी तब उसमें भी विभाजन देखने को मिला था। अखिलेश ने इस दौरान अपने पिता मुलायम सिंह को हटाकर खुद अध्यक्ष बन कर पार्टी पर कब्जा कर लिया था।

इसके बाद मुलायम ने चुनाव आयोग से कहा कि वह अभी भी पार्टी अध्यक्ष हैं और सिंबल उन्हें मिलना चाहिए। अखिलेश खेमे ने इसका विरोध किया। साथ ही अखिलेश ने पार्टी के पदाधिकारियों, सांसदों, विधायकों और जिलाध्यक्षों की ओर से आयोग में हलफनामा देकर पार्टी में बहुमत साबित किया।

आयोग ने इसके बाद दोनों गुटों को सुना और करीब 5 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान अखिलेश खेमे ने सांसदों, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और पदाधिकारियों को बहुमत होने का दावा किया। वहीं दूसरी ओर मुलायम गुट ने कहा कि पार्टी में कोई विवाद नहीं है। जनवरी 2017 में चुनाव आयोग ने अखिलेश खेमे को सपा का सिंबल साइकिल दे दिया था।

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