बात बराबरी की:डियर मैन... मैरिटल रेप पर बागी क्यों हो रहे हो; 'नहीं' का मतलब समझने के लिए इंकलाबी खोपड़ी नहीं, दिल चाहिए

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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दक्षिण-पूर्वी यूरोप में एक देश है बोस्निया। नदियों, झीलों और गांवों से बने इस छटांकभर के मुल्क की सुबह स्ट्रॉन्ग कॉफी से होती है और रात तुलुंबे नाम की मिठाई के साथ। बोस्नियन संगीत यहां कॉफी हाउस से लेकर खेतों तक में टुनटुनाता है। पहली झलक में खुशहाल लगते इस देश में दर्द का लंबा इतिहास है। नब्बे के दशक में यहां भयंकर जंग छिड़ी। लड़ाई में लाखों मौतें हुईं, जिनका लेखा-जोखा इतिहास में मिल जाता है। बस, नहीं मिलता तो उन जंगों का हिसाब, जो वहां की औरतों की देह पर लड़े गए।

घरों में रेप हुआ। कुएं की पाट पर रेप हुआ। बच्चों के सामने रेप हुआ। जो निकल भागीं, जंगलों में उनका रेप हुआ। पूरे देश में कोई भी ऐसी जगह नहीं बची, जहां जाकर औरत सब बिसार सके। ये तो हुआ कहानी का पहला हिस्सा।

दूसरे टुकड़े में बात करते हैं उन सैनिकों की, जिन्होंने इन औरतों को रौंदा था। इक्के-दुक्के को छोड़कर लगभग सभी ने एक सुर में रेप का हिस्सा होने से इनकार कर दिया। जिन सैनिकों ने भूल मानी भी, उनका कहना था कि नशे में, भूख में, ऊब और गुस्से में उन्होंने ये काम किया, वरना रूटीन दिनों में वे रहमदिल मर्द हैं, जिनका दिल औरतों के लिए प्यार से लबालब रहता है।

‘अवर बॉडीज, देअर बैटलफील्ड’ नाम की किताब में ऐसे कई इंटरव्यू हैं, जहां बर्बर सैनिक भी खुद पर रेपिस्ट का दाग लेने से कतराते दिख जाएंगे।

कहानी के तीसरे और आखिरी हिस्से में बात करते हैं मैरिटल रेप पर। चांदनी चौक में पान-पजामे बेचने वाले भी ग्राहकों को खींचने के लिए वैसा कशिशभरा राग नहीं छेड़ते, जैसा सोशल मीडिया पर छिड़ा हुआ है। ट्विटर पर देसी मर्द हड़ताल कर रहे हैं- कच्ची सड़क या पक्की नौकरी के लिए नहीं, बल्कि शादी के लिए।

वे 'शादी-बागी' हो चले हैं और कहते हैं कि जब तक मैरिटल रेप पर कानूनी बहस चलेगी, वे शादी नहीं करेंगे। MarriageStrike हैशटैग पर वे अपने दुखड़े गा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर मैरिटल रेप पर कानून बन जाए, तो सनातन रोंदू और शिकायतखोर औरतें इसका गलत इस्तेमाल करेंगी।

मर्दों का मानना है कि मैरिटल रेप जैसी कोई चीज है ही नहीं, बल्कि चाय और समोसा भकोसते हुए कुछ घरतोड़ू फेमिनिस्टों और खलिहर वकीलों ने इसकी खोज कर दी है।

सच ही है! जब सालों तक बंदूक और मशीनगनों की लोरी में सोने वाले सैनिकों ने शांतिकाल में खुद को रेपिस्ट कहलाने से इनकार कर दिया, तो ये तो आम मर्द हैं। वो मर्द जो 9 से 5 की ड्यूटी बजाकर साग-भाजी लेते हुए घर लौटते हैं। तलब लगने पर चाय में थोड़ी ज्यादा पत्ती डाल लेते हैं। और मामूली जख्म पर भागकर विलायती मरहम लगाते हैं। ऐसे मर्द चाहे रेप के वीडियो देख लें, लेकिन रेप कतई नहीं कर सकते!

पुरुषों को कच्चे दिमाग को महिलाओं से बचाने के लिए आन की आन में कई संस्थाएं उग आईं। यहां तक कि कोर्ट भी किश्तों-किश्तों में कहने लगी है कि मैरिटल रेप जैसा कानून बनने पर फैमिली नाम का पवित्र स्ट्रक्चर गड़बड़ा जाएगा।

पिछले साल अगस्त में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपनी पत्नी के रेप के आरोपी को ये कहते हुए दूध-भात दे दिया कि कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध रेप नहीं है, भले ही वो उसकी मर्जी के खिलाफ या जबरन हो।

पश्चिमी देशों में हमसे भी मजे का चुटकुला चल रहा है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने लगभग 17 सालों तक स्टडी करके एक लंबी-चौड़ी रिपोर्ट बनाई। इंटिमेट पार्टनर वायलेंस नाम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि शादीशुदा महिलाओं पर यौन हिंसा का खतरा कम हो जाता है।

यहां तक कि घर से बाहर निकलने पर डकैत और शोहदे भी ऐसी महिला को सम्मान की नजर से देखते हैं और उन्हें छोड़कर ऐसा शिकार खोजते हैं, जो गैर-शादीशुदा या फिर तलाकशुदा हो। तो रेप से बचना हो तो झटपट शादी कर डालो। ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि पति थोड़ी-बहुत जबर्दस्ती करेगा। किसी गैरमर्द की जबर्दस्ती से तो ये बेहतर ही है। नहीं!

कुछ इसी तरह की सीख बीते साल के आखिर में न्यूयॉर्क के एक पादरी ने भी दी। बर्नेट रॉबिन्सन ने 13 नवंबर को एक सभा में आए पुरुषों को संबोधित करते हुए कहा- ‘जेंटलमेन, रेप करना ही है तो अपनी बीवी से करो!’ बयान पर मचे बवाल के बाद चर्च ने इतना-भर किया कि उसे छुट्टी पर भेज दिया।

अब पादरी केक और इंग्लिश चाय पीते हुए चर्च की बजाय अड़ोस-पडोस में अपने सुनहरे विचार फैलाएगा और मामला ठंडा पड़ने पर वापस लौट आएगा।

वैसे सोच की ये फफूंद आज नहीं उगी, बल्कि इसकी जड़ें जमीन में बहुत गहरे तक दबी हैं। 18वीं सदी के मिस्र में माना गया कि जो स्त्रियां पति को यौन सुख नहीं देना चाहतीं, वे यहां-वहां के नखरे करती हैं। मॉडर्न मेडिसिन के जनक हिपोक्रेटस ने कहा कि ऐसी औरत की कोख उसी के शरीर में भटकने लगती है और उसे पागलपन जकड़ लेता है। इसे हिस्टीरिया कहा गया।

बीमारी के लक्षण साफ थे, अब बाकी रहा इलाज। तो साइंस जर्नल मेडिकल न्यूज टुडे की एक रिपोर्ट में फ्रेंच चिकित्सक फ्रांकॉइस बॉइसर के हवाले से ऐसी औरतों को ‘शांत’ करने के तरीके सुझाए गए। इसमें पति जबरन अपनी पत्नी से संबंध बनाता। शौहर अगर सेना में हो या किसी वजह से बाहर हो, तो बावर्ची, सफाईवाला या माली जैसा कोई भी पुरुष उद्धारक की भूमिका में आ सकता था। तो यही हुआ और चेहरे बदल-बदलकर अब तक हो रहा है।

खैर! इधर-उधर की कहानी छोड़ सीधी बात करते हैं। छुटपन से लेकर आज तक कितनी ही बार हम लड़कियों को अनचाहे ही छुआ गया। कभी गाल खींचते हुए। कभी बांहों में चुटकी लेकर। कभी गुदगुदी के बहाने। कभी गोद में उठाते हुए। कभी सड़क पर, तो अक्सर घर पर। हमने कभी टाला, कभी हंसी तो कभी होंठ काटकर चुप रह गईं। बस, विरोध नहीं किया। गलती हमारी थी। न हमने जताया, न तुमने जाना। अब हम बोल रही हैं।

डियर मेन! सुनो। एक टर्म हैं- कंसेंट। यानी सहमति। चुइंगम भी एक वक्त के बाद खिंचना बंद कर देती है, फिर ये तो इच्छा है। इसके पक्के मायने हैं। नहीं, यानी नहीं। जब हम मना करें तो समझो- नहीं। जब हम कतराएं तो समझो- नहीं। जब हम थकान से निढाल हों तो समझो- नहीं। जब हम पीरियड्स की दवा लेती दिखें तो समझो- नहीं। चाहे हम लाख तंदुरुस्त हों और तब भी पीछे हट जाएं तो समझो- नहीं। इस मामूली-से ‘नहीं’ की समझ के लिए इंकलाबी खोपड़ी नहीं, बल्कि उजले दिल की जरूरत है, जहां स्त्री शरीर नहीं, साथिन रह सके।