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आज की पॉजिटिव खबर:मंदिरों से मिलने वाले कोकोनट शेल से डेकोरेटिव सामान बनाते हैं दिव्यांग सब्यसाची; देशभर में मार्केटिंग

5 महीने पहलेलेखक: सुनीता सिंह

मंदिर में भगवान को नारियल चढ़ाने के बाद अकसर नारियल शेल को कहीं न कहीं फेंक दिया जाता है। नारियल का शेल कचरे में फेंके जाने के बजाय इससे कुछ जरूरत की चीज बनाने के लिए ओडिशा के सब्यसाची पटेल ने एक पहल की। सब्यसाची वेस्ट कोकोनट शेल से काफी खूबसूरत डेकोरेशन का सामान बनाते हैं। इस सामान को ई-कॉमर्स कंपनियों के जरिए देश के कई हिस्सों में बेचा जाता है।

सब्यसाची दिव्यांग हैं। उन्हें कला से बहुत प्यार है। बचपन से ही इन्हें आर्ट में काफी रूचि रही है, लेकिन नौकरी और पढ़ाई की वजह से इन्हें कभी आर्ट को समय देने का मौका नहीं मिला। एक तरफ कोरोना ने कई लोगों को रुलाया है, वहीं दूसरी तरफ कई लोगों के लिए ये एक मौका था खुद को खोजने, समझने और निखारने का। कोरोना दौर में ही सब्यसाची ने नारियल के शेल से कुछ क्रिएटिव बनाने पर हाथ आजमाया और वो कामयाब भी रहे। वे नारियल के वेस्ट शेल से चाय का कप, गिलास, रथ, शिवलिंग, स्कूटर और शिप सहित 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। इसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता। सब्यसाची के काम को शुरू हुए 6 महीने ही हुए हैं, लेकिन इनके प्रोडक्ट की डिमांड कई जगह से आ रही है।

आज की पॉजिटिव खबर में जानेंगे हैं सब्यसाची की कहानी जिन्होंने शारीरिक तकलीफ और कई चुनौतियों के बावजूद कला को अपना पेशा बनाया और कई लोगों को उनका काम बहुत पसंद भी आ रहा है...

बच्चों के प्रोजेक्ट से आइडिया आया

सब्यसाची नारियल के वेस्ट शेल से 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। जिसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता।
सब्यसाची नारियल के वेस्ट शेल से 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। जिसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता।

29 साल के सब्यसाची पटेल ओडिशा के बलांगीर जिले के पुइंतला गांव के रहने वाले हैं। वो बचपन से दिव्यांग हैं। रीढ़ की हड्डी में दिक्कत होने के कारण ज्यादा समय तक खड़े नहीं रह सकते हैं और ना हीं ठीक से चल पाते हैं। बचपन से इन्हें आर्ट एंड क्राफ्ट में काफी रूचि थी, लेकिन कभी सीखने का मौका नहीं मिला। लॉकडाउन ने उन्हें एक बेहतर मौका दिया जिसमें उन्होंने अपने हुनर को तराशा।

सब्यसाची बताते हैं, “आर्ट का शौक मुझे बहुत पहले से था और मैंने पहले थर्माकोल, फल-सब्जियों में कार्विंग का काम किया था। लॉकडाउन में मेरी भांजी को एक प्रोजेक्ट मिला था जिसमें साबुन पर कार्विंग कर कुछ नया तैयार करना था। उसी का प्रोजेक्ट बनाने के दौरान मुझे नारियल के शेल पर कार्विंग करने का आइडिया आया।”

सब्यसाची ने इस साल लॉकडाउन में यूट्यूब के जरिए नारियल वेस्ट शेल से डेकोरेशन का सामान बनाना सीखा। पहले इस काम को उन्होंने शौक के तौर पर आजमाया और अब उनका शौक उनका बिजनेस बन गया है।

शारीरिक तकलीफ के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी

स्पाइन में तकलीफ के कारण सब्यसाची बहुत देर तक खड़े नहीं हो सकते हैं और न देर तक चल सकते हैं।
स्पाइन में तकलीफ के कारण सब्यसाची बहुत देर तक खड़े नहीं हो सकते हैं और न देर तक चल सकते हैं।

सब्यसाची एक किसान परिवार से हैं। गांव में वो और उनका परिवार खेती करता है। उन्होंने स्कूली पढ़ाई के बाद कोलकाता के स्टेट इंस्टिट्यूट होटल मैनेजमेंट से फूड प्रोडक्शन में डिप्लोमा किया। कोर्स के साथ होटल में छह महीने की ट्रेनिंग भी की, ताकि उन्हें IRCTC में नौकरी मिल सके। जैसा हम सोचते हैं वैसा हर बार नहीं होता और ऐसा सब्यसाची के साथ भी हुआ।

सब्यसाची बताते हैं, “मैंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई रेलवे में IRCTC के केटरिंग विभाग में सरकारी नौकरी करने के मकसद से की। मुझे क्राफ्ट का शौक था, इसलिए मैंने कोर्स के दौरान फूड कार्विंग की अलग से ट्रेनिंग भी ली थी। इसमें मुझे फल और सब्जियों पर सुंदर कार्विंग करना सिखाया गया था। मैंने कोर्स को अच्छे से पूरा किया और कार्विंग के अलग-अलग तरीके भी सीखे। मुझे पूरी उम्मीद थी कि दिव्यांग कोटा में मुझे सरकारी नौकरी जरूर मिल जाएगी, लेकिन कुछ कारणों से मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिली।

नौकरी की जरूरत थी तो मैंने प्राइवेट होटल इंडस्ट्री में करना शुरू किया जहां मुझे घंटों तक काम करना पड़ता था। एक समय के बाद मुझे शारीरिक तकलीफ के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी।”

स्पाइन में तकलीफ के कारण सब्यसाची बहुत देर तक खड़े नहीं हो सकते थे और न देर तक चल सकते हैं। मजबूरी में उन्हें शहर की नौकरी छोड़ गांव आना पड़ा। गांव आने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई की।

नौकरी छोड़ी लेकिन कार्विंग का काम जारी रहा

उनके इस हुनर को गांव वालों का काफी सपोर्ट मिलता रहा है। उन्हें इस काम के लिए अवार्ड्स भी मिले हैं।
उनके इस हुनर को गांव वालों का काफी सपोर्ट मिलता रहा है। उन्हें इस काम के लिए अवार्ड्स भी मिले हैं।

सब्यसाची ने नौकरी छोड़ने के बाद ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू कर दी। इसके अलावा वो गांव में ही एक किराने की दुकान भी संभालने लगे। क्रॉफ्ट में रूचि होने के कारण सब्यसाची हमेशा अपने शौक से जुड़े रहे। गांव की शादियों और दूसरे फंक्शन में थर्माकोल, बर्फ और फल-सब्जियों की कार्विंग का काम करते रहे ।

उनके इस हुनर से गांव वालों का काफी सपोर्ट मिलता रहा है। उन्हें इस काम के लिए अवार्ड्स भी मिले हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण उनकी दुकान और कार्विंग दोनों का काम बंद पड़ गया।

सब्यसाची कहते हैं, “कोरोना काल में कई लोगों की तरह मेरे काम पर भी बहुत असर हुआ। काफी वक्त मिलता था घर पर रहकर फ्री बिताने के लिए। उसी समय मैंने अपने परिवार की एक बच्ची का प्रोजेक्ट बनवाने में मदद कर रहा था। वहां से मुझे वेस्ट नारियल शेल से कुछ बनाने का आइडिया आया। मैं नारियल शेल का इस्तेमाल इसलिए भी करना चाहता था, ताकि वह किसी कचरे के डिब्बे में जाने के बजाय इसका इस्तेमाल किसी अच्छे चीज के लिए किया जा सके। मैंने सबसे पहले नारियल शेल से कप बनाया फिर यूट्यूब की मदद से कई डिजाइन सीखें और आज तकरीबन 18 से 20 प्रोडक्ट बना लेता हूं।”

सोशल मीडिया की वजह से उनके काम को काफी सराहना मिली

सब्यसाची के प्रोडक्ट पूरे ओडिशा में काफी यूनीक हैं।
सब्यसाची के प्रोडक्ट पूरे ओडिशा में काफी यूनीक हैं।

सबसे पहले उन्होंने नारियल शेल से चाय का कप और गिलास बनाया फिर भगवान गणेश की प्रतिमा बनाई और फिर धीरे- धीरे कई डेकोरेशन का सामान बनाने लगे।सब्यसाची अपने गांव के पास की एक मंदिर से नारियल का शेल लेते हैं।

सब्यसाची कहते हैं, “लॉकडाउन में कई मंदिर बंद थे उसके बावजूद भी लोग सावन महीने में मंदिर के बाहर ही नारियल रखकर चले जाया करते थे। मैंने बलांगीर लोकनाथ मंदिर के पुजारी से संपर्क किया और वहां से नारियल का शेल लाने लगा और उससे धीरे-धीरे डेकोरेशन का सामान बनाने लगा।”

सब्यसाची के प्रोडक्ट पूरे ओडिशा में काफी यूनीक हैं और उनके प्रोडक्ट की खूबसूरती देखने के बाद लोग उससे खरीदना चाहते हैं। उन्होंने इस साल अगस्त में अपनी प्रोडक्ट्स की कुछ फोटो दोस्तों के कहने पर फेसबुक पर अपलोड करना शुरू कीं। ‘वेस्ट से बेस्ट’ की तर्ज पर बने उनके प्रोडक्ट्स को ऑनलाइन सराहना मिलने लगी। सब्यसाची के अनुसार फोटो अपलोड करने के कुछ ही दिनों में उन्हें कटक से वाइन गिलास और कप बनाने का आर्डर मिला। उन्होंने अब अपने प्रोडक्ट को ‘सब्यसाची क्रॉफ्ट’ के नाम से रजिस्टर्ड भी करवा लिया है ।

एमेजन के जरिए फैला रहें हैं अपने काम को

सब्यसाची फिलहाल कप, गिलास, वाइन गिलास, लालटेन, बैलगाड़ी, शिवलिंग, शिप सहित कई खूबसूरत चीजें बनाते हैं।
सब्यसाची फिलहाल कप, गिलास, वाइन गिलास, लालटेन, बैलगाड़ी, शिवलिंग, शिप सहित कई खूबसूरत चीजें बनाते हैं।

सब्यसाची ने शुरुआत एक आर्ट के तौर पर किया था। लोगों को उनका काम पसंद आने के बाद उन्हें धीरे-धीरे काफी आर्डर मिलने लगे। और इस तरह उन्होंने अपने इस हुनर को कमाई का जरिया बना लिया। कुछ ही महीनों में फेसबुक की मदद से उन्होंने 10 ऑर्डर्स मिल गए। कुछ ऑर्डर्स तो लोकल थे, जबकि कुछ दूसरे शहरों से जिसे उन्होंने कूरियर के माध्यम से भेजा।

सब्यसाची बताते हैं, “मेरे डिस्ट्रिक्ट या ओडिशा में इस तरह के प्रोडक्ट्स और कोई नहीं बनाता था, इसलिए मेरा काम लोगों को और पसंद आ रहा है। मेरे काम को जानने के बाद एमेजन ने मुझे कांन्टेक्ट किया और अब मेरे प्रोडक्ट्स सब्यसाची क्रॉफ्ट नाम से बिकते हैं। हालांकि, अभी काम की शुरुआत है इसलिए बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं है, लेकिन जिस तरह लोगों की डिमांड आ रही है उससे लगता है काम अच्छा होने वाला है।”

सिर्फ 6 महीनों में ही वो अपने प्रोडक्ट्स से तकरीबन 10 हजार रूपए हर महीने कमा रहे हैं और इन्हें हजारों का आर्डर भी मिला है जिसे ये जल्द ही पूरा करेंगे। सब्यसाची के अनुसार उनके सभी प्रोडक्ट हैंडमेड और ईको फ्रेंडली हैं। हर एक आईटम को वो खुद काटते, घिसते और शेप देकर तैयार करते हैं।

सब्यसाची का जज्बा ये बताता है कि कोई शारीरिक रूप से कितना भी कमजोर क्यों न हो, लेकिन अगर उसके इरादे मजबूत हों, तो वो किसी पर निर्भर नहीं, बल्कि एक सफल कलाकार बन सकता है।