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ग्राउंड रिपोर्टबाल ठाकरे के लिए जान देते थे, शिंदे से नाराज:शिवसेना बनाने वाले बोले- उद्धव को तकलीफ दी, तो छोड़ेंगे नहीं

मुंबई9 दिन पहलेलेखक: आशीष राय

82 साल के विश्वनाथ खटाटे ऑरेंज कलर की शर्ट पहने तनकर बैठे हैं। ये वो शख्स हैं, जो बाला साहेब ठाकरे के लिए कत्ल करने से भी पीछे नहीं हटे। कम्युनिस्ट नेता कृष्णा देसाई की हत्या के मामले में उन्हें 1970 में उम्रकैद हुई थी।

विश्वनाथ आज भी कहते हैं- ‘बाला साहेब पर मुसीबत आई तो पीछे नहीं हटे थे, उनके परिवार के लिए भी पीछे नहीं हटेंगे। मरने के बाद ही कोई शिवसेना हमसे ले सकता है।’ ये कहते हुए विश्वनाथ अपनी सफेद मूछों पर ताव भी देते हैं।

सिर्फ विश्वनाथ ही नहीं अप्पा चव्हाण, दत्ता दिवेकर, राजन रवीन्द्रनाथ मोरवाने और सुरेश काले जैसे पुराने शिवसैनिक आज भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़े नजर आते हैं। ये वो लोग हैं, जो 19 जून 1966 के दिन शिवाजी पार्क में मौजूद थे। इसी दिन बाल ठाकरे ने पहला भाषण दिया, तब मैदान में 2 लाख लोग मौजूद थे। यहीं से शिवसेना की शुरुआत भी हुई।

शिवसेना की पहली रैली 19 जून 1966 को दादर के शिवाजी पार्क में हुई थी। ठाकरे परिवार बांद्रा के मातोश्री बंगले में शिफ्ट होने से पहले इस पार्क के पास ही रहता था।
शिवसेना की पहली रैली 19 जून 1966 को दादर के शिवाजी पार्क में हुई थी। ठाकरे परिवार बांद्रा के मातोश्री बंगले में शिफ्ट होने से पहले इस पार्क के पास ही रहता था।

आज हालात ये हैं कि उद्धव ठाकरे के हाथ से शिवसेना का नाम और निशान लगभग निकल चुका है। चुनाव आयोग ने इसे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट को सौंप दिया है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। उद्धव की शिवसेना के इस मुश्किल समय में बाला साहेब ठाकरे के साथ रहे शिवसैनिक क्या सोच रहे हैं, ये जानने मैं मुंबई पहुंचा।

बॉम्बे से मुंबई का सफर और शिवसेना की शुरुआत
तब मुंबई शहर बॉम्बे हुआ करता था, 60 के दशक में मराठी माणूस के हक, सम्मान के लिए बाल ठाकरे ने यहीं शिवसेना का सपना बुना था। बाला साहेब के लिए मुंबई की सड़कों पर खून बहा चुके विश्वनाथ खटाटे बताते हैं कि 1956 में नए महाराष्ट्र राज्य की मांग को लेकर आचार्य पी.के आत्रे के नेतृत्व में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन शुरू हुआ।

इसी के दो महीने बाद मुंबई के एक हिस्से में प्रबोधनकार ठाकरे के कार्टूनिस्ट बेटे बाल ठाकरे ने अपनी साप्ताहिक व्यंग्य कार्टून पत्रिका 'मार्मिक' शुरू की। 23 जनवरी 1927 को पुणे में पैदा हुए बाल ठाकरे ने फ्री प्रेस जर्नल की नौकरी छोड़ मार्मिक शुरू की थी। तब तक वे एक नामी कार्टूनिस्ट हो चुके थे।

बाल ठाकरे ने अपना करियर कार्टूनिस्ट के तौर पर शुरू किया था। पहले वे अंग्रेजी अखबारों के लिए कार्टून बनाते थे। 1960 में उन्होंने 'मार्मिक' की शुरुआत की।
बाल ठाकरे ने अपना करियर कार्टूनिस्ट के तौर पर शुरू किया था। पहले वे अंग्रेजी अखबारों के लिए कार्टून बनाते थे। 1960 में उन्होंने 'मार्मिक' की शुरुआत की।

बात 1963 की है, एक दिन बाला साहेब के मित्र श्रीकांत गडकरी कुछ लोगों के साथ उनसे मिलने दादर इलाके में शिवाजी पार्क के पास ‘कदम मेंशन’ पहुंचे। इन लोगों में मुंबई के विश्वनाथ खटाटे भी शामिल थे।

विश्वनाथ बताते हैं- ‘हमने बाला साहेब को मुंबई की डायरेक्टरी दिखाते हुए कहा कि मुंबई महाराष्ट्र का हिस्सा है, लेकिन यहां टॉप की सभी पोस्ट पर गैरमराठी लोग हैं। हमारे लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, वे सड़कों पर मार खा रहे हैं। हमारे पास न काम है, न पैसे और न ही हमें सम्मान मिलता है। यहीं से एक चिनगारी उठी, जो बाद में शिवसेना बनी।’

बाला साहेब के पिता के करीबी थे विश्वनाथ खटाटे
विश्वनाथ बताते हैं- ‘बाला साहेब से मेरा जुड़ाव उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे की वजह से हुआ था। उन दिनों ‘कदम मेंशन’ में हर रविवार को दरबार लगता था। यहीं पूरा ठाकरे परिवार किराए पर रहता था। यहां मराठी अस्मिता को बचाने के लिए प्रबोधनकार ठाकरे और मैं युवाओं के साथ मीटिंग और प्लानिंग किया करते थे। वे जानते थे कि राजनीति में उतरे बिना समाज में बदलाव नहीं लाया जा सकता है और उनके कहने पर ही शिवसेना के निर्माण की रूप-रेखा बनी थी। उन्होंने ही पार्टी का नाम शिवसेना तय किया था।’

‘बाला साहेब के आदेश पर जिस शिवसेना को हमने अपने खून से सींचा, जिसके लिए लाठियां खाईं, जेल गए और कई बार सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया। उसे कोई बाहरी हमसे छीन नहीं सकता है। हम बाला साहेब के शिवसैनिक हैं और मरते दम तक उनके और उनके परिवार के साथ रहेंगे।’

विश्वनाथ गुस्से में कहते हैं- ‘हमने गांव-गांव जाकर शाखा बनाई और इसे पूरे राज्य में फैलाया। कई बार हम पहले काम या आंदोलन करते और बाद में बाला साहेब को बताया करते थे। हमारे लिए कोर्ट और कचहरी बाला साहेब का घर और शिवसेना की शाखा हुआ करती थी।’

उद्धव को तकलीफ देने वालों को नहीं छोड़ेंगे
कृष्णा देसाई की हत्या में दोषी कट्टर शिवसैनिक विश्वनाथ खटाटे को जेल में अच्छे बर्ताव की वजह से 7 साल में ही रिहा कर दिया गया था। उन दिनों को याद करते हुए विश्वनाथ कहते हैं- ‘वह (कृष्णा देसाई) बाला साहेब को मारने आया था, इसलिए मैंने उसे मार डाला। मुझे उसकी हत्या का कोई पछतावा नहीं। अगर पिता को कोई तकलीफ हुई तो क्या बच्चे उसे छोड़ देंगे? उद्धव जी को कोई तकलीफ देगा तो हम उसे भी छोड़ेंगे नहीं।’

विश्वनाथ कहते हैं- ‘जेल हमारे लिए घर जैसा ही है। यहां से ज्यादा आराम हमारे लिए वहां है। इसलिए कोई हमें धमकाए या पार्टी छीनने की बात करता है तो हम डरेंगे नहीं।’

शिवसेना हमारे लिए राममंदिर जैसी, हम झुकने वाले नहीं
विश्वनाथ के बाद मेरी मुलाकात मुंबई के रहने वाले 80 साल के अप्पा चव्हाण से हुई, वे भी कट्टर शिवसैनिक हैं। शिवसेना की स्थापना के दिनों से वे पार्टी संग जुड़े हुए हैं। वे कहते हैं- ‘शिवसेना हमारे लिए राममंदिर से कम नहीं है।’

बाल ठाकरे से मुलाकात को याद करते हुए अप्पा बताते हैं- ‘मैं 15 साल का था और दादर में पेपर का बिजनेस करता था। मेरे दोस्त धुरी ने मुझे बाला साहेब के बारे में बताया था। मैं पहली बार ‘कदम मेंशन’ में बाला साहेब से मिला था। बाला साहेब ने मुझे शिवसेना की सदस्यता के लिए 500 फॉर्म दिए और मुझे भरवाकर लाने को कहा था। मैं भोईगांव, नायगांव और परेल तक गया, मैंने पार्टी की स्थापना से पहले 500 लोगों को इसका सदस्य बनाया था।’

‘हम जहां रहते थे, वहां एक राम मंदिर हुआ करता था। बाला साहेब वहां आते थे और अपना दरबार लगाते थे। यहीं शिवसेना बनाने की रूपरेखा तैयार हुई थी। मंदिर के सामने हमने टीन का पत्रा डाल कर शिवसेना की शाखा बनाई थी। उसे अवैध बताकर गिराने के लिए उस दौरान म्युनिसिपैलिटी और पुलिस ने काफी कोशिश की। हमारे ऊपर लाठीचार्ज हुआ, हमने भी जवाब में पथराव किया। बहुत लोग घायल और गिरफ्तार हुए थे।’

हमने शिवसेना के लिए जान दी थी, उद्धव के भी साथ हैं
अप्पा की तरह ही 76 साल के दत्ता दिवेकर शिवसेना की स्थापना से पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया- ‘शिवसेना के निर्माण में मार्मिक पत्रिका का बहुत बड़ा योगदान था। मैगजीन में मराठियों पर होने वाले अत्याचारों को बताया जाता था। इस वजह से मराठी लोग बाला साहेब के साथ जुड़ने लगे थे।’

दत्ता आगे बताते हैं- ‘ऐसे कई लोग थे, जिन्होंने शिवसेना के लिए जान दे दी। बाला साहेब आज नहीं हैं, लेकिन उनके बेटे उद्धव के साथ हम आज भी खड़े हैं।’

BJP के लालच की वजह से शिवसेना टूटी
शिवसेना में फूट के लिए दत्ता, BJP के लालच को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘शुरू में BJP के साथ कोई भी जाने को तैयार नहीं था। यह बाला साहेब ही थे, जिन्होंने उसका साथ दिया था। हिंदुत्व की भूमिका की वजह से BJP महाराष्ट्र में स्थापित हुई थी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन जैसे लोगों को भी बाला साहेब ने संभाला था।’

पार्टी के नाम, निशान और बिखराव के सवाल पर दत्ता कहते हैं, ‘दुःख तो बहुत होता है। माता-पिता जैसे अपने सभी बच्चों के लिए बराबर करते हैं, उसी तरह बाला साहेब ने एकनाथ शिंदे समेत पार्टी छोड़कर गए लोगों के साथ बराबर व्यवहार किया था। कुछ लोग ऐसे होते हैं उन्हें जितना मिले कम है। हमारे जैसे कई बुजुर्ग लोग हैं, जिन्होंने शिवसेना की स्थापना की, लेकिन पूरी जिंदगी उन्हें कुछ नहीं मिला। इसके बावजूद हमने पार्टी नहीं छोड़ी और जिन्हें सब कुछ मिला, वे पार्टी छोड़ अलग खड़े हैं।’

मराठी को स्कूल में कम्पलसरी बनाने वाले भी उद्धव के साथ
मस्जिद बंदर के रहने वाले 79 साल के राजन रवीन्द्रनाथ मोरवाने शिवसेना से 10वीं क्लास में पढ़ाई के दौरान ही जुड़ गए थे। उन्होंने बताया- ‘1966 से पहले मुंबई में नॉन कॉन्वेंट स्कूल में कम्पलसरी लैंग्वेज इंग्लिश और मराठी थी। इस कारण मराठी स्टूडेंट्स की अच्छी रैंक आती थी, लेकिन मिशनरी या कॉन्वेंट स्कूलों ने इसे रोकने के लिए मराठी को हटाकर फ्रेंच को अनिवार्य भाषा बना दिया था। इससे मराठी स्टूडेंट के नंबर कम होने लगे।’

‘इसके बाद हमने मराठी को कॉन्वेंट स्कूलों में अनिवार्य करवाने की कोशिश शुरू की। हम शिक्षा विभाग के दफ्तरों में जाते, सड़कों पर धरना देते थे। इसके बाद स्कूल ने हमारी बात मानी और फ्रेंच की जगह मराठी को जगह मिली। इस कामयाबी के बाद मैं पहली बार बाला साहेब से मिला और उन्होंने मुझे अपने इलाके का उप-शाखा प्रमुख नियुक्त किया। इसके बाद शिवसेना बनी, हम लोगों के घर तक राशन, मिट्टी का तेल, घी और चीनी तक पहुंचाते थे।’

रवीन्द्रनाथ मोरवाने ने मौजूदा विवाद पर कहा- ‘बॉम्बे को मुंबई बनाने में शिवसेना का बड़ा योगदान रहा है। शिवसेना के कॉर्पोरेटर केशरीनाथ राजकोरकर ने सबसे पहले गेट वे ऑफ इंडिया के सामने मुंबई का बोर्ड लगाया था।’

कदम मेंशन अब बाला साहेब का घर नहीं, लेकिन विचार आज भी जिंदा
मोरवाने से मिलने के बाद मैं पार्टी के बुजुर्गों के साथ बाला साहेब ठाकरे के उस कदम मेंशन को देखने पहुंचा, जहां शिवसेना की पूरी प्लानिंग हुई थी। कदम मेंशन की जगह पर अब एक शानदार 12 मंजिला इमारत खड़ी हो चुकी है।

पार्टी के फाउंडर मेंबर में से एक विश्वनाथ खटाटे पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं- ‘मातोश्री जाने से पहले बाला साहेब का यह घर उनके लिए मंदिर जैसा था। यहां वे कभी भी आ-जा सकते थे। बाला साहेब की पत्नी मीना ताई ठाकरे के हाथों से उन्होंने कई बार खाना खाया।’

कदम मेंशन के पास मेरी मुलाकात पार्टी की स्थापना के बाद शिवसेना के शाखा प्रमुख रहे सुरेश काले से हुई। उन्होंने बताया- ‘महाराष्ट्र में ‘ठाकरे’ ब्रांड बहुत बड़ा है। चाहे कोर्ट हो या चुनाव आयोग हम अपना निशान वापस ले लेंगे। अगर यह नहीं मिला तो भी हम मशाल चुनाव चिह्न के साथ लोगों के बीच जाएंगे और जीत कर दिखाएंगे।’

जिसे बाला साहेब ने बनाया, उसी ने शिवसेना तोड़ दी
पार्टी के बुजुर्गों से मिलने के बाद मैं युवा शिवसैनिकों से मिलने पहुंचा। दादर में शिवसेना की 191 शाखा में मेरी मुलाकात शाखा प्रमुख अजित कदम से हुई। 42 साल के कदम ने बताया- ‘स्कूलिंग खत्म करने के बाद मैं शिवसेना से जुड़ा था, अभी भी शिवसेना में हूं और आखिरी सांस तक उद्धव ठाकरे के साथ ही रहूंगा।’

पार्टी के बंटवारे के सवाल पर कदम कहते हैं- ‘हमें दु:ख से ज्यादा चिढ़ और गुस्सा आ रहा है। यह हालात अचानक नहीं बने हैं, ये बम तो प्लांट किया गया है। किसने करवाया है, यह सभी को मालूम है। बाला साहेब ने जिसे बनाया, उसी ने गद्दारी की।’

मैं पूछता हूं, एकनाथ शिंदे ने शाखा के दफ्तर नहीं लिए? अजित कदम जवाब देते हैं- ‘हमें उनकी बात पर कोई भरोसा नहीं है। वे हमारी शाखा तक आ नहीं सकते हैं, क्योंकि हमें भी मालूम है कि क्या करना है और कैसे करना है। फिलहाल तो हमने अपनी शाखा में पुरानी शिवसेना का निशान लगा रखा है।’

ये ‘चालीस चोर’ शिवसेना को अपनी पार्टी बता रहे
इसके बाद मैं शिवसेना के विभाग संगठक 59 साल के शशि पर्ते से मिला। उन्होंने बताया कि 'बाला साहेब को उन्होंने पहली बार शिवाजी पार्क में दशहरा रैली में देखा था। जब से होश संभाला तब से इस पार्टी में हूं। ये 'चालीस चोर' बोल रहे हैं कि शिवसेना उनकी है। वे हमारे पैसे से वड़ा पाव खाते थे। ये बाला साहेब का नाम लेकर आगे बढ़ रहे हैं। सेंट्रल एजेंसीज का इस्तेमाल करके दबा रहे हैं।’

दादर में बालासाहेब के घर के पास रहने वाले अशोक प्रभाकर मस्तार कहते हैं, ‘शिवसेना के निर्माण के दौरान हम हर मीटिंग में शामिल रहते थे। मनोहर जोशी बाला साहेब के करीबी थे और हम उनके साथ जुड़े हुए थे। मेरे पहले टेम्पो के उद्घाटन में भी आए थे।’ उसकी तस्वीरें दिखाते हुए अशोक भावुक हो गए।

कांग्रेस, शिवसेना और BJP, कितने दूर और कितने पास
शिंदे गुट ये आरोप लगाता है कि उद्धव ने कांग्रेस से हाथ मिलाया, जो बाल ठाकरे की शिवसेना कभी नहीं करती। इतिहास में झांकें तो इस तरह कि बातें सच नजर नहीं आती। 30 अक्टूबर 1966 को दशहरा था और इसी दिन शिवसेना की पहली रैली हुई थी।

उन दिनों शिवसेना का सीधा टकराव कम्युनिस्टों के साथ था। परेल की दलवी बिल्डिंग में कम्युनिस्ट पार्टी का हेडक्वार्टर था। शिवसेना ने दिसंबर 1967 में बिल्डिंग पर हमला कर भयानक तोड़-फोड़ की थी। 60 के दशक में जॉर्ज फर्नांडीज को मुंबई का सबसे बड़ा ट्रेड यूनियन लीडर माना जाता था। 1967 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 35 साल के जॉर्ज ने कांग्रेस के दिग्गज नेता एसके पाटिल को हरा दिया।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता वसंतराव नाइक ने ही जॉर्ज से निपटने के लिए शिवसेना को सपोर्ट किया। उस दौर में शिवसेना को कई लोग मजाक में ‘वसंत सेना’ भी कहते थे। मुंबई के मजबूत यूनियन लीडर दत्ता सामंत की हत्या का आरोप भी शिवसैनिकों पर ही लगा था। माना जाता है कि बाल ठाकरे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के करीबी रहे और ट्रेड यूनियन कंट्रोल में रखने का काम करते थे।

सुकेतु मेहता की किताब ‘मैक्सिमम सिटी’ के मुताबिक 70 और 80 के दशक में ही महाराष्ट्र में कई शहरों में कांग्रेस और शिवसेना ने तालमेल करते हुए जिला परिषद, नगर पालिका और नगर निगमों में बोर्ड का गठन किया था। ऐसा नहीं है कि बाल ठाकरे कांग्रेस के करीबी नहीं रहे।

उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी सरकार के लगाए आपात्-काल का समर्थन किया। इसके लिए वे बंबई के राजभवन में इंदिरा गांधी से मिलने गए थे। इतना ही नहीं 1977 के लोकसभा चुनाव में भी बाल ठाकरे ने कांग्रेस का समर्थन किया था। 1977 में मुंबई के मेयर के चुनाव में कांग्रेस नेता मुरली देवड़ा का भी समर्थन किया। 2012 में राष्ट्रपति चुनावों में प्रणब मुखर्जी और 2007 में प्रतिभा पाटिल को भी समर्थन दिया था।

सुजाता आनंदन की किताब ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के मुताबिक, 80 के दशक के आखिर में शिवसेना ने BJP को पार्टनर बनाया। राजनीति में हिंदुत्व की एंट्री और राम मंदिर के मुद्दे पर दोनों में नजदीकियां बढ़ीं। शिवसेना लगातार उग्र होती गई तो कांग्रेस से उसकी दूरियां बढ़ती गईं। शिवसेना ने 1997 में ‘मी नाथूराम गोडसे बोलतोय’ नाटक का मंचन करवाया, ये सीधे-सीधे महात्मा गांधी का विरोध था।

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शिवसेना के 362 ऑफिस किसके, तय नहीं, किसे क्या मिलेगा सुप्रीम कोर्ट तय करेगा

शिवसेना भवन किसका होगा, चुनाव आयोग के फैसले के बाद शिंदे गुट यहां कंट्रोल हासिल कर पाएगा, शिवसेना के बाकी दफ्तरों और प्रॉपर्टी का बंटवारा कैसे होगा, किसे क्या मिलेगा, ये सवाल अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही तय होना है। शिवसेना के पास अभी 191.82 करोड़ की चल-अचल संपत्ति है, दादर के शिवसेना भवन पर भी उद्धव गुट का कब्जा है। शिंदे की शिवसेना का कब्जा कहां-कहां होगा, ये सवाल फिलहाल बना हुआ है।
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